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सुभाषचन्द्र यादवजीक “बनैत बिगड़ैत” कथा-संग्रहक सभ कथामे सँ अधिकांशमे ई भेटत जे कथा खिस्सासँ बेशी एकटा थीम लए आगाँ बढ़ल अछि आ अपन काज खतम करितहि अन्त प्राप्त कएने अछि। दोसर विशेषता अछि एकर भाषा। बलचनमाक भाषा ओहि उपन्यासक मुख्य पात्रक आत्मकथात्मक भाषा अछि मुदा एतए ई भाषा कथाकारक अपन छन्हि आ ताहि अर्थेँ ई एकटा विशिष्ट स्वरूप लैत अछि। एक दिस कथाक उपदेशात्मक खिस्सा-पिहानी स्वरूप ग्रहण करबाक परिपाटीक विरुद्ध सुभाषजीक कथाकेँ एकटा सीमित परिमितिमे थीम लऽ कए चलबाक, भाषाक शिल्प जे खाँटी देशी अछि पर ध्यान देबाक सम्मिलित कारणसँ पाठकक एक वर्गकेँ एहि संग्रहक कथा सभमे असीम आनन्द भेटतन्हि तँ संगे-संग खिस्सा-पिहानीसँ बाहर नहि आबि सकल पाठक वर्गकेँ ई कथा संग्रह निराश नहि करत वरन हुनकर सभक रुचिक परिष्करण करत।
किछु भाषायी मानकीकरण प्रसंग- जेना ऐछ, अछि, अ इ छ । जाहि कालमे मानकीकरण भऽ रहल छल ओहि समय एहिपर ध्यान देबाक आवश्यकता रहए। जेना “जाइत रही” केँ “जाति रही” लिखी आ फेर जाति (जा इ त) लेल प्रोनन्सिएशनक निअम बनाबी तेहने सन ऐछ संगे अछि। मुदा आब देरी भऽ गेल अछि से लेखको कनियाँ-पुतरा मे एकर प्रयोग कए दिशा देखबैत छथि मुदा दोसर कथा सभमे घुरि जाइत छथि। मुदा एहिसँ ई आवश्यकता तँ सिद्ध होइते अछि जे एकटा मानक रूप स्थिर कएल जाए आ “छै” लिखबाक अछि तँ सेहो ठीक आ “छैक” लिखबाक अछि तँ “अन्तक ’क’ साइलेन्ट अछि” से प्रोनन्सिएशनक निअम बनए। मुदा से जल्दी बनए आ सर्वग्राह्य होअए तकर बेगरता हमरा बुझाइत अछि, आजुक लोककेँ “य” लिखल जाए वा “ए” एहिपर भरि जिनगी लड़बाक समय नहि छै, जे ध्वनि सिद्धांत कहैत अछि से मानू, आ नहि तँ प्रोनन्सिएशनक निअम बनाऊ। “नहि” लेल “नञि” लिखब तँ बुझबामे अबैत अछि मुदा नइँ (अन्तिका), नइं (एन.बी.टी.) आ नँइ (साकेतानन्द - कालरात्रिश्च दारुणा) मे सँ साकेतानन्दजी बला प्रयोग ध्वनि-विज्ञान सिद्धांतसँ बेशी समीचीन सिद्ध होइत अछि आ से विश्वास नहि होअए तँ ध्वनि प्रयोगशाला सभक मदति लिअ।(वैज्ञानिक आ मानक मैथिली वर्णमालाक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइवक (http://www.videha.co.in/) विदेह ऑडियो लिंकपर डाउनलोड/श्रवण लेल उपलब्ध अछि।)
“बनैत बिगड़ैत” पोथीक ई एकटा विशेषता अछि जे सुभाषचन्द्र यादवजी अपन विशिष्ट लेखन-शैलीक प्रयोग कएने छथि जे ध्वन्यात्मक अछि आ मानकीकरण सम्वादकेँ आगाँ लए जएबामे सक्षम अछि।

कथाक यात्रा- वैदिक आख्यान, जातक कथा, ऐशप फेबल्स, पंचतंत्र आ हितोपदेश आ संग-संग चलैत रहल लोकगाथा सभ। सभ ठाम अभिजात्य वर्गक कथाक संग लोकगाथा रहिते अछि।
कथामे असफलताक सम्भावना उपन्यास-महाकाव्य-आख्यान सँ बेशी होइत अछि, कारण उपन्यास अछि “सोप ओपेरा” जे महिनाक-महिना आ सालक-साल धरि चलैत अछि आ सभ एपीसोडक अन्तमे एकटा बिन्दुपर आबि खतम होइत अछि। माने सत्तरि एपीसोडक उपन्यासमे उन्हत्तरि एपीसोड धरि तँ आशा बनिते अछि जे कथा एकटा मोड़ लेत आ अन्त धरि जे कथाक दिशा नहिए बदलल तँ पुरनका सभटा एपीसोड हिट आ मात्र अन्तिम एपीसोड फ्लॉप। मुदा कथा एकर अनुमति नहि दैत अछि। ई एक एपीसोड बला रचना छी आ नीक तँ खूबे नीक आ नहि तँ खरापे-खराप।

कथा-गाथा सँ बढ़ि आगू जाइ तँ आधुनिक कथा-गल्पक इतिहास उन्नैसम शताब्दीक अन्तमे भेल। एकरा लघुकथा, कथा आ गल्पक रूप मानल गेल। ओना एहि तीनूक बीचक भेद सेहो अनावश्यक रूपसँ व्याख्यायित कएल गेल। रवीन्द्रनाथ ठाकुरसँ शुरु भेल ई यात्रा भारतक एक कोनसँ दोसर कोन धरि सुधारवाद रूपी आन्दोलनक परिणामस्वरूप आगाँ बढ़ल। असमियाक बेजबरुआ, उड़ियाक फकीर मोहन सेनापति, तेलुगुक अप्पाराव, बंगलाक केदारनाथ बनर्जी ई सभ गोटे कखनो नारीक प्रति समर्थनमे तँ कखनो समाजक सूदखोरक विरुद्ध अबैत गेलाह। नेपाली भाषामे “देवी को बलि” सूर्यकान्त ज्ञवाली द्वारा दसहराक पशुबलि प्रथाक विरुद्ध लिखल गेल। कोनो कथा प्रेमक बंधनक मध्य जाति-धनक सीमाक विरुद्ध तँ कोनो दलित समाजक स्थिति आ धार्मिक अंधविश्वासक विषयमे लिखल गेल। आ ई सभ करैत सर्वदा कथाक अन्त सुखद होइत छल सेहो नहि।
वाद: साहित्य: उत्तर आधुनिक, अस्तित्ववादी, मानवतावादी, ई सभ विचारधारा दर्शनशास्त्रक विचारधारा थिक। पहिने दर्शनमे विज्ञान, इतिहास, समाज-राजनीति, अर्थशास्त्र, कला-विज्ञान आ भाषा सम्मिलित रहैत छल। मुदा जेना-जेना विज्ञान आ कलाक शाखा सभ विशिष्टता प्राप्त करैत गेल, विशेष कए विज्ञान, तँ दर्शनमे गणित आ विज्ञान मैथेमेटिकल लॉजिक धरि सीमित रहि गेल। दार्शनिक आगमन आ निगमनक अध्ययन प्रणाली, विश्लेषणात्मक प्रणाली दिस बढ़ल। मार्क्स जे दुनिया भरिक गरीबक लेल एकटा दैवीय हस्तक्षेपक समान छलाह, द्वन्दात्मक प्रणालीकेँ अपन व्याख्याक आधार बनओलन्हि। आइ-काल्हिक “डिसकसन” वा द्वन्द जाहिमे पक्ष-विपक्ष, दुनू सम्मिलित अछि, दर्शनक (विशेष कए षडदर्शनक- माधवाचार्यक सर्वदर्शन संग्रह-द्रष्टव्य) खण्डन-मण्डन प्रणालीमे पहिनहिसँ विद्यमान छल।
से इतिहासक अन्तक घोषणा कएनिहार फ्रांसिस फुकियामा -जे कम्युनिस्ट शासनक समाप्तिपर ई घोषणा कएने छलाह- किछु दिन पहिने एहिसँ पलटि गेलाह। उत्तर-आधुनिकतावाद सेहो अपन प्रारम्भिक उत्साहक बाद ठमकि गेल अछि। अस्तित्ववाद, मानवतावाद, प्रगतिवाद, रोमेन्टिसिज्म, समाजशास्त्रीय विश्लेषण ई सभ संश्लेषणात्मक समीक्षा प्रणालीमे सम्मिलित भए अपन अस्तित्व बचेने अछि।
साइको-एनेलिसिस वैज्ञानिकतापर आधारित रहबाक कारण द्वन्दात्मक प्रणाली जेकाँ अपन अस्तित्व बचेने रहत।
आधुनिक कथा अछि की? ई केहन होएबाक चाही? एकर किछु उद्देश्य अछि आकि होएबाक चाही? आ तकर निर्धारण कोना कएल जाए ?
