अएनाके की मोल - विनीत ठाकुर - मिथिला दैनिक

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बुधवार, 2 दिसंबर 2009

अएनाके की मोल - विनीत ठाकुर

अएनाके की मोल आन्ह रके शहरमे
लागे उल्टाी मुँह सुल्टाा अपने नजरमे
ज्ञानक शुरमा लगाकऽ जे बजबैय गाल
व्यावहारमे देखल ओकरो उहे ताल
मोन भितरके दर्पण सेहो चुरचुर
एतऽसँ मानवता भागल अछि कोशो दुर
घुमे दिनमे दरिन्दाह ओढी सज्ज नके खोल
कतहुँ देखल मातम कतहुँ बाजे ढोल
अएनाके की मोल आन्ह रके शहरमे
लागे उल्टाी मुँह सुल्टाज अपने नजरमे
जे समाज सुधारक करैय किशुनकेर
ओकरे पाछु मुसना कहबैय शवाशेर
जा धैर नहि हाएत मोन सँ मदपन नाश
करत लोक कोनाकऽ विनीत भावक आश
अएनाके की मोल आन्ह रके शहरमे
लागे उल्टाी मुँह सुल्टाा अपने


~: विनीत ठाकुर :~