धूमकेतु-कविता - मिथिला दैनिक

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शनिवार, 10 अक्तूबर 2009

धूमकेतु-कविता



कविता थिक निश्शंक सार्थक शिलालेख कालक आतंकक
कविता मनुखक सत्य शाश्वत
कविता महज ईमान थिक
काव्य-विघटन-बीच काव्य अक्षर आस्था
कविता मनुखक मनुख हेबाक प्रमाण थिक।
कविता उपस्थित बात थिक दहकैत
बात, एकदम सोझ आ सपाट धधरा
युग-युगक संचित-दमित मनुषत्व के अवमानना के
कार्बनित महुराएल ज्वाला
कविता जीहक धार हन-हन आ कुलिश-सम दाँत
ढाहि क’ पाखण्ड के चट्टान
मुखर करतै अपन परिभाषा, अपन सन्दर्भ सन्धानक
नव जन-गणक उद्दाम जिज्ञासा
आ जन-जनक प्राणक भितरिया शान्ति के
आकांक्षाक निनाद
आ, मुक्तिकामी महत्तम आरोहणक अनुगूंज।

जे जनै छथि बात
आ देबालक लिखलाहाकें बाँचि सकै छथि, गूनि सकै छथि
तिनका कथीक बध लागल छनि?
वाक हरण भ’ कोन देशक कोन बैंकमे बन्द पड़ल छनि?
च वा हि तु भेद मात्रा कविता जनैत अछि।

जे शोणितमे बारि अपन अँतड़ी के टेमी
कुल्लम साजल महल अटारी
राजकक्ष आलोकित कएने छथि
जनिक रिक्ततामे बेहोशीक किसिम-किसिम के गैसक धूआँ
चुप्पेचाप भरल जाइत छनि दीना-राति
तिनके विवश निसट्ठ आँखि के
मार्मिक मूक मुदा औनाइत तप्पत आखर
उमड़ि सहज कविता बनैत अछि।
स्वयंसिद्ध अधिकार मनुख के हेरा जाइ छै जखने
वा विस्तृत आकास मनुख के लागि जाइत छै बन्हकी
वा पाखण्डक अन्हरजालमे
ओझरा जाइ छै सत्य मनुख के

तेहने कोनो विकट लग्नमे
फोड़ि कतौ धरती के छाती
अकस्मात अपरिपथगामी जनक आँखिमे
लहकि लपटि कविता जरैत अछि।

सभसँ ऊपर सत्य मनुक्खक
तै सँ ऊपर किछु नहि, किछु नहि
ताही सत्यक जयोद्घोषमे
कविता अछि अर्पित नित सहजहि।