कोनो कथाक आधार मनोविज्ञान सेहो होइत अछि। कथाक उद्देश्य समाजक आवश्यकताक अनुसार आ कथा यात्रामे परिवर्तन समाजमे भेल आ होइत परिवर्तनक अनुरूपे होएबाक चाही। मुदा संगमे ओहि समाजक संस्कृतिसँ ई कथा स्वयमेव नियन्त्रित होइत अछि। आ एहिमे ओहि समाजक ऐतिहासिक अस्तित्व सोझाँ अबैत अछि।
जे हम वैदिक आख्यानक गप करी तँ ओ राष्ट्रक संग प्रेमकेँ सोझाँ अनैत अछि। आ समाजक संग मिलि कए रहनाइ सिखबैत अछि।
जातक कथा लोक-भाषाक प्रसारक संग बौद्ध-धर्म प्रसारक इच्छा सेहो रखैत अछि।
मुस्लिम जगतक कथा जेना रूमीक “मसनवी” फारसी साहित्यक विशिष्ट ग्रन्थ अछि जे ज्ञानक महत्व आ राज्यक उन्नतिक शिक्षा दैत अछि।
आजुक कथा एहि सभ वस्तुकेँ समेटैत अछि आ एकटा प्रबुद्ध आ मानवीय (!) समाजक निर्माणक दिस आगाँ बढ़ैत अछि। आ जे से नहि अछि तँ ई ओकर उद्देश्यमे सम्मिलित होएबाक चाही। आ तखने कथाक विश्लेषण आ समालोचना पाठकीय विवशता बनि सकत।
कम्यूनिस्ट शासनक समाप्ति आ बर्लिनक देबालक खसबाक बाद फ्रांसिस फुकियामा घोषित कएलन्हि जे विचारधाराक आपसी झगड़ासँ सृजित इतिहासक ई समाप्ति अछि आ आब मानवक हितक विचारधारा मात्र आगाँ बढ़त। मुदा किछु दिन पहिनहि ओ एहि मतसँ आपस भऽ गेलाह आ कहलन्हि जे समाजक भीतर आ राष्ट्रीयताक मध्य एखनो बहुत रास भिन्न विचारधारा बाँचल अछि। तहिना उत्तर आधुनिकतावादी विचारक जैक्स देरीदा भाषाकेँ विखण्डित कए ई सिद्ध कएलन्हि जे विखण्डित भाग ढेर रास विभिन्न आधारपर आश्रित अछि आ बिना ओकरा बुझने भाषाक अर्थ हम नहि लगा सकैत छी।
मनोविश्लेषण आ द्वन्दात्मक पद्धति जेकाँ फुकियामा आ देरीदाक विश्लेषण सेहो संश्लेषित भए समीक्षाक लेल स्थायी प्रतिमान बनल रहत।
सुभाष चन्द्र यादवक कथा-संग्रह बनैत बिगड़ैत:
स्वतन्त्रताक बादक पीढ़ीक कथाकार छथि सुभाषजी। कथाक माध्यमसँ जीवनकेँ रूप दैत छथि। शिल्प आ कथ्य दुनूसँ कथाकेँ अलंकृत कए कथाकेँ सार्थक बनबैत छथि। अस्तित्वक लेल सामान्य लोकक संघर्ष तँ एहि स्थितिमे हिनकर कथा सभमे भेटब स्वाभाविके। कएक दशक पूर्व लिखल हिनक कथा “काठक बनल लोक” क बदरिया साइते संयोग हंसैत रहए। एहु कथा संग्रहक सभ पात्र एहने सन विशेषता लेने अछि। हॉस्पीटलमे कनैत-कनैत सुतलाक बाद उठि कए कोनो पात्र फेरसँ कानए लगैत छथि तँ कोनो पात्र प्रेममे पड़ल छथि। किनकोमे बिजनेस सेन्स छन्हि तँ हरिवंश सन पात्र सेहो छथि जे उपकारक बदला सिस्टम फॉल्टक कारण अपकार कए जाइत छथि। आब “बनैत बिगड़ैत” कथा संग्रहक कथा सभपर गहिंकी नजरि दौगाबी।
कनियाँ-पुतरा- एहि कथामे रस्तामे एकटा बचिया लेखकक पएर छानि फेर ठेहुनपर माथ राखि निश्चिन्त अछि, जेना माएक ठेहुनपर माथ रखने होअए। नेबो सन कोनो कड़गर चीज लेखकसँ टकरेलन्हि। ई लड़कीक छाती छिऐ। लड़की निर्विकार रहए जेना बाप-दादा वा भाए बहिन सऽ सटल हो। लेखक सोचैत छथि, ई सीता बनत की द्रौपदी। राबन आ दुर्जोधनक आशंका लेखककेँ घेर लैत छन्हि।
कनियाँ-पुतरा पढ़बाक बाद वैह सड़कक चौबटिया अछि आ वैह रेड-लाइटपर गाड़ी चलबैत-रोकैत काल बालक-बालिका सभ देखबामे अबैत छथि। मुदा आब दृष्टिमे परिवर्तन भऽ जाइत अछि। कारक शीसा पोछि पाइ मँगनिहार बालक-बालिकाकेँ पाइ-देने वा बिन देने, मुदा बिनु सोचने आगाँ बढ़ि जाएबला दृष्टिक परिवर्तन। कनियाँ-पुतरा पढ़बाक बाद की हुनकर दृष्टिमे कोनो परिवर्तन नहि होएतन्हि? बालक तँ पैघ भए चोरि करत वा कोनो ड्रग कार्टेलक सभसँ निचुलका सीढ़ी बनत मुदा बालिका ? ओ सीता बनत आकि द्रौपदी आकि आम्रपाली। जे सामाजिक संस्था, ह्यूमन राइट्स ऑरगेनाइजेशन कोनो प्रेमीक बिजलीक खाम्हपर चढ़ि प्राण देबाक धमकीपर नीचाँ जाल पसारि कऽ टी.वी.कैमरापर अपन आ अपन संस्थाक नाम प्रचारित करैत छथि ओ एहि कथाकेँ पढ़लाक बाद ओहि पुरातन दृष्टिसँ काज कए सकताह? ओ सरकार जे कोनो हॉस्पीटलक नाम बदलि कए जयप्रकाश नारायणक नामपर करैत अछि वा हार्डिंग पार्कक नाम वीर कुँअर सिंहक नामपर कए अपन कर्त्तव्यक इतिश्री मानि लैत अछि ओ समस्याक जड़ि धरि पहुँचि नव पार्क आ नव हॉस्पीटल बना कए जयप्रकाश नारायण आ वीर कुँअर सिंहक नामपर करत आकि दोसरक कएल काजमे “मेड बाइ मी” केर स्टाम्प लगाओत? ई संस्था सभ आइ धरि मेहनतिसँ बचैत अएबाक आ सरल उपाय तकबाक प्रवृत्तिपर रोक नहि लगाओत?
