पंचदेवोपासक भूमि मिथिला- डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन - मिथिला दैनिक

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बुधवार, 15 अप्रैल 2009

पंचदेवोपासक भूमि मिथिला- डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन

पंचदेवोपासक भूमि मिथिला

-डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ’मौन’



हिमालयक पादप्रदेशमे गंगासँ उत्तर, कोशीसँ पश्चिम एवं गण्डकसँ पूर्वक भूभाग सांस्कृतिक मिथिलांचलक नामे ख्यात अछि। मिथिलांचलक ई सीमा लोकमान्य, शास्त्रसम्म्त ओऽ परम्परित अछि। सत्पथब्राह्मणक अंतःसाक्ष्यक अनुसारे आर्यलोकनिक एक पूर्वाभिमुखी शाखा विदेह माथवक नेतृत्वमे सदानीरा (गण्डक) पार कऽ एहि भूमिक अग्नि संस्कार कऽ बसिवास कएलनि, जे विदेहक नामे प्रतिष्ठित भेल। कालान्तरमे एकर विस्तार सुविदेह, पूर्व विदेह, ओऽ अपर विदेहक रूपेँ अभिज्ञात अछि। विदेहक ओऽ प्राथमिक स्थलक रूपमे पश्चिम चम्पारणक लौरियानन्दनगढ़क पहिचान सुनिश्चित भेल अछि। आजुक लौरियानन्दनगढ़ प्राचीन आर्य राजा लोकनि एवं बौद्धलोकनिक स्तूपाकार समाधिस्थल सभक संगम बनल अछि। कालक्रमे अहि इक्षवाकु आर्यवंशक निमि पुत्र मिथि मिथिलापुत्रक स्थापना कयलनि। प्राचीन बौद्धसाहित्यमे विदेहकेँ राष्ट्र (देश) ओऽ मिथिलाकेँ राजधानीनगर कहल गेल अछि। अर्थात् मिथिला विदेहक राजधानी छल। मुदा ओहि भव्य मिथिलापुरीक अभिज्ञान एखन धरि सुनिश्चित नहि भेल अछि। तथापि प्राचीन विदेहक सम्पूर्ण जनपदकेँ आइ मिथिलांचल कहल जाइछ।



ओऽ मिथिलांचलक भूमि महान अछि, जकर माथेपर तपस्वी हिमालयक सतत वरदहस्त हो, पादप्रदेशमे पुण्यतोया गंगा, पार्श्ववाहिनी अमृत कलश धारिणी गंडक ओऽ कलकल निनादिनी कौशिकीक धारसँ प्रक्षालित हो। एहि नदी मातृक जनपदकेँ पूर्व मध्यकालीन ऐतिहासिक परिवेशमे तीरभुक्ति अर्थात् तिरहुत कहल गेल, जकर सांस्कितिक मूलमे धर्म ओऽ दर्शनक गांभीर्य, कलासभक रागात्मक उत्कर्ष, ज्ञान-विज्ञानक गरिमा ओऽ भाषा-साहित्यक समृद्ध परम्पराक अंतः सलिला अंतर्प्रवाहित अछि। एहि सभक साक्षात् मिथिलाक शैव-शाक्त, वैष्णव, गाणपत्य, सौर (सूर्य) ओऽ बौद्ध-जैनक आस्था केन्द्र एवं ऋषि-मुनिक साधना परम्परामे उपलभ्य अछि। प्रकारान्तरसँ ओहि स्थल सभकेँ सांस्कृतिक चेतनाक ऐतिहासिक स्थलक संज्ञा देल जाऽ सकैछ, जकर आइ-काल्हि पर्यटनक दृष्टिसँ महत्व बढ़ि गेल अछि।

मिथिलाक प्रसिद्धि ओकर पाण्डित्य परम्परा, दार्शनिक-नैयायिक चिन्तन, साहित्य-संगीतक रागात्मक परिवेश, लोकचित्रक बहुआयामी विस्तार, धार्मिक आस्थाक स्थल, ऐतिहासिक धरोहर आदिक कारणे विशेष अनुशीलनीय अछि। जनक-याज्ञवल्क्य, कपिल, गौतम, कणाद, मंडन, उदयन, वाचस्पति, कुमारिल आदि सदृष विभूति, गार्गी, मैत्रेयी, भारती, लखिमा आदि सन आदर्श नारी चरित, ज्योतिरीश्वर, विद्यापति, विनयश्री, चन्दा झा, लाल दास आदि सन आलोकवाही साधक लोकनिक प्रसादे एहि ठामक जीवन-जगतमे आध्यात्मिक सुखानुभूति ओऽ सारस्वत चेतनादिक मणिकांचन संयोग देखना जाइछ। मिथिला आध्यात्म विद्याक केन्द्र मानल जाइछ।

आजुक मिथिलांचलक संस्कृति उत्तर बिहारमे अवस्थित वाल्मीकिनगर (भैँसालोटन, पश्चिम चम्पारण) सँ मंदार (बाँका, भागलपुर) धरि, चतरा-वाराह क्षेत्र (कोशी-अंचल, नेपाल) सँ जनकपुर-धनुषा (नेपाल) धरि ओऽ कटरा (चामुण्डा, मुजफ्फरपुर), वनगाँव-महिषी, जयमंगला (बेगूसराय), वारी-बसुदेवा (समस्तीपुर), कपिलेश्वर-कुशेश्वर-तिलकेश्वर (दरभंगा), अहियारी-अकौर-कोर्थु(मधुबनी), आमी(अम्बिकास्थान, सारण), हरिहरक्षेत्र (सोनपुर, सारण) वैशाली आदि धरि सूत्रबद्ध अछि। एहि सभ धार्मिक तीर्थस्थल सभक परिवेक्षणसँ प्रमाणित होइछ जे मिथिलांचल पंचदेवोपासक क्षेत्र अछि। कालान्तरमे एहिसँ बौद्ध ओऽ जैन स्थल सभ सेहो अंतर्मुक्त भऽ आलोच्य भूभागकेँ गौर्वान्वित कयलनि।



पंचदेवोपासक क्षेत्रक अर्थ भेल- गणेश, विष्णु, सूर्य, शिव ओऽ भगवतीक क्षेत्र। एहिमे सूर्य सर्वप्राचीन देव छथि एवं शिव सर्वप्राचीन ऐतिहासिक देवता छथि। विघ्नांतक गणेशक पूजन प्राथमिक रूपेँ कयल जाइछ एवं मातृपूजनक संदर्भमे भगवती अपन तीनू रूपमे लोकपूजित छथि अर्थात् दुर्गा, काली, महालक्ष्मी एवं सरस्वती। भगवती शक्तिक आदि श्रोत छथि, जनिकामे सृष्टि, पोषण ओऽ संहार (लय) तीनू शक्ति निहित अछि। मुदा लोकक लेल ओऽ कल्याणकारिणी छथि। धनदेवी लक्ष्मीक परिकल्पना वैष्णव धर्मक उत्कर्ष कालमे भेल छल एवं ओऽ विष्णुक सेविका (अनंतशायी विष्णु), विष्णुक शक्ति (लक्ष्मी नारायण) एवं देवाभिषिक्त (गजलक्ष्मी) भगवतीक रूपमे अपन स्वरूपक विस्तार कयलनि। ओना तँ लक्ष्मी ओऽ सरस्वतीकेँ विष्णुक पर्श्वदेवीक रूपमे परिकल्पना सर्वव्यापक अछि। लक्ष्मी ओऽ गणेशक पूजन सुख-समृद्धिक लेल कयल जाइछ। प्राचीन राजकीय स्थापत्यक सोहावटीमे प्रायः गणेश अथवा लक्ष्मीक मूर्ति उत्कीर्ण अछि।



पंचदेवोपासना वस्तुतः धार्मिक सद्भावक प्रतीक अछि। मिथिलांचलमे एहि पाँचो देवी-देवताक स्वतंत्र विग्रह सेहो प्राप्त होइछ। भारतीय देवभावनाक विस्तारक मूलमे भगवती छथि, जे कतहु सप्तमातृकाक रूपमे पूजित छथि तँ कतहु दशमहाविद्याक रूपमे। सप्तमातृका वस्तुतः सात देवता सभक शक्ति छथि- ब्रह्माणी (ब्रह्मा), वैष्णवी (विष्णु), माहेश्वरी (महेश), इन्द्राणी (इन्द्र), कौमारी (कुमार कार्तिकेय), वाराही (विष्णु-वाराह) ओऽ चामुण्डा (शिव)। एहि सप्तमातृकाक अवधारणा दानव-संहारक लेल संयुक्त शक्तिक रूपमे कयल गेल छल, जे आइ धरि पिण्ड रूपेँ लोकपूजित छथि। मुदा एक फलक पर सप्तमातृकाक शिल्पांकनक आरम्भ कुषाणकालमे भऽ गेल छल। चामुण्डाकेँ छोड़ि सभटा देवी द्विभुजी छथि। सभक एक हाथमे अम्तकलश एवं दोसर अभयमुद्रामे उत्कीर्ण अछि। मिथिलांचलक लोकजीवनमे जनपदीय अवधारणाक अनुसार सप्त मातृकाक नामावली भिन्न अछि। मुदा बिढ्क्षिया माइ (ज्येष्ठा, आदिमाता, मातृब्रह्म) सभमे समान रूपेँ प्रतिष्ठित छथि। यद्य सप्तमातृकाक ऐतिहासिक प्रस्तर शिल्पांकन एहि भूभागसँ अप्राप्य अछि, मुदा दशमहाविद्याक ऐतिहासिक मूर्ति सभ भीठभगवानपुर (मधुबनी) एवं गढ़-बरुआरी (सहरसा)मे उपलभ्य अछि।

