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लोक मरैत रहत सदैव, आतंकवादीक गोली सँ।

जनता ठकाइत रहत सदैव, क्रूर राजनेताक बोली सँ।

गरीब तंग रहत सदैव, पेटक किलकिलाइत भूख सँ।

स्त्री दबायल रहत सदैव, पुरुखक चमचमाइत बूट सँ।

सवर्ण डेराइत रहत सदैव, डोमक थूक सँ।

मिथिला दहाइत रहत सदैव, बेंगक मूत सँ।

बेटा बिकाइत रहत सदैव, मोटगर दहेज़ सँ।

बेटी जरइत रहत सदैव, आगिक लपेट सँ।

राशन घटल रहत सदैव, नहि होयत किछु भाषण सँ।

लोकतंत्र मे मारामारी रहत सदैव, हटय चाहत ने क्यो सिंघासन सँ।

देश सहमल रहत सदैव, कलियुगी रावण ओ कंस सँ।

किछु लोक चाहैत रहत सदैव, बचय समाज विध्वंस सँ।

अपने मे सब लड़ैत रहत सदैव, नहि होयत किछु झगरला सँ।

ई थेथर समाज एहने रहत सदैव, नहि बदलत बात छकरला सँ।

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  1. बहुत निक प्रस्तुति रुपेशजी..

    अपनेक कविताके हर शब्द कहैत अछि! हे मैथिल हे मिथला २१वी सदी चैल रहल छल आबोते बदलू....

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