असुरक्षित- ट्रेनसँ उतरलाक बाद घरक २० मिनटक रस्ताक राति जतेक असुरक्षित भऽ गेल अछि तकर सचित्र वर्णन ई कथा करैत अछि। पहिने तँ एहन नहि रहैक- ई अछि लोकक मानसिक अवस्था। मुदा एहि तरहक समस्या दिस ककरो ध्यान कहाँ छै। पैघ-पैघ समस्या, उदारीकरण आन कतेक विषयपर मीडिआक ध्यान छै। चौक-चौराहाक एहि तरहक समस्यापर नव दृष्टि अबैत अछि, एहिमे स्टेशनसँ घरक बीचक दूरी रातिक अन्हारमे पहाड़ सन भऽ जाइत अछि। प्रदेशक तत्कालीन कानून-व्यवस्थापर ई एक तरहक टिप्पणी अछि।
एकाकी- एहि कथामे कुसेसर हॉस्पीटलमे छथि। हॉस्पीटलक सचित्र विवरण भेल अछि। ओतए एकटा स्त्री पतिक मृत्युक बाद कनैत-कनैत प्रायः सुति गेलि आ फेर निन्न टुटलापर कानए लागलि। एना होइत अछि। कथाकार मानव जीवनक एकटा सत्यता दिस इशारा दैत आ हॉस्पीटलक बात-व्यवस्थापर टिप्पणी तेना भऽ कए नहि वरण जीवन्तता देखा कए करैत छथि।
ओ लड़की- एहि कथामे हॉस्टलक लड़का-लड़कीक जीवनक बीच नवीन नामक युवक एकटा लड़कीक हाथमे ऐंठ खाली कप, जे ओहि लड़कीक आ ओकर प्रेमीक अछि, देखैत अछि। लड़की नवीनकेँ पुछैत छै जे ओ केम्हर जा रहल अछि। नवीनकेँ होइत छै जे ओ ओकरा अपनासँ दब बुझि कप फेंकबाक लेल पुछलक। नवीन ओकरा मना कऽ दैत अछि। विचार सभ ओकर मोनमे घुरमैत रहैत छै। ई कथा एकटा छोट घटनापर आधारित अछि...जे ओ हमरा दब बूझि चाहक कप फेकबाक लेल कहलक? आ ओ दृढ़तासँ नहि कहि आगाँ बढ़ि जाइत अछि। एकाकी जेकाँ ई कथा सेहो मनोवैज्ञानिक विश्लेषणपर आधारित अछि।
एकटा प्रेम कथा- पहिने जकरा घरमे फोन रहैत छल तकरा घरमे दोसराक फोन अबैत रहैत छल, जे एकरा तँ ओकरा बजा दिअ। लेखकक घरमे फोन छलन्हि आ ओ एकटा प्रेमीक प्रेमिकाक फोन अएलापर, ओकर प्रेमीकेँ बजबैत रहैत छथि। प्रेमी मोबाइल कीनि लैत अछि से फोन आएब बन्द भऽ जाइत अछि। मुदा प्रेमी द्वारा नम्बर बदलि लेलापर प्रेमिकाक फोन फेरसँ लेखकक घरपर अबैत अछि। प्रेमिका, प्रेमीक ममियौत बहिनक सखी रितु छथि आ लेखक ओकर सहायताक लेल चिन्तित भऽ जाइत छथि। एहि कथामे प्रेमी-प्रेमिका, मोबाइल आ फोन ई सभ नव युगक संग नव कथामे सेहो स्वाभाविक रूपेँ अबैत अछि।
टाइटल कथा अछि बनैत-बिगड़ैत। तीन टा नामित पात्र । माला, ओकर पति सत्तो आ पोती मुनियाँ । गाम-घरक जे सास-पुतोहुक गप छै, सेहन्ता रहि गेल जे कहियो नहेलाक बाद खाइ लेल पुछितए, एहन सन। मुदा सैह बेटा-पुतोहु जखन बाहर चलि जाइत छथि तँ वैह सासु कार कौआक टाहिपर चिन्तित होमए लगैत छथि। माइग्रेशनक बादक गामक यथार्थकेँ चित्रित करैत अछि ई कथा। सत्तोक संग कौआ सेहो एक दिन बिला जाएत आ मुनियाँ कौआ आ दादा दुनूकेँ तकैत रहत।प्रवासीक कथा, बेटा-पुतोहुक आ पोतीक कथा, सासु-पुतोहुक झगड़ा आ प्रेम !
अपन-अपन दुःख कथामे पत्नी, अपन अवहेलनाक स्थितिमे, धीया-पुताकेँ सरापैत छथि। रातिमे धीया-पुताक खेनाइ, खा लेबा उत्तर भनसाघरक ताला बन्द रहबाक स्थितिमे पत्नीक भूखल रहब आ परिणामस्वरूप पतिक फोंफक स्वरसँ कुपित होएब स्वाभाविक। सभक अपन संसार छै। लोक बुझैए जे ओकरे संसारक सुख आ दुःख मात्र सम्पूर्ण छै मुदा से नहि अछि। सभक अपन सुख-दुःख छै, अपन आशा आ आकांक्षा छै। कथाकार ओहन सत्यकेँ उद्घाटित करैत छथि, जे हुनकर अनुभवक अंतर्गत अबैत छन्हि। आत्मानुभूति परिवेश स्वतंत्र कोना भए सकत आ से सुभाष चन्द्र यादवजीक सभ कथामे सोझाँ अबैत अछि।
आतंक कथामे कथाकारकेँ पुरान संगी हरिवंशसँ कार्यालयमे भेँट होइत छन्हि। लेखकक दाखिल-खारिज बला काज एहि लऽ कऽ नहि भेलन्हि जे हरिवंशक स्थानान्तरणक पश्चात् ने क्यो हुनकासँ घूस लेलक आ ताहि द्वारे काजो नहि केलक। हरिवंशक बगेबानी घूसक अनेर पाइक कारण छल से दोसर किएक अपन पाइ छोड़त ? लेखक आतंकित छथि। कार्यालयक परिवेश, भ्रष्टाचार आ एक गोटेक स्थानांतरणसँ बदलैत सामाजिक सम्बन्ध ई सभ एतए व्यक्त भेल अछि। आइ काल्हि हम आकि अहाँ ब्लॉकमे वा सचिवालयमे कोनो काज लेल जाइत छी, तँ यैह ने सुनए पड़ैत अछि, जे पाइ जे माँगत से दए देबैक आ तखन कोनो दिक्कत होअए तँ कहब ! आ पाइक बदला ककरो नाम वा पैरवी लए गेलहुँ तँ कर्मचारी ने पाइये लेत आ नहिये अहाँक काज होएत।
एकटा अन्त कथामे ससुरक मृत्युपर लेखकक साढ़ू केश कटेने छथि आ लेखक नहि, एहिपर कैक तरहक गप होइत अछि। साढ़ू केश कटा कऽ निश्चिन्त छथि। ई जे सांस्कृतिक सिम्बोलिज्म आएल अछि, जे पकड़ा गेल से चोर आ खराप काज केनिहार, जे नहि पकड़ाएल से आदर्शवादी। पूरा-पूरी तँ नहि, मुदा अहू कथामे एहने आस्था जन्म लैत अछि आ टूटि जाइत अछि। हरियाणामे बापो मरलापर लोक केश नहि कटबैत अछि, तँ की ओकर दुःखमे कोनो कमी रहैत छै तेँ ? पंजाबक महिला एक बरखक बाद ने सिनूर लगबैत छथि आ ने चूड़ी पहिरैत छथि मुदा पहिल बरख कान्ह धरि चूड़ी भरल रहैत छन्हि, तँ की बियाहक पहिल बरखक बाद हुनकर पति-प्रेममे कोनो घटंती आबि जाइत छन्हि ?