भारतीय देवभावनाक उद्भव एवं विकासक अनुक्रम शास्त्र-पुराणमे अभिव्यंजित अछि, जकर प्रत्यक्ष दर्शन मिथिलांचलमे प्राप्य देवी-देवताक ऐतिहासिक मूर्ति सभमे होइछ। एकटा ब्रह्म (आदिब्रह्म, परब्रह्म)क परिकल्पनासँ सृष्टि संभव नहि। अतः मातृब्रह्मक अवधारणाक जन्म भेल, मुदा ओऽ संयुक्त अर्थात् अर्धनारीश्वरक रूपमे पैकल्पित भेलाह।, जे कुर्सी नदियामी (बेनीपुर, दरभंगा/ राजनगर, मधुबनी) गामक अघोषित प्राचीन मूर्ति संग्रहालयमे संरक्षित अछि। एहि षटभुजी प्रस्तर मूर्तिक वाम भाग नारीक एवं दहिन भाग पुरुषक अछि। एहि षटभुजी प्रस्तर मूर्तिक वाम भाग नारीक एवं दहिन भाग पुरुषक अछि। हिनक हाथ सभमे त्रिदेव (ब्रह्मा-विष्णु-महेश)क आयुध व उपकरण सभ शोभित अछि- अक्षमाला, त्रिशल ओ वरमुदा एवं पोथी, गदा ओ भयमुद्रा। मुदा सृष्टिक लेल पार्थक्यक आवश्यकता अनुभूत कएल गेल। फलतः देवस्वरूप ब्रह्मा-विष्णु-महेश (त्रिदेव)क परिकल्पना मूर्त कयल गेल। भच्छी (बहेड़ी, दरभंगा)क त्रिमूर्ति एकर उत्कृष्ट उदाहरण अछि। आलोच्य त्रिमूर्तिक मुख्य रूप ब्रह्माक थिक। रूपविन्यासमे दाढ़ी, हाथमे अक्षमाला ओ कमण्डलु, यज्ञोपवीत, मुकुट ओ वाहनक रूपमे हंस उत्कीर्ण अछि। मूर्ति चतुर्भुजी अछि। भच्छीक शिवमन्दिरमे पूजित आलोच्य मूर्ति यद्यपि मूलरूपमे ब्रह्माक अलावा शिव ओ विष्णुक प्रतीकसँ अलंकृत अछि। मिथिलांचलमे ब्रह्माक पूजा प्रायः वर्जित मानल गेल अछि, तथापि ब्रह्मा भच्छी (दरभंगा) ओ विथान (समस्तीपुर)मे अवशिष्ट छथि। भारतीय प्रतिमा विज्ञानमे कल्याणसुन्दर (शिवपार्वती परिणय)क मूर्तिमे ब्रह्मा पुरोहितक रूपमे उत्कीर्ण छथि।



संयुक्त मूर्तिक एहि परम्परामे हरिहर (विष्णु-शिव)क उल्लेख आवश्यक अछि। मूर्तिक दहिन भागमे शिव ओ वाम भागमे विष्णु उत्कीर्ण भेल छथि। शिवक अर्द्धाङ्गक सूचक अछि जटा, त्रिशूल ओ नाग एवं अर्द्धाङ्ग विष्णु बोधक किरीट, चक्र ओ शंख अछि। हरिहरक सर्वांग सुन्दर ओ अक्षत पालकालीन प्रस्तर प्रतिमा वाल्मीकिनगर (नेपाल दिस) एवं हरिहरक्षेत्र (सारण)मे संरक्षित अछि। शैव ओ वैष्णव सम्प्रदाय मध्य समन्वयक एकटा उपक्रम बनि गेल हरिहरक परिकल्पना। हरि ओ हर वस्तुतः एके छथि- “भल हर, भल हरि, भल तुअ कला। खनहि पीतवसन, खनहि बघछला”। हरिहर क्षेत्र संगम तीर्थ बनल अछि। एहि ठाम प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमाक अवसरपर विशाल मेला लगैत अछि। पौराणिक कथाक अनुसार एहिठाम गज-ग्राहक संघर्षक अंत विष्णुक हाथे भेल छल। एवं प्रकारे त्रिमूर्तिक परिकल्पनामे प्रतीकात्मक तत्व निहित अछि- सृजन, पालन ओ संहारक शक्ति। ब्रह्मचार्य, गार्हस्थ्य ओ संन्यासक संग-संग सात्विक राजसी ओ तामसी वृत्तिक समन्वय। तहिना हरिहरक परिकल्पनाक पृष्ठभूमिमे अन्तर्निहित अछि साम्प्रदायिक सद्भाव, जे ओहि युगक लेल अनिवार्य बनि गेल छल। साम्प्रदायिक विखण्डनसँ सामाजिक एकता खण्डित होइत अछि।



आलोच्य त्रिदेवमे देवाधिदेव महादेव शिवक स्थान सर्वोच्च अछि। शिवक पुरातात्विक सर्वप्राचीन अवशेषक रूपमे मोहनजोदड़ोक पशुपति शिव अछि, जे समस्त जीव-जन्तुक अधिपति बनल छथि। शिवकेँ गार्हस्थ जीवनक अधिष्ठाता मानल गेल अछि, फलतः ओ समस्त गृहस्थ लोकनिक पूज्य बनल छथि। हिनक लीला विस्तार पुराण-साहित्यक अतिरिक्त भारतीय मूर्तिकलामे सेहो देखना जाइछ। शैव परिवारमे शिवक अलावा पार्वती, गणेश ओ कार्तिकेय सेहो शास्त्र ओ लोकपूजित बनल छथि। त्रिदेवमे मात्र शिवक गार्हस्थ्य जीवनक एकटा विलक्षण अवधारणा बनल अछि। शिव औघरदानी छथि, कल्याणकारी देवता छथि एवं कालानुसार प्रलयंकर शिव अत्यंत प्राचीन एवं मिथिलांचलक सर्वप्रिय देवता छथि। ओना तँ शिवक परिकल्पना वैदिक थिक तथापि शिव-शक्तिक गौरवगान शैव पुराण सभमे विशेष रूपेँ भेल अछि। तदनुसार शिव स्वरूपक परिकल्पना प्राचीन मुदा अहिमे प्रत्यक्ष रूपे अंकित अछि। कुषाणराज वसुदेवक मुद्रापर शिव ओ हुनक वाहन वृषभ उत्कीर्ण अछि। हिनक सौम्य ओ रौद्ररूप दुनू प्रत्यंकित अछि। माथपर चन्द्रमा, हाथमे त्रिशूल, पिनाक व डमरू, त्रिनेत्र, बघछला, रुद्राक्ष, नागभूषण, वृषभ वाहन आदि विशिष्ट पहिचान बनल अछि। हुनक सौम्य रूप कल्याणसुन्दर, ललितरूप उमामाहेश्वर ओ रौद्ररूप महाकालमे अभिव्यंजित अछि। शिव नृत्य देवता नरेशक रूपमे सेहो विन्यस्त छथि। नटराज शिवक एकटा विलक्षण पालकालीन प्रस्तर मूर्ति तारालाही (दरभंगा)मे पूजित अछि। एहि मूर्तिमे नटराज शिव दैत्यपुत्र अपस्मारक कान्हपर ठाढ़ भऽ नृत्यरत छथि। चतुर्भुजी शिवक उपरका दुनू हाथमे गजासुरक वध निर्दिष्ट अछि। गजक पीठपर गणेश आसीन छथि। शेष चारिटा हाथमे त्रिशूल, डमरू ओ नृत्यमुद्रा सूचित अछि। एहि तरहक एकटा पालयुगीन प्रस्तर मूर्ति पपौर(सिवान)मे सेहो हम देखने छलहुँ। मूर्ति साढ़े चारि फीटक अछि।

मध्यकालीन परिवेशमे शैव प्रतिमामे सर्वाधिक लोकप्रियता उमा-माहेश्वरकेँ प्राप्त भेलैक। एहि तरहक मूर्ति सभ मिथिलांचलक भीठ-भगवानपुर, रक्सौल राजेश्वर, बाथे, महादेवमठ, तिरहुता, सौराठ, भोजपरौल, वनवारी, गाण्डीवेश्वर, कोर्थ, सिमरिया-भिण्डी, डोकहर, मंगरौनी ओ वसुदेवामे प्राप्त अछि। एहि मूर्तिमे उमा(पार्वती) शिवक वाम जांघपर बैसल छथि। शिव वाम हाथसँ उमाक आलिंगन कऽ रहल छथि। शिवक दहिन हाथमे त्रिशूल ओ वामहाथसँ देवीक वाम अंगक स्पर्श कऽ रहल छथि। पाठपीठमे शिव-पार्वतीक वाहन क्रमशः वृषभ ओ सिंह विश्रामक स्थितिमे उत्कीर्ण अछि। संभवतः एहि मूर्तिक परिकल्पना शंकराचार्यक सन्यासक विपरीत गृहस्थाश्रम दिस उत्प्रेरित करैत अछि।

