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महगू बाजल--
कते महगी आबि गेल छै!
दालि-चाउरमे तँ
आगि लागिए गेल छै।
कथीसँ डिबिया लेसी
मटियाक तेलो
उड़नखटोला भ’ गेल।
मुदा मन्त्राीजी नहि मानलनि।
लुंगी उठा-उठा क’ देखबै छथि--
एहि विकासशील अर्थव्यवस्थामे
कते सस्त भ’ गेल छै
लोकक जान-परान
महानुभावक चरित्रा
बेनंगन मौगीक शील।
कतेक सस्त भ’ गेल छै
पंडिज्जीक पोथी-पतरा
गोसाउनिक गीत
चिनबारक माटि
आ टीवी चैनलक मौसगर मनोरंजन।
मन्त्राीजी नहि देखा रहल छथि
ओ सुरंग जे लोकसभासँ शोकसभा धरि जाइ छै।
ओ नहि देखा रहल छथि
नीलामी घर
जाहिमे मैनोक पात बिकाइ छै
करोड़क करोड़मे!
ओ नहि देखा रहल छथि
बघनखा पहिरने हाथ
जे महानसँ महान योजनाक
मूड़ी पकड़ि क’ सौंसे चिबा जाइ छै।
कुसियारक रस बटैछ सदनमे
आ सिट्ठी फेकाइछ
गामक माल-जालक आगाँ।
लोक माल जकाँ
मरि रहल अछि
कि माल-जाल लोक जकाँ--
से कहब कठिन।

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