कबाछु कथा मे चम्पीबलाक लेखक लग आएब, जाँघपर हाथ राखब। अभिजात्य संस्कारक लोक लग बैसल रहबाक कारणसँ लेखक द्वारा ओकर हाथ हटाएब । चम्पीबला द्वारा ई गप बाजब जे छुअल देहकेँ छूलामे कोन संकोच। जेना चम्पीवला लेखककेँ बुझाइय रहन्हि जे हुनका युवती बुझि रहल छलन्हि। लेखककेँ लगैत छन्हि जे ओ स्त्री छथि आ चम्पीबला ओकर पुरान यार। ठाम-कुठाम आ समय-कुसमयक महीन समझ चम्पीवलाकेँ नहि छइ, नहि तँ लेखक ओतेक गरमीयोमे चम्पी करा लैतए। चम्पीवलाक दीनतापर अफसोच भेलन्हि मुदा ओकर शी-इ-इ केँ मोन पाड़ैत वितृष्णा सेहो। फ्रायडक मनोविश्लेषणक बड्ड आलोचना भेल जे ओ सेक्सकेँ केन्द्रमे राखि गप करैत छथि। मुदा अनुभवसँ ई गप सोझाँ अबैत अछि जे सेक्ससँ जतेक दूरी बनाएब, जतेक एकरा वार्तालाप-कथा-साहित्यसँ दूर राखब, ओकर आक्रमण ततेक तीव्र होएत।
कारबार मे लेखकक भेँट मिस्टर वर्मा, सिन्हा आ दू टा आर गोटेसँ होइत अछि। बार मे सिन्हा दोस्ती आ बिजनेसकेँ फराक कहैत दू टा खिस्सा सुनबैत अछि। सभ चीजक मोल अछि, एहिपर एकटा दोस्तक वाइफ लेल टी.वी. किनबाक बाद फ्रिजक डिमान्ड अएबाक गप बीचेमे खतम भऽ जाइत अछि। दोसर खिस्सामे एकटा स्त्री पतिक जान बचबए लेल डॉक्टरक फीस देबाक लेल पूर्व प्रेमी लग जाइत अछि। पूर्व प्रेमी पाइ देबाक बदलामे ओकरा संगे राति बितबए लेल कहैत छै। सिन्हा एहि कथामे ककरो गलती नहि मानैत छथि, डॉक्टर बिना पाइ लेने किएक इलाज करत, पूर्व प्रेमी मँगनीमे पाइ किएक देत आ ओ स्त्री जे पूर्व प्रेमी संग राति नहि बिताओत, तँ ओकर पति मरि जएतैक।
आब बारसँ लेखक निकलैत छथि तँ दरबानक सलाम मारलापर अहूमे पैसाक टनक सुनाइ पड़ए लगैत छन्हि। प्राचीन मूल्य, दोस्ती-यारी आ आदर्शक टूटबाक स्थिति एकटा एकाकीपनक अनुभव करबैत अछि।
कुश्ती मे सेहो फ्रायड सोझाँ अबैत छथि, कथाक प्रारम्भ लुंगीपरक सुखाएल कड़गर भेल दागसँ शुरू होइत अछि। मुदा तुरत्ते स्पष्ट होइत अछि, जे ओ से दाग नहि अछि, वरन घावक दाग अछि। फेर हाटक कुश्तीमे गामक समस्याक निपटारा, हेल्थ सेन्टरक बन्द रहब, ओतए ईंटाक चोरिक चरचा अबैत अछि। छोट भाइ कोनो इलाजक क्रममे एलोपैथीसँ हटि कए होम्योपैथीपर विश्वास करए लगैत छथि, एहि गपक चरचा आएल अछि। लोक सभक घावक समाचार पुछबा लऽ अएनाइ आ लेखक द्वारा सभकेँ विस्तृत विवरण कहि सुनओनाइ मुदा उमरिमे कम वयसक कैक गोटेकेँ टारि देनाइ, ई सभ क्रम एकटा वातावरणक निर्माण करैत अछि।
कैनरी आइलैण्डक लारेल कथामे सुभाष आ उपिया कथाक चरित्र छथि। एतए एकटा बिम्ब अछि- जेना निर्णय कोसीक धसना जकाँ। ममियौत भाइक चिट्ठी, कटारि देने नाहपर जएबाक, गेरुआ पानिक धारमे आएब, नाहक छीटपर उतारब, छीटक बादो बहुत दूर धरि जाँघ भरि पानिक रहब। धीपल बालुपर साइकिलकेँ ठेलैत देखि क्यो कहैत छन्हि- “साइकिल ससुरारिमे देलक-ए? कने बड़द जकाँ टिटकार दियौक”। दीदी-पीसा अहिठाम एहि गपक चरचा सुनलन्हि, जे कोटक खातिर हुनकर बेटीक विवाह दू दिन रुकि गेल छलन्हि आ ईहो जे बेसी पढ़ने लोक बताह भऽ जाइत अछि।सुभाष चाहियो कऽ दू सए टाका नहि माँगि पबैत छथि, दीदीक व्यवहार अस्पष्ट छन्हि, सुभाष आश्वस्त नहि छथि आ घुरि जाइत छथि।
तृष्णा कथामे लेखककेँ अखिलन भेटैत छन्हि। श्रीलतासँ ओ अपन भेँटक विवरण कहि सुनबैत अछि। पाँचम दिन घुरलाक बाद ट्रेनमे ओ नहि भेटलीह। आब अखिलन की करत, विशाखापत्तनम आ विजयवाड़ाक बीचक रस्तामे चक्कर काटत आकि स्मृतिक संग दिन काटत।
छोट-छोट भावनात्मक घटनाक विश्लेषण अछि कथा “कैनरी आइलैण्डक लारेल” आ “तृष्णा”।
दाना कथामे मोहन इन्टरव्यू लेल गेल अछि, ओतए सहृदय चपरासी सूचित करैत छै जे बाहरीकेँ नहि लैत छै, पी.एच.डी. रहितए तँ कोनो बात रहितए। मोहनकेँ सभ चीज बीमार आ उदास लगैत रहए। फुद्दी आ मैना पावरोटीक टुकड़ीपर ची-ची करैत झपटैत रहए।प्रतियोगी परीक्षाक साक्षात्कारमे बाहरी आ लोकल केर जे संकल्पना आएल अछि तकर सम्वेदनात्मक वर्णन भेल अछि।
दृष्टि कथामे पढ़ाइ खतम भेलाक बाद नोकरीक खोज, गाममे लोकसभक तीक्ष्ण कटाक्ष। फेर दक्षिण भारतीय पत्रकारक प्रेरणासँ कनियाँक विरोधक बावजूद गाममे लेखकक खेतीमे लागब। ई सभ गप एकटा सामान्य कथ्य रहलाक बादो ठाम-ठाम सामाजिक सत्य उद्घाटित करैत अछि। एतए गामक लोकक कुटीचाली अछि, जे काजक अभावमे खाली समय बेशी रहलाक कारण अबैत अछि। संगमे आइ-काल्हिक स्त्रीक शहरी जीवन जीबाक आकांक्षा सेहो प्रदर्शित करैत अछि।
नदी कथामे कथ्य कथाक संगे चलैत अछि आ खतम भए जाइत अछि। गगनदेवक घरपर बिहारी आएल छै। शहरमे ओकरा एक साल रहबाक छै। गगनदेवकेँ ओकरा संग मकान खोजबाक क्रममे एकटा लड़कीसँ भेँट होइत छै। ओकरा छोड़ि आगाँ बढ़ल तँ ई बुझलाक बादो जे आब ओकरासँ फेर भेँट नहि हेतइ ओ उल्लास आ प्रेमक अनुभूतिसँ भरि गेल।
परलय बाढिक कथा थिक, कोसीक कथा कहल गेल अछि एतए। बौकी बुनछेकक इन्तजारीमे अछि। मुदा धारमे पानि बढ़ि रहल छै। कोशीक बाढ़ि बढ़ल आबि रहल छै आ एम्हर माएक रद्द-दस्तसँ हाल-बेहाल छै। माल-जाल भूखसँ डिकरैत रहै। रामचरनक घरमे अन्नपानि बेशी छै से ओ सभकेँ नाहक इन्तजाम लेल कहैत छै। बौकूक घरसँ कटनियाँ दूर रहै। मृत्यु आ विनाश बौकूकेँ कठोर बना देलकैक, मोह तोड़ि देलकैक। मुदा बरखा रुकि गेलैक। बौकू चीज सभकेँ चिन्हबाक आ स्मरण करबाक प्रयत्न करए लागल।
बात कथामे सेहो कथाकार अपन कथानककेँ बाट चलिते ताकि लैत छथि आ शिल्पसँ ओकरा आगाँ बढ़बैत छथि। नेबो दोकानपर नेबोवला आ एकटा लोकक बीचमे बहस सुनैत लेखक बीचमे कूदि पड़ैत छथि। नेबोवलासँ एक गोटे अपन छत्ता माँगि रहल अछि जे ओ नीचाँ रखने रहए।दुखक गप, लेखकक अनुसार, बेशी दिन धरि लोककेँ मोन रहैत छै।
रंभा कथामे पुरुष-स्त्रीक बीचक बदलैत सम्बन्धक तीव्र गतिसँ वर्णन भेल अछि। पुरुष यावत स्त्रीसँ दूर रहैत अछि तँ सभ ओकरा मेनका आ रम्भा देखाइ पड़ैत छै। मुदा जे सम्वादक प्रारम्भ होइत अछि तँ बादमे लेखक केँ लगैत छन्हि जे ओ बेटीये छी।रस्तामे एक स्त्री अबैत अछि। लेखक सोचैत छथि जे ई के छी, रम्भा, मेनका आकि...। ओकरा संग बेटा छै, ओतेक सुन्नर नहि, कारण एकर वर सुन्दर नहि होएतैक। ओ गपशपमे कखनो लेखककेँ ससुर जकाँ, कखनो अपनाकेँ हुनकर बेटी तुल्य कहैत अछि। पहिने लेखककेँ खराप लगलन्हि। मुदा बादमे लेखककेँ नीक लगलन्हि। मुदा अन्तमे ओकर पएर छूबए लेल झुकब मुदा बिन छूने सोझ भऽ जाएब नहि बुझिमे अएलन्हि।