पार्वतीक अभिशिल्पन स्वतँत्र रूपेँ सेहो भेल अछि। फुलहर (गिरिजा स्थान, मधुबनी), मिरजापुर (दरभंगा) ओ भरवारी (समस्तीपुर) क मन्दिर सभमे स्थापित ओ पूजित गिरिजा वस्तुतः पार्वतीक प्रतिरोप छथि, जाहिमे फुलहर ओ मिरजापुरक गिरीजाक मध्यकालीन प्रस्तर प्रतिमा सभक पार्श्वमे गणेश ओ कार्तिकेय सेहो प्रतिष्ठित छथि। दर्पण गिरिजाक विशिष्ट पहचान बनल अछि। किछु उमा-माहेश्वरक प्राचीन प्रतिमामे सेहो पार्वतीक हाथमे दर्पण सुशोभित छनि। दर्पण श्रृंगार सूचक प्रतीक अछि। सभटा मूर्ति स्थानक मुद्रामे बनल अछि एवं नख-शिख विभिन्न आभूषणसभसँ अलंकृत अछि। मूर्तिमे गणेश ओ कार्तिकेयक उपस्थिति हुनक वात्सल्य बोधक अछि। दरभंगाक मिरजापुर मोहल्लामे अवस्थित एवं म्लेच्छमर्दनीक रूपे लोकख्यात ई , मूर्ति सर्वांग सुन्दर ओ कलात्मक अछि। फुलहरक गिरीजा रूपेँ पूजित पार्वतीक विशेष पूजा जानकी करैत छलीह। ’रामचरित मानस’क फुलवारी प्रसंगक अनुरूपेँ गिरीजा आइयो कुमारी कन्या लोकनिक अभीष्ट बनल छथि।



शिव-पार्वतीक प्रतीकपूजन जलढरीमे अवस्थित शिवलिंगक रूपमे सेहो लोकप्रचलित अछि। मुदा शिवलिंगमे पार्वतीमुखक अभिशिल्पन एकमुखी शिवलिंग अथवा गौरीशंकरक रूपेँ अभिज्ञात अछि। एकमुखी शिवलिंगक सर्वप्राचीन प्रस्तर मूर्ति (कुषाणकालीन) चण्डीस्थान (अरेराज, प. चम्पारण) मे हम देखने छलहुँ। एकमुखी शिवलिंग जमथरि (मधुबनी), हाजीपुर (वैशाली), आदिक अतिरिक्त चतुर्मुखी शिवलिंगक गुप्तकालीन प्रतिमा कम्मन छपरा ( अभिलेखयुक्त, वैशाली)क अलावा बनियाँ (वैशाली)क पालयुगीन चतुर्मुखी शिवलिंगक परम्परामे अरेराज (प.चम्पारण)क शिवमन्दिरमे चतुर्मुखी पशुपति शिवलिंग संपूजित अछि। एम्हर गढपुरा (बेगुसराय)क मंदिरमे एकटा प्राचीन चौमुखी महादेवक लोकपूजन परम्परीत अछि।



शिवलिंगक परिकल्पना ज्योतिलिंग (द्वादश ज्योतिर्लिंग), एकादशरुद्र (मंगरौनी), सहस्रमुखलिंग (कटहरिया, वैशाली/ वारी, समस्तीपुर)क अतिरिक्त विशाल शिवलिंग (तिलकेश्वर, दरभंगा/ चेचर, वैशाली), घूर्णित, शिवलिंग (जमथरि, मधुबनी) आदि सूचित अछि। कुशध्वज जनक द्वारा स्थापित कुशेश्वर, सीरध्वज जनक द्वारा प्रतिष्ठापित तिलकेश्वर, कपिल द्वारा स्थापित कपिलेश्वर, विदेश्वरक अंकुरित शिवलिंग, अरेराजक सोमेश्वरनाथ, कलनाक कल्याणेश्वर शिव, ऋषिशृंग द्वारा स्थापित सिंहेश्वरनाथ, नेपाल तराइक जलेश्वर आदि प्रसिद्ध शिवतीर्थ अछि, जाहिठाम प्रायः प्रत्येक रविवार शिवरात्रि आदिक अलावा सावनमे भरि मास शिवक जलाभिषेक होइछ। परिसरमे शिवभक्तक बोलबमक जयघोष, कांवरिया सभक तीर्थवास, मेलादि लगैत अछि। शिवरात्रिक मेला विशेष महत्वक होइछ। सद्योजात (अलौलीगढ़, बेगुसराय/ जनकपुर, नेपाल) मे शिव शिशु रूपमे ओ पार्वती माता रूपमे उत्कीर्ण अछि, तांत्रिक मूर्ति। गणेश यद्यपि शिवपुत्र छथि, मुदा पंचदेवोपासनामे ओ प्रथम छथि। कोनो शुभ कार्यक आरम्भमे गणेश पूजन कयल जाइछ। कियेक तँ ओ विघ्ननाशक ओ सिद्धि दाता देव मानल जाइत छथि। मुख्य लक्षण मानल जाइछ-ठिगना कद, लम्बोदर, सूढ़, हाथमे अंकुश (परशु), कलम एवं लड्डू। हाथ सभक संख्या चारिसँ बारह धरि मानल जाइछ। ओ स्थानक ललितासनमे बैसल अथवा नृत्य मुद्रामे निर्मित पाओल जाइछ। मन्दिरक प्रवेश द्वारपर गणेशक प्रतिष्ठा देल जाइछ। गणेशक स्वतंत्र प्रतिमा कोर्थू, हावीडीह, भीठ-भगवानपुर, सौराठ, देकुली, फुलहर, करियन, भोज परौल, बहेड़ा, भच्छी, विष्णु बरुआर, लहेरियासराय, रतनपुर आदि स्थान सभमे पूजल जाइत छथि। माता शिशुक रूपमे पार्वतीक गोदमे शिशु गणेशक अलावा गणेशक मूर्ति लक्ष्मी (लक्ष्मी गणेश, दिपावली)क संग ओ महिषासुरमर्दिनी दुर्गा (पार्वती रूपा)क पर्श्व देवताक रूपमे संरचनाक लोकपरम्परा अछि। विजयादश्मीक अवसरपर परम्परासँ बनैत महिषासुरमर्दिनी दुर्गाक पार्श्वदेवता गणेश ओ कार्तिकेय मानल जाइत छथि। कार्तिकेयक स्वतंत्र प्रस्तर प्रतिमा सभ (पालयुगीन) बसाढ़ (वैशाली) एवं वसुआरा (मधुबनी)क मन्दिरसभमे प्रतिष्ठित एवं पूजित अछि। कार्तिकेय युद्धक देवता मानल जाइत छथि। हिनका स्कन्द ओ महासेनक रूपमे सेहो जानल जाइत छनि। कार्तिकेयक मूर्तिमे मोरक वाहन एवं हाथमे बरछी (शूल)क विधान अभिहित अछि। दुनू प्रस्तर प्रतिमा पाल कलाक कलात्मक प्रतिमान अछि। पुण्ड्रवर्धनमे कार्तिकेयक मन्दिरक उल्लेख सेहो प्राप्त होइछ। पुण्ड्रवर्धनक भौगोलिक पहिचान पूर्णियाँक(जनपदक)सँ कयल गेल अछि।



शिव परिवारक एकटा विशाल संगमर्मर मूर्ति लालगंज (वैशाली)क शिवमन्दिरमे स्थापित एवं पूजित अछि। वृषभक पीठपर शिव-पार्वती आसीन छथि। गणेश ओ कार्तिकेय अपन माता-पिता (शिव-पार्वती)क गोदीमे बैसल छथि। शिल्प ओ शैलीमे आलोच्य मूर्ति विलक्षण अछि। शिव परिवारक एकटा आर देवता छथि भैरव, जनिक आकृति भयानक, बढ़ल पेट, गरामे मुण्डमाल, नागाभूषण, हाथमे त्रिशूल आदि शोभित अछि। भैरवक विशाल प्रस्तर मूर्ति वठिया (भैरव बलिया, सकरी, दरभंगा)मे पूजित अछि। भैरव ज्वालमुकुट पहिरने छथि। एहि भैरव मूर्तिक दोसर प्रति भमरलपुर संग्रहालयसँ प्राप्त भेल अछि। भैरवकेँ शिवक रौद्ररूप कहल गेल अछि। नेपाल उपत्यका (काठमाण्डू)मे भैरवक मूर्तिसभक अनेक प्रकार देखने छलहुँ- आकाश-भैरव, पाताल भैरव, काल भैरव, उन्मत्त भैरव आदि। कुमारी कन्या लोकनिक हेतु उन्मत्त भैरवक पूजन वर्जित अछि। शिवक काशीमे वर्चस्व छनि (विश्वनाथ) तँ भैरवक वर्चस्व तिरहुतमे मानल गेल अछि। काशीकेँ शिव अपने रखलनि, भैरव तिरहुत देल। मिथिलांचलमे शिव भक्तिक रूपमे नचारी गान ओ नर्त्तनक विधान अछि। मैथिलीमे बहुतरास नचारी रचल गेल। आइने अकबरीमे नचारी गानक उल्लेख प्राप्त होइछ। नचारीक एकटा अर्थ भेल- लचारी, अर्थात् नचारी गीतसभमे दुख-दैन्यक भाव अभिव्यंजित अछि। दोसर अर्थ भेल नृत्यक आचारसँ संवलित गीत अनुष्ठान। नचारी गयनिहार डमरूक संगे नाचि-नाचि कए गबैत छथि। गीत ओ नृत्य एकटा आनुष्ठानिक कृत्य थिक। भक्तिपरक गीतसभमे नचारीक स्थान विशिष्ट अछि। “संगीत भाष्कर”क अनुसार “गीतं वाद्यं तथा नृत्यं त्रयं संगीतमुच्यते” अर्थात् गीत, नृत्य ओ वाद्य मिलकए संगीत सृजित होइछ। जँ एहिमे नाट्यक समावेश कए देल जाय तँ एहि प्रकारक सांगीतिक रचना कीर्तनियाँ बनि जाइछ। “हरगौरी विवाह” (जगज्योतिर्मल्ल) शिव-भक्ति विषयक एकटा सांगतिक रचना थिक जाहिमे नचारी गीत सेहो प्रतिध्वनित अछि।