हमर गाम कथामे लेखकक गामक रस्ता, कटनियाँ सँ मेनाही गामक लोकक छिड़िआएब आ बान्हक बीचमे अहुरिया काटैत लोकक वर्णन अछि। कोसिकन्हाक लोक- जानवरक समान, जानवरक हालतमे। कटनियाँमे लेखकक घर कटि गेलन्हि से ओ नथुनियाँ एहिठाम टिकैत छथि। मछबाहि आ चिड़ै बझाबऽ लेल नथुनी जोगार करैत अछि। जमीनक झगड़ा छन्हि, एक हिस्सेदारक जमीन धारमे डूमल छै से ओ लेखकक गहूमवला खेत हड़पए चाहैत अछि। शन आ स्त्रीक (!) पाछू लोक बेहाल अछि।
स्त्रीक पाछू बिन कारण लेखक पड़ि गेल छथि जेना विष्णु शर्मा पंचतंत्रमे कथा कहैत-कहैत शूद्र आ महिलाक पाछाँ पड़ि जाइत छथि।
यावत सभ कमलक घूर लग कपक अभावमे बेरा-बेरी चाह पिबैत छथि, फसिल कटि कऽ सिबननक एतए चलि जाइ-ए। झौआ, कास, पटेरक जंगल जखन रहए, चिड़ै बड्ड आबए, आब कम अबैत अछि। खढ़िया, हरिन, माछ, काछु, डोका सभ खतम भऽ रहल छै- जीवनक साधन दुर्लभ भऽ गेल अछि। साँझमे जमीनक पंचैती होइत अछि।सत्तोक बकड़ी मरि गेलैक, पुतोहु एकर कारण सासुक सरापब कहैत अछि। सासु एकर कारण बलि गछलोपर पाठी सभकेँ बेचब कहैत छथि। सत्तोक बेटीक जौबनक उभारकेँ लेखक पुरुष सम्पर्कक साक्षी कहैत छथि आ सकारण फेरसँ महिलाक पाछाँ पड़ि जाइत छथि, कारण ई धारणा लोकमे छै। सत्तोक बेटी एखन सासुर नहि बसैत छै। सुकन रामक एहिठाम खाइत काल लेखककेँ संकोच भेलन्हि, जकरासँ उबरबाक लेल ओ बजलाह- आइ तोरा जाति बना लेलिअह। कोसी सभ भेदभावकेँ पाटि देलक, डोम, चमार, मुसहर, दुसाध, तेली, यादव सभ एके कलसँ पानि भरैत अछि। एके पटियापर बैसैत अछि।
ककरा लेल कथा लिखी? वा कही? कथाक वाद: जिनका विषयमे लिखब से तँ पढ़ताह नहि। कथा पढ़ि लोक प्रबुद्ध भऽ जाएत ? गीताक सप्पत खा कए झूठ बजनिहारक संख्या कम नहि। तेँ की एहन कसौटीपर रचित कथाक महत्व कम भए जाएत ?
सभ प्रबुद्ध नहि होएताह तँ स्वस्थ मनोरंजन तँ प्राप्त कऽ सकताह। आ जे एकोटा व्यक्ति कथा पढ़ि ओहि दिशामे सोचत तँ कथाक सार्थकता सिद्ध होएत। आ जकरा लेल रचित अछि ई कथा जे ओ नहि, तँ ओकर ओहि परिस्थितिमे हस्तक्षेप करबामे सक्षम व्यक्ति तँ पढ़ताह। आ जा ई रहत ताधरि एहि तरहक कथा रचित कएल जाइत रहत।
आ जे समाज बदलत तँ सामाजिक मूल्य सनातन रहत ? प्रगतिशील कथामे अनुभवक पुनर्निर्माण करब, परिवर्तनशील समाजक लेल, जाहिसँ प्राकृतिक आ सामाजिक यथार्थक बीच समायोजन होअए। आकि एहि परिवर्तनशील समयकेँ स्थायित्व देबा लेल परम्पराक स्थायी आ मूल तत्वपर आधारित कथाक आवश्यकता अछि ? व्यक्ति-हित आ समाज-हितमे द्वैध अछि आ दुनू परस्पर विरोधी अछि। एहिमे संयोजन आवश्यक। विश्व दृष्टि आवश्यक। कथा मात्र विचारक उत्पत्ति नहि अछि जे रोशनाइसँ कागतपर जेना-तेना उतारि देलियैक। ई सामाजिक-ऐतिहासिक दशासँ निर्दिशित होइत अछि।
तँ कथा आदर्शवादी होअए, प्रकृतिवादी होअए वा यथार्थवादी होअए। आकि एहिमे सँ मानवतावादी, सामाजिकतावादी वा अनुभवकेँ महत्व देमएबला ज्ञानेन्द्रिय-यथार्थवादी होअए ? आ नहि तँ कथा प्रयोजनमूलक होअए। एहिमे उपयोगितावाद, प्रयोगवाद, व्यवहारवाद, कारणवाद, अर्थक्रियावाद आ फलवाद सभ सम्मिलित अछि। ई सभसँ आधुनिक दृष्टिकोण अछि। अपनाकेँ अभिव्यक्त कएनाइ मानवीय स्वभाव अछि। मुदा ओ सामाजिक निअममे सीमित भऽ जाइत अछि। परिस्थितिसँ प्रभावित भऽ जाइत अछि।
तँ कथा अनुभवकेँ पुनर्रचित कए गढ़ल जाएत। आ व्यक्तिगत चेतना तखन सामाजिक आ सामूहिक चेतना बनि आओत। शोषककेँ अपन प्रवृत्तिपर अंकुश लगबए पड़तन्हि। तँ शोषितकेँ एकर विरोध मुखर रूपमे करए पड़तन्हि।
स्वतंत्रता- सामाजिक परिवर्तन । कथा तखन संप्रेषित होएत, संवादक माध्यम बनत। कथा समाजक लेल शस्त्र तखने बनि सकत, शक्ति तखने बनि सकत।
जे कथाकार उपदेश देताह तँ ज्ञानक हस्तांतरण करताह, जकर आवश्यकता आब नहि छै। जखन कथाकार सम्वाद शुरू करताह तखने मुक्तिक वातावरण बनत आ सम्वादमे भाग लेनिहार पाठक जड़तासँ त्राण पओताह।
कथा क्रमबद्ध होअए आ सुग्राह्य होअए तखने ई उद्देश्य प्राप्त करत। बुद्धिपरक नहि व्यवहारपरक बनत। वैदिक साहित्यक आख्यानक उदारता संवादकेँ जन्म दैत छल जे पौराणिक साहित्यक रुढ़िवादिता खतम कए देलक।
आ संवादक पुनर्स्थापना लेल कथाकारमे विश्वास होएबाक चाही- तर्क-परक विश्वास आ अनुभवपरक विश्वास, जे सुभाषचन्द्र यादवमे छन्हि। प्रत्यक्षवादक विश्लेषणात्मक दर्शन वस्तुक नहि, भाषिक कथन आ अवधारणाक विश्लेषण करैत अछि से सुभाषजीक कथामे सर्वत्र देखबामे आओत। विश्लेषणात्मक अथवा तार्किक प्रत्यक्षवाद आ अस्तित्ववादक जन्म विज्ञानक प्रति प्रतिक्रियाक रूपमे भेल। एहिसँ विज्ञानक द्विअर्थी विचारकेँ स्पष्ट कएल गेल।
प्रघटनाशास्त्रमे चेतनाक प्रदत्तक प्रदत्त रूपमे अध्ययन होइत अछि। अनुभूति विशिष्ट मानसिक क्रियाक तथ्यक निरीक्षण अछि। वस्तुकेँ निरपेक्ष आ विशुद्ध रूपमे देखबाक ई माध्यम अछि। अस्तित्ववादमे मनुष्य-अहि मात्र मनुष्य अछि। ओ जे किछु निर्माण करैत अछि ओहिसँ पृथक ओ किछु नहि अछि, स्वतंत्र होएबा लेल अभिशप्त अछि (सार्त्र)। हेगेलक डायलेक्टिक्स द्वारा विश्लेषण आ संश्लेषणक अंतहीन अंतस्संबंध द्वारा प्रक्रियाक गुण निर्णय आ अस्तित्व निर्णय करबापर जोर देलन्हि। मूलतत्व जतेक गहींर होएत ओतेक स्वरूपसँ दूर रहत आ वास्तविकतासँ लग।
क्वान्टम सिद्धान्त आ अनसरटेन्टी प्रिन्सिपल सेहो आधुनिक चिन्तनकेँ प्रभावित कएने अछि। देखाइ पड़एबला वास्तविकता सँ दूर भीतरक आ बाहरक प्रक्रिया सभ शक्ति-ऊर्जाक छोट तत्वक आदान-प्रदानसँ सम्भव होइत अछि। अनिश्चितताक सिद्धान्त द्वारा स्थिति आ स्वरूप, अन्दाजसँ निश्चित करए पड़ैत अछि।
तीनसँ बेशी डाइमेन्सनक विश्वक परिकल्पना आ स्टीफन हॉकिन्सक “अ ब्रिफ हिस्ट्री ऑफ टाइम” सोझे-सोझी भगवानक अस्तित्वकेँ खतम कए रहल अछि कारण एहिसँ भगवानक मृत्युक अवधारणा सेहो सोझाँ आएल अछि, से एखन विश्वक नियन्ताक अस्तित्व खतरामे पड़ल अछि। भगवानक मृत्यु आ इतिहासक समाप्तिक परिप्रेक्ष्यमे मैथिली कथा कहिया धरि खिस्सा कहैत रहत ? लघु, अति-लघु कथा, कथा, गल्प आदिक विश्लेषणमे लागल रहत?