भारतीय देवभावनाक उद्भव एवं विकासक अनुक्रम शास्त्र-पुराणमे अभिव्यंजित अछि, जकर प्रत्यक्ष दर्शन मिथिलांचलमे प्राप्य देवी-देवताक ऐतिहासिक मूर्ति सभमे होइछ। एकटा ब्रह्म (आदिब्रह्म, परब्रह्म)क परिकल्पनासँ सृष्टि संभव नहि। अतः मातृब्रह्मक अवधारणाक जन्म भेल, मुदा ओऽ संयुक्त अर्थात् अर्धनारीश्वरक रूपमे पैकल्पित भेलाह।, जे कुर्सी नदियामी (बेनीपुर, दरभंगा/ राजनगर, मधुबनी) गामक अघोषित प्राचीन मूर्ति संग्रहालयमे संरक्षित अछि। एहि षटभुजी प्रस्तर मूर्तिक वाम भाग नारीक एवं दहिन भाग पुरुषक अछि। एहि षटभुजी प्रस्तर मूर्तिक वाम भाग नारीक एवं दहिन भाग पुरुषक अछि। हिनक हाथ सभमे त्रिदेव (ब्रह्मा-विष्णु-महेश)क आयुध व उपकरण सभ शोभित अछि- अक्षमाला, त्रिशल ओ वरमुदा एवं पोथी, गदा ओ भयमुद्रा। मुदा सृष्टिक लेल पार्थक्यक आवश्यकता अनुभूत कएल गेल। फलतः देवस्वरूप ब्रह्मा-विष्णु-महेश (त्रिदेव)क परिकल्पना मूर्त कयल गेल। भच्छी (बहेड़ी, दरभंगा)क त्रिमूर्ति एकर उत्कृष्ट उदाहरण अछि। आलोच्य त्रिमूर्तिक मुख्य रूप ब्रह्माक थिक। रूपविन्यासमे दाढ़ी, हाथमे अक्षमाला ओ कमण्डलु, यज्ञोपवीत, मुकुट ओ वाहनक रूपमे हंस उत्कीर्ण अछि। मूर्ति चतुर्भुजी अछि। भच्छीक शिवमन्दिरमे पूजित आलोच्य मूर्ति यद्यपि मूलरूपमे ब्रह्माक अलावा शिव ओ विष्णुक प्रतीकसँ अलंकृत अछि। मिथिलांचलमे ब्रह्माक पूजा प्रायः वर्जित मानल गेल अछि, तथापि ब्रह्मा भच्छी (दरभंगा) ओ विथान (समस्तीपुर)मे अवशिष्ट छथि। भारतीय प्रतिमा विज्ञानमे कल्याणसुन्दर (शिवपार्वती परिणय)क मूर्तिमे ब्रह्मा पुरोहितक रूपमे उत्कीर्ण छथि।



संयुक्त मूर्तिक एहि परम्परामे हरिहर (विष्णु-शिव)क उल्लेख आवश्यक अछि। मूर्तिक दहिन भागमे शिव ओ वाम भागमे विष्णु उत्कीर्ण भेल छथि। शिवक अर्द्धाङ्गक सूचक अछि जटा, त्रिशूल ओ नाग एवं अर्द्धाङ्ग विष्णु बोधक किरीट, चक्र ओ शंख अछि। हरिहरक सर्वांग सुन्दर ओ अक्षत पालकालीन प्रस्तर प्रतिमा वाल्मीकिनगर (नेपाल दिस) एवं हरिहरक्षेत्र (सारण)मे संरक्षित अछि। शैव ओ वैष्णव सम्प्रदाय मध्य समन्वयक एकटा उपक्रम बनि गेल हरिहरक परिकल्पना। हरि ओ हर वस्तुतः एके छथि- “भल हर, भल हरि, भल तुअ कला। खनहि पीतवसन, खनहि बघछला”। हरिहर क्षेत्र संगम तीर्थ बनल अछि। एहि ठाम प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमाक अवसरपर विशाल मेला लगैत अछि। पौराणिक कथाक अनुसार एहिठाम गज-ग्राहक संघर्षक अंत विष्णुक हाथे भेल छल। एवं प्रकारे त्रिमूर्तिक परिकल्पनामे प्रतीकात्मक तत्व निहित अछि- सृजन, पालन ओ संहारक शक्ति। ब्रह्मचार्य, गार्हस्थ्य ओ संन्यासक संग-संग सात्विक राजसी ओ तामसी वृत्तिक समन्वय। तहिना हरिहरक परिकल्पनाक पृष्ठभूमिमे अन्तर्निहित अछि साम्प्रदायिक सद्भाव, जे ओहि युगक लेल अनिवार्य बनि गेल छल। साम्प्रदायिक विखण्डनसँ सामाजिक एकता खण्डित होइत अछि।



आलोच्य त्रिदेवमे देवाधिदेव महादेव शिवक स्थान सर्वोच्च अछि। शिवक पुरातात्विक सर्वप्राचीन अवशेषक रूपमे मोहनजोदड़ोक पशुपति शिव अछि, जे समस्त जीव-जन्तुक अधिपति बनल छथि। शिवकेँ गार्हस्थ जीवनक अधिष्ठाता मानल गेल अछि, फलतः ओ समस्त गृहस्थ लोकनिक पूज्य बनल छथि। हिनक लीला विस्तार पुराण-साहित्यक अतिरिक्त भारतीय मूर्तिकलामे सेहो देखना जाइछ। शैव परिवारमे शिवक अलावा पार्वती, गणेश ओ कार्तिकेय सेहो शास्त्र ओ लोकपूजित बनल छथि। त्रिदेवमे मात्र शिवक गार्हस्थ्य जीवनक एकटा विलक्षण अवधारणा बनल अछि। शिव औघरदानी छथि, कल्याणकारी देवता छथि एवं कालानुसार प्रलयंकर शिव अत्यंत प्राचीन एवं मिथिलांचलक सर्वप्रिय देवता छथि। ओना तँ शिवक परिकल्पना वैदिक थिक तथापि शिव-शक्तिक गौरवगान शैव पुराण सभमे विशेष रूपेँ भेल अछि। तदनुसार शिव स्वरूपक परिकल्पना प्राचीन मुदा अहिमे प्रत्यक्ष रूपे अंकित अछि। कुषाणराज वसुदेवक मुद्रापर शिव ओ हुनक वाहन वृषभ उत्कीर्ण अछि। हिनक सौम्य ओ रौद्ररूप दुनू प्रत्यंकित अछि। माथपर चन्द्रमा, हाथमे त्रिशूल, पिनाक व डमरू, त्रिनेत्र, बघछला, रुद्राक्ष, नागभूषण, वृषभ वाहन आदि विशिष्ट पहिचान बनल अछि। हुनक सौम्य रूप कल्याणसुन्दर, ललितरूप उमामाहेश्वर ओ रौद्ररूप महाकालमे अभिव्यंजित अछि। शिव नृत्य देवता नरेशक रूपमे सेहो विन्यस्त छथि। नटराज शिवक एकटा विलक्षण पालकालीन प्रस्तर मूर्ति तारालाही (दरभंगा)मे पूजित अछि। एहि मूर्तिमे नटराज शिव दैत्यपुत्र अपस्मारक कान्हपर ठाढ़ भऽ नृत्यरत छथि। चतुर्भुजी शिवक उपरका दुनू हाथमे गजासुरक वध निर्दिष्ट अछि। गजक पीठपर गणेश आसीन छथि। शेष चारिटा हाथमे त्रिशूल, डमरू ओ नृत्यमुद्रा सूचित अछि। एहि तरहक एकटा पालयुगीन प्रस्तर मूर्ति पपौर(सिवान)मे सेहो हम देखने छलहुँ। मूर्ति साढ़े चारि फीटक अछि।