जेना वर्चुअल रिअलिटी वास्तविकता केँ कृत्रिम रूपेँ सोझाँ आनि चेतनाकेँ ओकरा संग एकाकार करैत अछि तहिना बिना तीनसँ बेशी बीमक परिकल्पनाक हम प्रकाशक गतिसँ जे सिन्धुघाटी सभ्यतासँ चली तँ तइयो ब्रह्माण्डक पार आइ धरि नहि पहुँचि सकब। ई सूर्य अरब-खरब आन सूर्यमेसँ एकटा मध्यम कोटिक तरेगण- मेडिओकर स्टार- अछि। ओहि मेडिओकर स्टारक एकटा ग्रह पृथ्वी आ ओकर एकटा नगर-गाममे रहनिहार हम सभ अपन माथपर हाथ राखि चिन्तित छी जे हमर समस्यासँ पैघ ककर समस्या ? हमर कथाक समक्ष ई सभ वैज्ञानिक आ दार्शनिक तथ्य चुनौतीक रूपमे आएल अछि।
होलिस्टिक आकि सम्पूर्णताक समन्वय करए पड़त ! ई दर्शन दार्शनिक सँ वास्तविक तखने बनत।
पोस्टस्ट्रक्चरल मेथोडोलोजी भाषाक अर्थ, शब्द, तकर अर्थ, व्याकरणक निअम सँ नहि वरन् अर्थ निर्माण प्रक्रियासँ लगबैत अछि। सभ तरहक व्यक्ति, समूह लेल ई विभिन्न अर्थ धारण करैत अछि। भाषा आ विश्वमे कोनो अन्तिम सम्बन्ध नहि होइत अछि। शब्द आ ओकर पाठ केर अन्तिम अर्थ वा अपन विशिष्ट अर्थ नहि होइत अछि।
आधुनिक आ उत्तर आधुनिक तर्क, वास्तविकता, सम्वाद आ विचारक आदान-प्रदानसँ आधुनिकताक जन्म भेल । मुदा फेर नव-वामपंथी आन्दोलन फ्रांसमे आएल आ सर्वनाशवाद आ अराजकतावाद आन्दोलन सन विचारधारा सेहो आएल। ई सभ आधुनिक विचार-प्रक्रिया प्रणाली ओकर आस्था-अवधारणासँ बहार भेल अविश्वासपर आधारित छल।
पाठमे नुकाएल अर्थक स्थान-काल संदर्भक परिप्रेक्ष्यमे व्याख्या शुरू भेल आ भाषाकेँ खेलक माध्यम बनाओल गेल- लंगुएज गेम। आ एहि सभ सत्ताक आ वैधता आ ओकर स्तरीकरणक आलोचनाक रूपमे आएल पोस्टमॉडर्निज्म।
कंप्युटर आ सूचना क्रान्ति जाहिमे कोनो तंत्रांशक निर्माता ओकर निर्माण कए ओकरा विश्वव्यापी अन्तर्जालपर राखि दैत छथि आ ओ तंत्रांश अपन निर्मातासँ स्वतंत्र अपन काज करैत रहैत अछि, किछु ओहनो कार्य जे एकर निर्माता ओकरा लेल निर्मित नहि कएने छथि। आ किछु हस्तक्षेप-तंत्रांश जेना वायरस, एकरा मार्गसँ हटाबैत अछि, विध्वंसक बनबैत अछि तँ एहि वायरसक एंटी वायरस सेहो एकटा तंत्रांश अछि, जे ओकरा ठीक करैत अछि आ जे ओकरो सँ ठीक नहि होइत अछि तखन कम्प्युटरक बैकप लए ओकरा फॉर्मेट कए देल जाइत अछि- क्लीन स्लेट !
पूँजीवादक जनम भेल औद्योगिक क्रान्तिसँ आ आब पोस्ट इन्डस्ट्रियल समाजमे उत्पादनक बदला सूचना आ संचारक महत्व बढ़ि गेल अछि, संगणकक भूमिका समाजमे बढ़ि गेल अछि। मोबाइल, क्रेडिट-कार्ड आ सभ एहन वस्तु चिप्स आधारित अछि। एहि बेरुका (२००८) कोसीक बाढ़िमे अनलकान्तजी गाममे फाँसल छलाह, भोजन लेल मारि पड़ैत रहए मुदा क्रेडिट कार्डसँ ए.सी.टिकट बुक भए गेलन्हि। मिथिलाक समाजमे सूचना आ संगणकक भूमिकाक आर कोन दोसर उदाहरण चाही?
डी कन्सट्रक्शन आ री कन्सट्रक्शन विचार रचना प्रक्रियाक पुनर्गठन केँ देखबैत अछि जे उत्तर औद्योगिक कालमे चेतनाक निर्माण नव रूपमे भऽ रहल अछि। इतिहास तँ नहि मुदा परम्परागत इतिहासक अन्त भऽ गेल अछि। राज्य, वर्ग, राष्ट्र, दल, समाज, परिवार, नैतिकता, विवाह सभ फेरसँ परिभाषित कएल जा रहल अछि। मारते रास परिवर्तनक परिणामसँ, विखंडित भए सन्दर्भहीन भऽ गेल अछि कतेक संस्था।

एहि परिप्रेक्ष्यमे मैथिली कथा गाथापर सेहो एकटा गहिंकी नजरि दौगाबी।
रामदेव झा जलधर झाक “विलक्षण दाम्पत्य” (मैथिल हित साधन, जयपुर, १९०६ ई.) केँ मैथिलीक आधुनिक कथाक प्रारम्भ मानलन्हि । पुलकित मिश्रक “मोहिनी मोहन” (१९०७-०८), जनसीदनक “ताराक वैधव्य” (मिथिला मिहिर, १९१७ ई.), श्रीकृष्ण ठाकुरक चन्द्रप्रभा, तुलापति सिंहक मदनराज चरित, काली कुमार दासक अदलाक बदला आ कामिनीक जीवन, श्यामानन्द झाक अकिञ्चन, श्री बल्लभ झाक विलासिता, हरिनन्दन ठाकुर “सरोज”क ईश्वरीय रक्षा, शारदानन्द ठाकुर “विनय”क तारा आ श्याम सुन्दर झा “मधुप”क प्रतिज्ञा-पत्र, वैद्यनाथ मिश्र “विद्यासिन्धु”क गप्प-सप्पक खरिहान आ प्रबोध नारायण सिंहक बीछल फूल आएल। हरिमोहन झाक कथा आ यात्रीक उपन्यासिका, राजकमल चौधरी, ललित, रामदेव झा, बलराम, प्रभास कुमार चौधरी, धूमकेतु, राजमोहन झा, साकेतानन्द, विभूति आनन्द, सुन्दर झा “शास्त्री”, धीरेन्द्र, राजेन्द्र किशोर, रेवती रमण लाल, राजेन्द्र विमल, रामभद्र, अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास, प्रदीप बिहारी, रमेश, मानेश्वर मनुज, श्याम दरिहरे, कुमार पवन, अनमोल झा, मिथिलेश कुमार झा, हरिश्चन्द्र झा, उपाध्याय भूषण, रामभरोस कापड़ि “भ्रमर”, भुवनेश्वर पाथेय, बदरी नारायण बर्मा, अयोध्यानाथ चौधरी, रा.ना.सुधाकर, जीतेन्द्र जीत, सुरेन्द्र लाभ, जयनारायण झा “जिज्ञासु”, श्याम सुन्दर “शशि”, रमेश रञ्जन, धीरेन्द्र प्रेमर्षि, परमेश्वर कापड़ि, तारानन्द वियोगी, नागेन्द्र कुमर, अमरनाथ, देवशंकर नवीन, अनलकान्त, श्रीधरम, नीता झा, विभा रानी, उषाकिरण खान, सुस्मिता पाठक, शेफालिका वर्मा, ज्योत्सना चन्द्रम, लालपरी देवी एहि यात्राकेँ आगाँ बढ़ेलन्हि।