मध्यकालीन परिवेशमे शैव प्रतिमामे सर्वाधिक लोकप्रियता उमा-माहेश्वरकेँ प्राप्त भेलैक। एहि तरहक मूर्ति सभ मिथिलांचलक भीठ-भगवानपुर, रक्सौल राजेश्वर, बाथे, महादेवमठ, तिरहुता, सौराठ, भोजपरौल, वनवारी, गाण्डीवेश्वर, कोर्थ, सिमरिया-भिण्डी, डोकहर, मंगरौनी ओ वसुदेवामे प्राप्त अछि। एहि मूर्तिमे उमा(पार्वती) शिवक वाम जांघपर बैसल छथि। शिव वाम हाथसँ उमाक आलिंगन कऽ रहल छथि। शिवक दहिन हाथमे त्रिशूल ओ वामहाथसँ देवीक वाम अंगक स्पर्श कऽ रहल छथि। पाठपीठमे शिव-पार्वतीक वाहन क्रमशः वृषभ ओ सिंह विश्रामक स्थितिमे उत्कीर्ण अछि। संभवतः एहि मूर्तिक परिकल्पना शंकराचार्यक सन्यासक विपरीत गृहस्थाश्रम दिस उत्प्रेरित करैत अछि।

पार्वतीक अभिशिल्पन स्वतँत्र रूपेँ सेहो भेल अछि। फुलहर (गिरिजा स्थान, मधुबनी), मिरजापुर (दरभंगा) ओ भरवारी (समस्तीपुर) क मन्दिर सभमे स्थापित ओ पूजित गिरिजा वस्तुतः पार्वतीक प्रतिरोप छथि, जाहिमे फुलहर ओ मिरजापुरक गिरीजाक मध्यकालीन प्रस्तर प्रतिमा सभक पार्श्वमे गणेश ओ कार्तिकेय सेहो प्रतिष्ठित छथि। दर्पण गिरिजाक विशिष्ट पहचान बनल अछि। किछु उमा-माहेश्वरक प्राचीन प्रतिमामे सेहो पार्वतीक हाथमे दर्पण सुशोभित छनि। दर्पण श्रृंगार सूचक प्रतीक अछि। सभटा मूर्ति स्थानक मुद्रामे बनल अछि एवं नख-शिख विभिन्न आभूषणसभसँ अलंकृत अछि। मूर्तिमे गणेश ओ कार्तिकेयक उपस्थिति हुनक वात्सल्य बोधक अछि। दरभंगाक मिरजापुर मोहल्लामे अवस्थित एवं म्लेच्छमर्दनीक रूपे लोकख्यात ई , मूर्ति सर्वांग सुन्दर ओ कलात्मक अछि। फुलहरक गिरीजा रूपेँ पूजित पार्वतीक विशेष पूजा जानकी करैत छलीह। ’रामचरित मानस’क फुलवारी प्रसंगक अनुरूपेँ गिरीजा आइयो कुमारी कन्या लोकनिक अभीष्ट बनल छथि।



शिव-पार्वतीक प्रतीकपूजन जलढरीमे अवस्थित शिवलिंगक रूपमे सेहो लोकप्रचलित अछि। मुदा शिवलिंगमे पार्वतीमुखक अभिशिल्पन एकमुखी शिवलिंग अथवा गौरीशंकरक रूपेँ अभिज्ञात अछि। एकमुखी शिवलिंगक सर्वप्राचीन प्रस्तर मूर्ति (कुषाणकालीन) चण्डीस्थान (अरेराज, प. चम्पारण) मे हम देखने छलहुँ। एकमुखी शिवलिंग जमथरि (मधुबनी), हाजीपुर (वैशाली), आदिक अतिरिक्त चतुर्मुखी शिवलिंगक गुप्तकालीन प्रतिमा कम्मन छपरा ( अभिलेखयुक्त, वैशाली)क अलावा बनियाँ (वैशाली)क पालयुगीन चतुर्मुखी शिवलिंगक परम्परामे अरेराज (प.चम्पारण)क शिवमन्दिरमे चतुर्मुखी पशुपति शिवलिंग संपूजित अछि। एम्हर गढपुरा (बेगुसराय)क मंदिरमे एकटा प्राचीन चौमुखी महादेवक लोकपूजन परम्परीत अछि।



शिवलिंगक परिकल्पना ज्योतिलिंग (द्वादश ज्योतिर्लिंग), एकादशरुद्र (मंगरौनी), सहस्रमुखलिंग (कटहरिया, वैशाली/ वारी, समस्तीपुर)क अतिरिक्त विशाल शिवलिंग (तिलकेश्वर, दरभंगा/ चेचर, वैशाली), घूर्णित, शिवलिंग (जमथरि, मधुबनी) आदि सूचित अछि। कुशध्वज जनक द्वारा स्थापित कुशेश्वर, सीरध्वज जनक द्वारा प्रतिष्ठापित तिलकेश्वर, कपिल द्वारा स्थापित कपिलेश्वर, विदेश्वरक अंकुरित शिवलिंग, अरेराजक सोमेश्वरनाथ, कलनाक कल्याणेश्वर शिव, ऋषिशृंग द्वारा स्थापित सिंहेश्वरनाथ, नेपाल तराइक जलेश्वर आदि प्रसिद्ध शिवतीर्थ अछि, जाहिठाम प्रायः प्रत्येक रविवार शिवरात्रि आदिक अलावा सावनमे भरि मास शिवक जलाभिषेक होइछ। परिसरमे शिवभक्तक बोलबमक जयघोष, कांवरिया सभक तीर्थवास, मेलादि लगैत अछि। शिवरात्रिक मेला विशेष महत्वक होइछ। सद्योजात (अलौलीगढ़, बेगुसराय/ जनकपुर, नेपाल) मे शिव शिशु रूपमे ओ पार्वती माता रूपमे उत्कीर्ण अछि, तांत्रिक मूर्ति। गणेश यद्यपि शिवपुत्र छथि, मुदा पंचदेवोपासनामे ओ प्रथम छथि। कोनो शुभ कार्यक आरम्भमे गणेश पूजन कयल जाइछ। कियेक तँ ओ विघ्ननाशक ओ सिद्धि दाता देव मानल जाइत छथि। मुख्य लक्षण मानल जाइछ-ठिगना कद, लम्बोदर, सूढ़, हाथमे अंकुश (परशु), कलम एवं लड्डू। हाथ सभक संख्या चारिसँ बारह धरि मानल जाइछ। ओ स्थानक ललितासनमे बैसल अथवा नृत्य मुद्रामे निर्मित पाओल जाइछ। मन्दिरक प्रवेश द्वारपर गणेशक प्रतिष्ठा देल जाइछ। गणेशक स्वतंत्र प्रतिमा कोर्थू, हावीडीह, भीठ-भगवानपुर, सौराठ, देकुली, फुलहर, करियन, भोज परौल, बहेड़ा, भच्छी, विष्णु बरुआर, लहेरियासराय, रतनपुर आदि स्थान सभमे पूजल जाइत छथि। माता शिशुक रूपमे पार्वतीक गोदमे शिशु गणेशक अलावा गणेशक मूर्ति लक्ष्मी (लक्ष्मी गणेश, दिपावली)क संग ओ महिषासुरमर्दिनी दुर्गा (पार्वती रूपा)क पर्श्व देवताक रूपमे संरचनाक लोकपरम्परा अछि। विजयादश्मीक अवसरपर परम्परासँ बनैत महिषासुरमर्दिनी दुर्गाक पार्श्वदेवता गणेश ओ कार्तिकेय मानल जाइत छथि। कार्तिकेयक स्वतंत्र प्रस्तर प्रतिमा सभ (पालयुगीन) बसाढ़ (वैशाली) एवं वसुआरा (मधुबनी)क मन्दिरसभमे प्रतिष्ठित एवं पूजित अछि। कार्तिकेय युद्धक देवता मानल जाइत छथि। हिनका स्कन्द ओ महासेनक रूपमे सेहो जानल जाइत छनि। कार्तिकेयक मूर्तिमे मोरक वाहन एवं हाथमे बरछी (शूल)क विधान अभिहित अछि। दुनू प्रस्तर प्रतिमा पाल कलाक कलात्मक प्रतिमान अछि। पुण्ड्रवर्धनमे कार्तिकेयक मन्दिरक उल्लेख सेहो प्राप्त होइछ। पुण्ड्रवर्धनक भौगोलिक पहिचान पूर्णियाँक(जनपदक)सँ कयल गेल अछि।