मैथिलीमे नीक कथा नहि, नीक नाटक नहि? मैथिलीमे व्याकरण नहि? पनिसोह आ पनिगर एहि तरहक विश्लेषण कतए अछि मैथिली व्याकरण मे, वैह अनल, पावक सभ अछि ! मुदा दीनबन्धु झाक धातु रूप पोथीमे जे १०२५ टा एहि तरहक खाँटी रूप अछि, रमानथ झाक मिथिलाभाषाप्रकाशमे जे खाँटी मैथिली व्याकरण अछि, ई दुनू रिसोर्स बुक लए मानकीकरण आ व्याकरणक निर्माण सर्वथा संभव अछि। मुदा भऽ रहल अछि ई जे पानीपतक पहिल युद्धक विश्लेषणमे ई लिखी जे पानीपत आ बाबरक बीचमे युद्ध भेल। रामभद्रकें धीरेन्द्र सर्वश्रेष्ठ मैथिली कथाकारक रूपमे वर्णित कएने छथि, मुदा एखन धरि हुनकर कएक टा कथाक विश्लेषण कएल गेल अछि ? नचिकेताक नाटक आ मैथिलीक सेक्सपिअर महेन्द्र मलंगियाक काजक आ रामभद्र आ सुभाष चन्द्र यादवक कथा यात्राक सन्दर्भमे ई गप कहब आवश्यक छल।
जाहि समय मैथिलीक समस्या घर-घरसँ मैथिलीक निष्कासन अछि, जखन हिन्दीमे एक हाथ अजमेलाक बाद नाम नहि भेला उत्तर लोक मैथिलीक कथा-कविता लिखि आ सम्पादक-आलोचक भए, अपन महत्वाकांक्षाक भारसँ मैथिली कथा-कविताक वातावरणकेँ भरिया रहल छथि, मार्क्सवाद, फेमिनिज्म आ धर्मनिरपेक्षता घोसिया-घोसिया कए कथा-कवितामे भरल जा रहल अछि, तखन स्तरक निर्धारण सएह कऽ रहल अछि, स्तरहीनताक बेढ़ वाद बनल अछि। जे गरीब आ निम्न जातीयक शोषण आ ओकरा हतोत्साहित करबामे लागल छथि से मार्क्सवादक शरणमे, जे महिलाकेँ अपमानित केलन्हि से फेमिनिज्म आ मिथिला राज्य आ संघक शरणमे आ जे साम्प्रदायिक छथि ओ धर्मनिरपेक्षताक शरणमे जाइत छथि। ओना साम्प्रदायिक लोक फेमिनिस्ट, महिला विरोधी मार्क्सिस्ट आ एहि तरहक कतेक गठबंधन आ मठमे जाइत देखल गेल छथि। क्यो राजकमलक बड़ाइमे लागल अछि, तँ क्यो यात्रीक आ धूमकेतुक तँ क्यो सुमनजीक, आ हुनका लोकनिक तँ की पक्ष राखत तकर आरिमे अपनाकेँ आगाँ राखि रहल अछि। यात्रीक पारोकेँ आ राजकमल आ धूमकेतुक कथाकेँ आइयो स्वीकार नहि कएल गेल अछि- एहि तरहक अनर्गल प्रलाप ! क्यो तथाकथित विवादास्पद कथाक सम्पादन कए स्वयं विवाद उत्पन्न कए अपनाकेँ आगाँ राखि रहल छथि। मात्र मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक लेखनक बीच सीमित प्रतियोगिता जाहि कवि-कथाकारकेँ विचलित कए रहल छन्हि आ हिन्दी छोड़ि मैथिलीमे अएबाक बाद जाहि गतिसँ ओ ई सभ करतब कए रहल छथि, तिनका मैथिलीक मुख्य समस्यापर ध्यान कहिया जएतन्हि से नहि जानि ? लोक ईहो बुझैत छथि जे हिन्दीक बाद जे मैथिलीमे लिखब , तँ स्वीकृति त्वरित गतिएँ भेटत ? जे मैथिलीक रचनाकारेँकेँ एहि तरहक भ्रम छन्हि आ आत्मविश्वासक अभाव छन्हि, अपन मातृभाषाक संप्रेषणीयतापर अविश्वास (!), तखन एहि भाषाक भविष्य हिनका लोकनिक कान्हपर दए कोन छद्म हम सभ संजोगि रहल छी ? सेमीनारमे साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त एहन जुझारू कथाकार, सम्पादक आ समालोचक सभकेँ अपन पुत्र-पुत्री-पत्नीक संग मैथिलीमे नहि वरन् हिन्दी मे (अंग्रेजी प्रायः सामर्थ्यसँ बाहर छन्हि तेँ) गप करैत देखि हतप्रभ रहि जाइत छी। मैथिलीमे बीस टा लिखनहार छलाह आ पाँचटा पढ़निहार, से कोन विवाद उठल होएत? राजकमल/ यात्रीक मैथिलीक लेखन सौम्य अछि, से हुनकर सभक गोट-गोट रचना पढ़ि कए हम कहि सकैत छी। ताहि स्थिति मे- ई विवाद रहए एहि कवितामे आ एहि कथामे- एहि तरहक गप आनि आ ओकर पक्षमे अपन तर्क दए अपन लेखनी चमकाएब ? आ तकर बाद यात्रीक बाद पहिल उपन्यासकार फलना आ राजकमलक बाद पहिल कवि चिलना-आब तँ कथाकार आ कविक जोड़ी सेहो सोझाँ अबैत अछि, एक दोसराक भक्तिमे आ आपसी वादकेँ आगाँ बढ़एबा लेल। मैथिलीक मुख्य समस्या अछि जे ई भाषा एहि सीमित प्रतियोगी (दुर्घर्ष!) सभक आपसी महत्वाकांक्षाक मारिक बीच मरि रहल अछि। कवि-कथाकार मैथिलीकेँ अपन कैरिअर बना लेलन्हि, घरमे मैथिलीकेँ निष्कासित कए सेमीनारक वस्तु बना देलन्हि। तखन कतए पाठक आ कोन विवाद ! जे समस्या हम देखि रहल छी जे बच्चाकेँ मैथिलीक वातावरण भेटओ आ सभ जातिक लोक एहि भाषासँ प्रेम करथि ताहि लेल कथा आ कविता कतए आगाँ अछि ? कएकटा विज्ञान कथा, बाल-किशोर कथा-कविता कैरियरजीवी कवि-कथाकार लिखि रहल छथि। आ ओ घर-घरमे पहुँचए ताहि लेल कोन प्रयास भए रहल अछि ? सए-दू सए कॉपी पोथी छपबा कए , तकर समीक्षा करबा कए, सए-दू सए कॉपी छपएबला पत्रिकामे छपबा कए , तकर फोटोस्टेट कॉपी फोल्डर बना कऽ घरमे राखि पुरस्कार लेल आ सिलेबसमे किताब लगेबा लेल कएल गेल तिकड़मक वातावरणमे हमर आस गैर मैथिल ब्राह्मण-कर्ण कायस्थ पाठक आ लेखकपर जाए स्थिर भए गेल अछि।

जे अपन घर-परिवार नहि सम्हारि सकलाह से ढेरी-ढाकी भाषायी पुरस्कार लए बैसल छथि, मिथिला राज्य बनएबामे लागल छथि , पता नहि राज्य कोना सम्हारि सकताह आ ओकर विधान सभामे कोन भाषामे बजताह, जखन हुनका ओतए पुरस्कृत कएल जएतन्हि।
जे घरमे मैथिली नहि बजैत छथि से लेखक आ कवि बनल छथि (हिन्दी-मैथिलीमे समान अधिकारसँ) हिन्दीमे सोचि लिखैत छथि आ तखन अनुवाद कए मौलिक मैथिली लिखैत छथि ! मैथिली कथा-कविता करैत छथि!!