शिव परिवारक एकटा विशाल संगमर्मर मूर्ति लालगंज (वैशाली)क शिवमन्दिरमे स्थापित एवं पूजित अछि। वृषभक पीठपर शिव-पार्वती आसीन छथि। गणेश ओ कार्तिकेय अपन माता-पिता (शिव-पार्वती)क गोदीमे बैसल छथि। शिल्प ओ शैलीमे आलोच्य मूर्ति विलक्षण अछि। शिव परिवारक एकटा आर देवता छथि भैरव, जनिक आकृति भयानक, बढ़ल पेट, गरामे मुण्डमाल, नागाभूषण, हाथमे त्रिशूल आदि शोभित अछि। भैरवक विशाल प्रस्तर मूर्ति वठिया (भैरव बलिया, सकरी, दरभंगा)मे पूजित अछि। भैरव ज्वालमुकुट पहिरने छथि। एहि भैरव मूर्तिक दोसर प्रति भमरलपुर संग्रहालयसँ प्राप्त भेल अछि। भैरवकेँ शिवक रौद्ररूप कहल गेल अछि। नेपाल उपत्यका (काठमाण्डू)मे भैरवक मूर्तिसभक अनेक प्रकार देखने छलहुँ- आकाश-भैरव, पाताल भैरव, काल भैरव, उन्मत्त भैरव आदि। कुमारी कन्या लोकनिक हेतु उन्मत्त भैरवक पूजन वर्जित अछि। शिवक काशीमे वर्चस्व छनि (विश्वनाथ) तँ भैरवक वर्चस्व तिरहुतमे मानल गेल अछि। काशीकेँ शिव अपने रखलनि, भैरव तिरहुत देल। मिथिलांचलमे शिव भक्तिक रूपमे नचारी गान ओ नर्त्तनक विधान अछि। मैथिलीमे बहुतरास नचारी रचल गेल। आइने अकबरीमे नचारी गानक उल्लेख प्राप्त होइछ। नचारीक एकटा अर्थ भेल- लचारी, अर्थात् नचारी गीतसभमे दुख-दैन्यक भाव अभिव्यंजित अछि। दोसर अर्थ भेल नृत्यक आचारसँ संवलित गीत अनुष्ठान। नचारी गयनिहार डमरूक संगे नाचि-नाचि कए गबैत छथि। गीत ओ नृत्य एकटा आनुष्ठानिक कृत्य थिक। भक्तिपरक गीतसभमे नचारीक स्थान विशिष्ट अछि। “संगीत भाष्कर”क अनुसार “गीतं वाद्यं तथा नृत्यं त्रयं संगीतमुच्यते” अर्थात् गीत, नृत्य ओ वाद्य मिलकए संगीत सृजित होइछ। जँ एहिमे नाट्यक समावेश कए देल जाय तँ एहि प्रकारक सांगीतिक रचना कीर्तनियाँ बनि जाइछ। “हरगौरी विवाह” (जगज्योतिर्मल्ल) शिव-भक्ति विषयक एकटा सांगतिक रचना थिक जाहिमे नचारी गीत सेहो प्रतिध्वनित अछि।



अनुश्रुतिक अनुसार शिव मिथिलांचलक सर्वलोकप्रिय देवता छथि। गामे-गाम शिवक पूजन होइत अछि। ओ प्रागेतिहासिक, पौराणिक ओ लोकदेवता छथि। शास्त्र, पुराण, तंत्र, योग आदि ग्रंथसभमे हिनक माहात्म्य ओ दर्शन पाओल जाइछ। शंकराचार्य द्वारा स्थापित ज्योतिलिंगसभक विशाल भारतक धार्मिक एकताकेँ रेखांकित करैत अछि, तहिना काशी ओ मिथिलाक परिकल्पित परिक्रमाक अवधारणा आलोच्य शिवक्षेत्रकेँ महिमामंडन करैत अछि।



शिवक पश्चात् विष्णुपूजनक प्रधानता मिथिलांचलमे अछि। तद्विषयक पुरातात्विक प्रमाणस्वरूप स्थापत्य (मंदिर) ओ मूर्तिसभ एहि विशाल भूभागमे उपलभ्य अछि। एहिठामक जनजीवनमे वैष्णवधर्मिताक साक्षात् दर्शन पंचदेवोपासनामे विष्णुपूजन भस्मी त्रिपुण्डक संगे चन्दन तिलक, रामनवमी, विवाह-पंचमी, जन्माष्टमी, सत्यनारायणपूजा आदि वैष्णवधर्मी अनुष्ठान, चतुःशंख अरिपन, अष्टदल अरिपनक विन्यास, वैष्णवधर्मी कीर्तनिया नाच आदिमे होइत अछि। गुप्तकालमे वैष्णव धर्मकेँ राजकीय संरक्षण प्राप्त भेने ओ अपन उत्कर्षपर छल। तत्युगीन वैष्णवधर्मी पुराणसभमे हिनक महिमा मंडन भेल अछि। विष्णु द्विभुजीसँ चतुर्भुजी भेलाह। समुद्रमंथनसँ प्राप्त लक्ष्मीकेँ हुनक सेवामे लगाओल गेलनि। लक्ष्मीनारायणक परिकल्पना कयल गेल। शेषशायी विष्णुक परिकल्पनाकेँ प्रस्तर शिल्पमे उत्कीर्ण कयल गेल। दशावतारक महिमा मंडनक क्रममे वराह अवतार ओ नरसिंह अवतारक मूर्तिसभ अपेक्षाकृत बेसी पाओल जाइछ। गुप्त राजा लोकनि वराह अवतारक माध्यमे पृथ्वी (साम्राज्य) उद्धारक रूपेँ प्रतीकित कयलनि। मिथिलांचलमे वराह अवतारक एकटा मध्यकालीन सुन्दर प्रस्तर मूर्ति तिलकेश्वरगढ़ (दरभंगा)सँ प्राप्त भेल अछि, जे सम्प्रति चन्द्रधारी राजकीय संग्रहालय (दरभंगा)मे संरक्षित अछि। तहिना नरसिंह अवतारक अभिशिल्पन दुष्टदलनक संदर्भमे कयल गेल, मुदा मिथिलांचलसँ एहि तरहक मूर्ति अप्राप्त अछि। मिथिलांचलमे गुप्त शासनकालसँ पाल-सेन ओ कर्णाट काल धरि वैष्णवधर्मी मूर्ति सभक निर्माण ओ प्रतिष्ठा व्यापक रूपेँ कयल गेल। पालवंशी राजा लोकनिक शासनकालमे यद्यपि सर्वधर्म समभावक (बौद्धमूर्ति अभिशिल्पनक कारणे) प्रधानता छल, मुदा सेन ओ कर्णाट शासन कालमे वैष्णव धर्मकेँ धार्मिक नवजागरणक रूपमे स्वीकार कयल गेल अछि। जयदेव, चैतन्य, विद्यापति, चण्डीदास, शंकरदेव आदि एहि सांस्कृतिक युगक साक्षात् वैष्णवधर्मी चेतना पुरुष छलाह, जनिका माध्यमे जनजीवन धरि आन्दोलित भेल।

विष्णुक उल्लेख वेदमे पाओल जाइछ। मुदा पहिने ओ सूर्यक एकटा रूप छलाह। पाछाँ चलि कए एकटा प्रमुख देवता बनि गेलाह। बसाढ़ (वैशाली)क पुरातात्विक उत्खननसँ प्राप्त एकटा माटिक मोहरपर उत्कीर्ण त्रिशूलक अगल-बगलमे शंख ओ चक्र उत्कीर्ण अछि, ई निसंदेह विष्णु प्रतीक थिक। सम्भवतः ओ शिव ओ विष्णुक साहचर्यक सद्भाव प्रतीक अछि। एकटा दोसर मोहरपर उत्कीर्ण वेदीपर राखल चक्रक दुनूदिस शंख उत्कीर्ण अछि, जे निसंदेह वैष्णवधर्मी प्रतीक अछि। ई सभ गुप्तकालीन पुरावशेष अछि। विष्णुक मूर्ति विभिन्न आकार-प्रकारमे बनल मिथिलांचलमे प्राप्त होइछ।, जाहिमे द्विभुजी विष्णुक एक हाथमे शंख ओ दोसर वर मुद्रामे अछि। एहि रूपमे लोकपाल कहल जाइछ। एहितरहक एकटा विशाल विष्णुमूर्ति तिरहुतक कर्णाटकालीन राजधानी सिमरौनगढ़ (नेपाल तराइ)मे प्राप्त अछि। सिमरौनागढ़मे विष्णुक बहुतरास आदमकद चतुर्भुजी प्रतिमा सभ कंकाली मन्दिरक परिसरमे राखल अछि। विष्णुक माथपर किरीट ओ हाथसभमे शंख, चक्र, गदा ओ पद्म छाजीत छनि।



मिथिलांचलमे चतुर्भुजी विष्णुक पाल, सेन ओ कर्णाटकालीन पाठरक मूर्तिसभ हुलासपट्टी, भीठभगवानपुर, अन्धरा ठाढ़ी, बिदेश्वर, भवानीपुर, जितवारपुर, जयनगर, नरार, अकौर, हावी भौआर, हावीडीह, पोखराम, लदहो, रखवारी, कनहई, कोर्थ, सोनहद, वोरवा, तुमौल, नेहरा, कुर्सो नदियामी, मदरीया, केवटी, भैरव बलिया, बसुदेवा, हाजीपुर, सोनपुर, सेहान आदिक अतिरिक्त सांस्कृतिक मिथिलांचलक सीमान्त क्षेत्र वाल्मीकिनगर (नेपाल तराइ) मे बहुतरास आदमकद विष्णु मूर्ति सभ प्राप्त भेल अछि। संख्यात्मक ओ गुणात्मक दृष्टिसँ विष्णुक सर्वाधिक प्राचीन प्रस्तर मूर्ति सभ मिथिलांचलक अकौर नेपाल तराइक समरौनागढ़ ओ वाल्मीकिनगरमे प्राप्त अछि, जाहिसँ ई निष्कर्ष निकालल जा सकैछ जे ओ सभ वैष्णवधर्मक क्षेत्रमे प्रमुख स्थल छल। अकौर गाममे विष्णुक छहटा प्राचीन प्रस्तर प्रतिमा सभ सहजेँ उत्खनित भए प्राप्त भेल अछि। डॉ. सत्येन्द्र कुमार झा डुमरा परसा (मधुबनी)क एकटा विलक्षण विष्णु मूर्तिक उल्लेख कयने छथि। चारि फीटक एहि मूर्तिक माथपर किरीटक स्थानपर नागफण (सत्ताइस)क अलंकरण कयल गेल अछि, जे शेषनागक प्रतीक अछि। एहि मूर्तिक रचनाकाल तेरहम चौदहम शताब्दी आंकल गेल अछि। सभटा प्रतिमामे विष्णु स्थानक मुद्रामे बनल छथि ओ हुनक पार्श्ववाहिनी रूपेँ चँवरधारिणी लक्ष्मी ओ वीणाधारिणी सरस्वती उत्कीर्ण छथि। पूर्व मध्यकालमे वैष्णव धर्म एहि क्षेत्रक एकटा लोकप्रिय सम्प्रदाय छल।



विष्णुक एहि परम्परित स्वरूपक क्रममे किछु ऐतिहासिक विशिष्ट मूर्ति शिल्प प्राप्त भेल अछि। पहिल वसुदेवा (सिंगिया, समस्तीपुर)सँ प्राप्त विष्णुक वासुदेव रूप। चतुर्भुजी वासुदेवक हाथसभमे अग्निपुराण (अध्याय चौवालिस)क अनुसार उपरक हाथसभमे शंख-चक्र ओ निचलकामे गदा-कमल बनल अछि। माथपर किरीट ओ गलामे ठेहुन धरि वनमालाक अलंकरण। मुख्य मूर्तिक पार्श्व भागमे अनेक देवी-देवता सभ उत्कीर्ण छथि। दोसर अछि अवाम (उजान लग, दरभंगा)क शेषशायी विष्णु (४७” * २६”)। एहिमे शेषशय्यापर विश्राम करैत विष्णुक पैर दाबि रहल छथिन लक्ष्मी। नाभिसँ निकलल नाल कमलपर बैसल छथि ब्रह्मा। तेसर प्रतिमा अछि तिलकेश्वर ( दरभंगा)सँ प्राप्त वराह विष्णु (३४”)। वीर भावमे ठाढ़ एहि चतुर्भुजी मूर्तिक चारूहाथमे शंख, चक्र, गदा ओ पद्मक अतिरिक्त वाम स्कंधपर पृथ्वी बैसल छथि, जनिक उद्धार विष्णु वराह अवतारक रूपेँ कयलनि। वराहविष्णुक पादभागमे नागदेवी सभ हाथमे क्षत्र ओ कमल धयने छथि। वराह अवतारक एकमात्र स्वतंत्र प्रतिमा एकटा दुर्लभ ओ ऐतिहासिक उपलब्धि मानल जाइछ। तिलकेश्वर महादेव मन्दिरक द्वारखण्डपर कर्मादित्यक शिलालेख तिरहुतामे उत्कीर्ण अछि। संगमपर स्थापित एहि महादेवस्थानमे शिवरात्रिक मेला लगैत अछि। चारिम विष्णु-मूर्तिक एकटा ऐतिहासिक स्वरूप सेहान (वैशाली)सँ प्राप्त अछि, जे मध्यकालीन तिरहुत शैलीमे निर्मित मंदिरमे स्थापित ओ पूजित अछि। सेहानक विष्णु श्रीरामक रूपमे पूजित छथि। रामनवमीक अवसरपर एकटा विशाल मेला लगैत अछि। मूर्ति पालकालीन अछि। जनश्रुतिक अनुसार नरसिंह अवतारक एकटा स्थान पूर्णियाँ जिलाक मानिकथंभ (माणिक स्तंभ) नामक ग्राममे प्राप्त अछि, मुदा मूर्ति नहि अछि। मुदा कटिहार जिलाक वेलंदाक प्राचीन विष्णु मंदिर अपन जर्जर अवस्थामे प्राप्त अछि। एहि तरहेँ वैष्णव धर्मक व्याप्ति वाल्मीकि नगरीसँ लऽ कऽ कटिहार धरि देखना जाइछ। एहि क्रमे पाँचम उपलब्धि सोनपुर (सारण)क कालीमन्दिरक भीतमे अवस्थित एकटा मूर्ति फलक गरुड़वाही विष्णुक अछि, जाहिमे भगवान विष्णु गरुड़पर आरुढ़ भए हरिहरक्षेत्रक गजग्राह युद्धक समापनक लेल गजक आर्तपुकारपर आयल छलाह। सोनपुर हरि (विष्णु) हर (शिव)क नामित क्षेत्र मानल जाइछ। एवं प्रकारे मिथिलांचलमे विष्णुपूजन अनेक रूपमे उपलब्ध अछि।



सूर्य वैदिक देवता ओ विष्णुक एकटा प्रतिरूप जकाँ पूजित छथि, मुदा ओ पंचदेवोपासनामे विशेष रूपमे प्रतिष्ठित छथि। मिथिलांचलमे सूर्यक वैदिक, पौराणिक ओ लौकिक तीनोक समन्वित रूप जनमानसपर अंकित अछि। सूर्यक स्थानक रूपक परिकल्पना मुख्यतः कुषाणकालमे मूर्त भेल। तदनुसार रथारूढ़ सूर्यक माथपर किरीट, दुनू हाथमे कमल-पुष्प, वाम भागक कमरसँ लटकैत तलवार हुनक मुख्य रूप छनि। कालान्तरमे पार्श्वदेवी देवताक अलंकरण सेहो विन्यस्त छल। पार्श्व देवताक रूपमे एक दिस दवात लेने पिंगल ओ दोसर दिस दण्ड लेने दण्डी। पैरमे लम्बा बूट ओ देह रक्षार्थ कवच, पैरक आगाँ बैसल रथवाहक अरुण। पार्श्वदेवीक रूपमे उषा ओ प्रत्यूषा उत्कीर्ण अछि। मिथिलंचलमे अनेक मध्यकालीन सूर्य मूर्ति सभ बरौनी जयमंगलगढ़ (बेगुसराय) भीठ भगवानपुर (मधुबनी), अन्धरा-ठाढ़ी (कमलादित्य, मधुबनी), देकुली, असगाँव-धर्मपुर (दरभंगा), कुर्सो नदियामी, रखबारी, परसा, भोज परौल, रतनपुर, विष्णु बरुआर, गाण्डीवेश्वर स्थान, सवास, छर्रापट्टी, अरई, कोर्थ, हावीडीह, डिलाही, नाहर भगवतीपुर, राजनगर, पस्टन, पटला, जगदीशपुर, देवपुरा आदिक अलावा चकवेदौलिया (बेगुसराय), तैयबपुर (वैशाली) आदि स्थान सभमे पाओल गेल एवं ओ प्रतिष्ठित-पूजित छथि। एहि ऐतिहासिक सूर्य प्रतिमा सभमे विशेष उल्लेखनीय अछि- परसा (झंझारपुर, मधुबनी)क सूर्य मूर्ति (४८*२४ सेमी.) जे प्रायः तेरहम सदीक कलाकृति अछि। ओ पालकालीन अलंकरणसँ बनल अछि। दोसर विशिष्ट सूर्यमूर्ति विष्णु बरुआर (मधुबनी)क अछि, जकरा द्वादश आदित्यक संज्ञा देल जाइछ। एहि मूर्तिमे द्वादश आदित्य उत्कीर्ण छथि। तेसर विशिष्ट सूर्यमूर्ति अछि, देवपुरा (बेनीपट्टी, मधुबनी) ओ रघेपुरा (दरभंगा)क जाहिमे देवपुराक मूर्तिमे उषा-प्रत्यूषा, दण्ड-पिंगलसँ अलंकृत तथा रघेपुराक सूर्यमूर्ति पालमूर्ति कलासँ भिन्न मिथिला शैलीमे निर्मित अछि। ई सभटा सूर्यमूर्ति पंच्देवोपासनाक एकटा प्रतीक रूपमे पोजित छथि, यद्यपि जनजीवनमे सूर्य पूजा छठीमइयाक रूपमे परम्परीत अछि। मिथिलांचलक चक वेदौलिया (बेगुसराय)मे एकटा प्राचीन सूर्यमन्दिरक प्राप्तिसँ ई धारणा बनैत अछि, जे ओ स्वतंत्र रूपेँ सेहो पूजित होइत छलाह। कन्दाहा सहरसा)मे सेहो एकटा स्वतंत्र ऐतिहासिक सूर्य मन्दिर अवशिष्ट अछि। सूर्य मूर्तिक प्रभावलीमे उत्कीर्ण अभिलेख स्वयं अपन ऐतिहासिक अस्तित्वक चर्च करैत अछि। अभिलेख नरसिंहदेवक अछि। ओऽ ओइनवार वंशीय छलाह।