मराठी, उर्दू, तमिल, कन्नड़सँ मैथिली अनुवाद पुरस्कार निर्लज्जतासँ लैत छथि , वणक्कम केर अर्थ पुछबन्हि से नहि अबैत छन्हि, अलिफ-बे-से केर ज्ञान नहि, मराठीमे कोनो बच्चासँ गप करबाक सामर्थ्य नहि छन्हि। आ मैथिलीमे हुनकर माथ फुटबासँ एहि द्वारे बचि जाइत छन्हि कारण अपने छपबा कए समीक्षा करबैत छथि, से पाठक तँ छन्हि नहि। पाठक नहि रहएमे हुनका लोकनिकेँ फाएदा छन्हि। आ एहि पुरस्कार सभमे जूरी आ एडवाइजरी बोर्ड अपनाकेँ आगाँ करबामे जखन स्वयं आगाँ अबैत छथि तखन एहि सीमित प्रतियोगी लोकनिक आत्मविश्वास कतेक दुर्बल छन्हि , सएह सोझाँ अबैत अछि । सारंग कुमार छथि, तँ बलरामक चरचा फेरसँ कथाकारक रूपमे शुरू भेल अछि । आ जिनकर सन्तान साहित्यमे नहि अएलाह हुनकर चरचा फेर कोना होएत, हुनकर पक्ष के आगाँ राखत ? जीबैत धरि ने सभ अपन पक्ष स्वयं आगाँ राखि रहल छथि ? मुदा मुइलाक बाद ? मैथिली साहित्यक एहि सत्यकेँ देखार करबाक आवश्यकता अछि । आँखि मुनि कए सेहो एकर समाधान लोक मुदा ताकिये रहल छथि।
क्यो चित्रगुप्त सभा खोलि मणिपद्मकेँ बेचि रहल छथि तँ क्यो मैथिल (ब्राह्मण) सभा खोलि सुमनजीक व्यापारमे लागल छथि-मणिपद्म आ सुमनजीक आरिमे अपन धंधा चमका रहल छथि आ मणिपद्म आ सुमनजीकेँ अपमानित कए रहल छथि। कथा-कविता संग्रह सभक सम्पादकक चेला चपाटी मैथिलीक सर्वकालीन कथाकार-कविक संकलनमे स्थान पाबि जाइत छथि , भने हुनकर कोनो पहिले संग्रह आएल होइन्हि वा कथा-कविताक संख्या हास्यास्पद रूपसँ कम होइन्हि। पत्रिका सभक सेहो वएह स्थिति अछि। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षामे कटाउझ करैत बिन पाठकक ई पत्रिका सभ स्वयं मरि रहल अछि आ मैथिलीकेँ मारि रहल अछि। ड्राइंग रूममे बिना फील्डवर्कक लिखल लोककथा जाहि भाषामे लिखल जाइत होअए, ओतए एहि तरहक हास्यास्पद कटाउझ स्वाभाविक अछि। आब तँ अन्तर्जालपर सेहो मैथिलीक किछु जालवृत्तपर जातिगत कटाउझ आ अपशब्दक प्रयोग देखबामे आएल अछि।
मार्क्सिस्ट आ फेमिनिस्ट बनि तकरो व्यापार शुरू करब आ अपन स्तरक न्यूनताक एहि तरहेँ पूर्ति करब, सीमित प्रतियोगिता मध्य अल्प प्रतिभायुक्त साहित्यकारक ई हथियार बनि गेल अछि। जे मार्क्सक आदर करत से ई किएक कहत जे हम मार्क्सवादी आलोचक आकि लेखक छी ? हँ जे मार्क्सक धंधा करत तकर विषयमे की कही, धंधा तँ सुमन, राजकमल, यात्री, मणिपद्म, धूमकेतु......सभक शुरू भेल अछि। आ तकर कारण सेहो स्पष्ट। राष्ट्रीय सर्वेक्षण ई देखबैत अछि जे संस्कृत, हिन्दी, मैथिली आ आन साहित्य कॉलेजमे वैह पढ़ैत छथि जिनका दोसर विषयमे नामांकन नहि भेटैत छन्हि, पत्रकारितामे सेहो यैह सभ अबैत छथि। प्रतिभा विपन्न एहने साहित्यसेवीकेँ साहित्यक चश्का लागल छन्हि आ हिनके हाथमे मैथिली भाषाक भविष्य सुरक्षित रहत? मुदा एहि वास्तविकताक संग आगाँक बाट हमरा सभक प्रतीक्षामे अछि। सुच्चा मैथिली सेवी कथाकार आ पाठक जे धूरा-गरदामे जएबा लेल तैयार होथि, बच्चा आ स्त्री जनताक साहित्य रचथि आ अपन ऊर्जा मैथिलीकेँ जीवित रखबा मात्रमे लगाबथि ओ श्रेणी तैयार होएबे टा करत।

मैथिलीक नामपर कोनो कम्प्रोमाइज नहि। सुभाषचन्द्र यादवजीक ई संग्रह धारावहिक रूपमे “विदेह” ई-पत्रिकामे (http://www.videha.co.in) अन्तर्जालपर ई-प्रकाशित भए हजारक-हजार पाठकक स्नेह पओलक, ऑनलाइन कामेन्ट एहि कथा सभकेँ भेटलैक जाहिमे बेशी पाठक गैर मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ रहथि, से हम हुनकर सभक उपनाम देखि अन्दाज लगाओल। मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ तँ पाठक बनि रहिये नहि सकैत छथि, शीघ्र यात्रीक बादक एकमात्र जन उपन्यासकार आ कुलानन्द मिश्रक बादक एकमात्र सही अर्थमे कविक उपाधि लेल लालायित भए जाइत छथि। अपनाकेँ घोड़ा आ बाघ आ दोसरकेँ गधा आ बकरी कहबा काल ओ मूल दिशा आ समस्यासँ अपनाकेँ फराक करैत छथि। अपन कथा-कवितापर अपने समीक्षा कए आत्ममुग्धताक ई स्थिति समीक्षाक दुर्बलतासँ आएल अछि। एहि एकमात्र शब्दसँ हमरा वितृष्णा अछि आ तकर निदान हम मैथिलीकेँ देल स्लो-पोइजनिंगक विरुद्ध “विदेह” ई-पत्रिकाक मैथिली साहित्य आन्दोलनमे देखैत छी। एतए साल भरिमे सएसँ बेशी लेखक जुड़लाह तँ पाठकक संख्या लाख टपि गेल। बच्चा आ महिलाक संग जाहि तरहेँ गैर मैथिल ब्राह्मण-कर्ण कायस्थ पाठक आ लेखक जुटलाह से अद्भुत छल। हमर एहि गपपर देल जोरकेँ किछु गोटे (मैथिली) साहित्यकेँ खण्डित करबाक प्रयास कहताह मुदा हमर प्राथमिकता मैथिली अछि, मैथिली साहित्य आन्दोलन अछि, ई भाषा जे मरि जाएत तखन ओकर ड्राइंग रूममे बैसल दुर्घर्ष सम्पादक-कवि-कथाकार-मिथिला राज्य आन्दोलकर्ता आ समालोचकक की होएतन्हि। सुभाषचन्द्र यादवजीक कथाक पुनः पाठ आ भाषाक पुनः पाठ एहि रूपमे हमरा आर आकर्षित करैत अछि। आ एतए ईहो सन्दर्भमे सम्मिलित अछि जे सुभाषचन्द्र यादवजीक ई संग्रह धारावहिक रूपमे अन्तर्जालपर ई-प्रकाशित भए प्रिंट फॉर्ममे आबि रहल अछि, कथाक पुनः पाठ आ भाषाक पुनः पाठ लए। आ ई घटना सभ दिन आ सभ प़क्षमे मैथिलीकेँ सबल करत से आशा अछि।
-गजेन्द्र ठाकुर

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  1. सुभाष चन्द्र यादव जीक कथा एखन धरि उचित समीक्षासँ वंचित रहल छल। मुदा मिथिला मंडनक इनिशिएटिव आ मैथिल आर मिथिला जालवृत्तक उत्साह ओहि कमीकेँ पूरा कएलक।

    कथा आ भाषा मानकीकरण सम्वाद आगाँ बढ़बे टा करत ।

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  2. गजेन्द्र जी,
    अहाँक समीक्षा श्रृंखलाक पहल सराहनीय अछि.

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  3. subhashchandra yadav jik katha par vishleshan bad nik lagal,
    bahut ras nootan tathyak jankari bhetal.

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