पंचदेवोपासनाक मूलमे भगवती केन्द्रित छथि आर मिथिलांचल शाक्तभूमि अथवा शाक्तपीठक रूपमे साधनाभूमि शताब्दियहुसँ बनल अछि। मिथिलांचलमे भगवती अपन अनेक रूपमे मूर्त भए पूजित छथि। वनगाँव-महिषीक उग्रतारा, विराटपुरक चण्डी, धमदाहाक कात्यानी (सहरसा जिलान्तर्गत) क अतिरिक्त उच्चैठ, फुलहर (मधुबनी), करियन समस्तीपुरक गिरीजा, मिरजापुर-दरभंगाक म्लेच्छमर्दिनी, कोइलखक भद्रकाली भगवती, वारी(समस्तीपुर)क भगवती तारा, अन्दामा (दरभंगा)क म्लेच्छमर्दिनी, जरैल-परसौन, कोइलख, भवानीपुर, भण्डारिसम (दरभंगा), भोजपरौल (मधुबनी), कोर्थ (दरभंगा)क काली, देकुली (दरभंगा)क भगवती, बहेड़ी ओ नाहरक महिषासुर मर्दिनी, कटरा (मुजफ्फरपुर) ओ कोइलख (महुबनी)क चामुण्डा, सिमरौनगढ़ (नेपाल तराइ) ओ वीरपुर (सहरसा)क कंकाली, सखड़ाक (नेपाल तराइ) छिन्नमस्ता एवं गढ़बरुआरी (सहरसा) ओ भीठभगवानपुर (मधुबनी)क दशमहाविद्यामे परिगणित देवी सभ प्रतिष्ठित ओ पूजित छथि। हम पुनामा-प्रतापनगर (नवगछिया)मे वाराहीक एकटा भव्य, विशाल ओ स्वतंत्र मध्यकालीन प्रस्तर मूर्ति देखने छलहुँ। भीठ-भगवानपुर ओ गढ़ बरुआरीक दशमहाविद्या कर्णाटकालीन कलाकृति थिक। भीठ-भगवानपुर कर्णाटराजा मल्लदेवक राजधानीनगर छल एवं गढ़वरुआरी कर्णाटवंशीय गन्धवरिया परमार राजपूत सभक क्षेत्र अछि। डॉ. हीरानन्द आचार्य राजनगर (मधुबनी)मे सेहो दशमहाविद्या भगवतीक मन्दिरक सूचना देने छथि। दशमहाविद्याक पूजोपासना तांत्रिक विधियेँ कयल जाइछ। जयनगरक मन्दिरक ऊपरी भागमे श्रीयन्त्र राखल छल। ध्यातव्य अछि जे खण्डवला कुलक राजा लोकनि शाक्तधर्मी छलाह। दरभंगा राज परिसरक श्यामा मन्दिर “मिथिलेश रमेशस्य चितायां सुप्रतिष्ठा’ चर्चिता साधना पीठ बनल अछि।



मिथिलांचलक शाक्त साधनाक्षेत्रमे पूजित एवं प्रतिष्ठित अन्यान्य देवी सभमे गंगा-यमुनाक मध्यकालीन प्रस्तर मूर्तिसभ सेहो उपलभ्य अछि। ओना तँ गंगा-यमुनाक मूर्ति प्रायः राजकीय स्थापत्यमे निर्मित होयबाक परम्परा रहल अछि, अन्धराठाढ़ीक कमलादित्य स्थानमे राखल भग्न लक्ष्मीनारायणक अभिलिखित कर्णाट कालीन प्रस्तर मोर्तिक पार्श्वमे गंगा ओ यमुनाक उत्कीर्ण मूर्ति अवशिष्ट अछि। अभिलेखमे कर्णाट वंशक संस्थापक जेना राजा नान्यदेवक प्रशस्ति श्रीधर लिखने छथि। ठाढ़ीक प्रसिद्धि परमेश्वरी भगवतीक लेल सेहो अछि। गंगा ओ यमुनाक स्वतंत्र प्रस्तर मूर्ति नगर डीह (दरभंगा) ओ बरसाम (मधुबनी)मे प्राप्य अछि। गंगा मकरवाहिनी ओ यमुना कच्छप वाहिनी रूपेँ निर्मित छथि। वाम हाथमे कलश छनि एवं नाना आभूषणसँ अलंकृत अछि।

शाक्त भूमि मिथिलांचलसँ भगवतीक प्रस्तर मूर्तिसभ उच्चैठ (मधुबनी), भोज परौल (मधुबनी), भंडारिसम (दरभंगा) ओ वारी (समस्तीपुर)सँ प्राप्त भेल अछि। उच्चैठक भगवतीक एकान्त साधक कालिदास छलाह। मूर्ति (३३”) चतुर्भुजी अछि। वाम हाथ सभमे त्रिशूल ओ अमृतकलश एवं दहिन हाथमे दर्पण (कमल पुष्पाकार) ओ लघुपात्र अछि। सिर, गला, कान, बाँहि, कलाइ, कमर ओ पैर आदि आभूषण सभसँ अलंकृत अछि। देहमे यज्ञोपवीत ओ वाहनक रूपमे सिंह उत्कीर्ण अछि। भगवती कमलासनपर आसीन छथि। भोज परौलक भगवतीमूर्ति (३५”) उच्चैठक भगवतीक समतुल्य अछि। भगवतीक तेसर प्रस्तर मूर्ति भंडारिसम (दरभंगा)क मन्दिरमे प्रतिष्ठित अछि। एहि चतुर्भुजी मूर्तिक (४८”) दहिन हाथमे खड्ग अछि। भगवती कमलपुष्पपर ललितासनमे बैसल छथि। पादपीठमे सिंह उत्कीर्ण अछि। आर सभटा विन्यास पूर्वत अछि। हिनका भगवती वाणेश्वरी सेहो कहल जाइछ। चारिम मूर्ति वारीर (समस्तीपुर)मे स्थापित ओ पूजित अछि। मुदा भगवती षटभुजी छथि (३४”)। वाम हाथमे ढाल, छतरी ओ अज्ञात पदार्थ एवं दहिन हाथसभमे अक्षमाला, खड्ग ओ अभय मुद्रामे अछि। शेष विन्यास पूर्ववत अछि। पंचम षटभुजी मूर्ति देकुली (दरभंगा)मे स्थापित अछि। एहि भगवती सभमे उच्चैठक भगवतीक स्थान सर्वोपरि अछि।

भगवतीक सौम्य रूप गिरीजाक मूर्तिसभ फुलहर (गिरीजास्थान, मधुबनी, ३७”), मिर्जापुर (दरभंगा, ३२”) ओ कुर्सो नदियामी (दरभंगा)क मन्दिरसभमे संपूजित अछि। पुलहर ओ मिरजापुरक गिरीजाक पार्श्वमे गणेश एवं कार्तिकेय उत्कीर्ण अछि। दुनू चतुर्भुजी एवं स्थानक मुद्रामे निर्मित अछि। सत्यार्थीक अवलोकनक अनुसार आलोच्य मोतिमे गिरीजा, राधा ओ लक्ष्मी समन्वित छथि। गिरीजाक मुरलीक अंकन विशिष्ट अछि। हिनक ख्याति म्लेच्छमर्दनीक रूपमे विशेष अछि। भगवतीक महिषासुर मर्दनीक रूप सर्वाधिक लोकप्रिय अछि। मिथिलांचलक मध्यकालीन परिवेशमे महिषासुरमर्सिनी वनाम म्लेच्छमर्दिनीक परिकल्पित शिल्पांकन बेस उपयुक्त छल। मध्यकाल संघर्षक काल छल। एहि परिस्थितिमे महिषासुर मर्दिनी उत्प्रेरक भेलीह। एहि तरहक मूर्तिसभ बरसाम, कुर्सोनदियामी, नाहर, अन्दामा, वैद्यनाथपुर, उजान, बुढेव, पोखराम, नेहरा, हावीडीह, बहेड़ी, सिमरिया भिण्डी, जरैल-परसौन, चौगाम, लावापुर आदि स्थानसभसँ प्राप्त भेल अछि। नवरात्रक अवसरपर प्रायः गामसभमे महिषासुर मर्दिनी दुर्गाक लोकपरिकल्पित मूर्तिसभ प्रतिवर्ष बनैत अछि, पूजित होइत छथि एवं विसर्जित होइत अछि। मूर्तिक परिकल्पना “दानवत्वपर देवत्वक विजय” केन्द्रित अछि।

भगवतीक अन्यान्य रूप सभमे नागदेवी मनसा (भैरव स्थान, मुजफ्फरपुर), विषहरी (नाथनगर, भागलपुर), वशिष्टाराधिता तारा (महिषी, सहरसा), सरस्वती (जयनगर, मधुबनी), काली (कोर्थ, दरभंगा), गजलक्ष्मी (भीठभगवानपुर, मधुबनी), तारा (बौद्धदेवी, वारी,समस्तीपुर) जगतपुर वरुआरी (सहरसा), जयमंगला (बेगूसराय), सहोदरा(नरकटयागंज, प. चम्पारण), पार्वती (करियन, समस्तीपुर), भरवारी, समस्तीपुर आदिक प्राचीन ओ ऐतिहासिक पाथरक मूर्तिसभ मिथिलांचलसँ प्राप्त भेल एवं ओऽ सभ पूजित अछि।

मिथिलाक मध्यकालीन सांस्कृतिक इतिहासक परिप्रेक्ष्यमे पंचदेवोपासनाक परिकल्पना विभिन्न साम्प्रदायिक सद्भावक अनुक्रममे कयल गेल छल, ओ बहुत किछु सामाजिक एवं सांस्कृतिक धरातलपर फलीभूत भेल। बहुतरास मन्दिरसभ एकर उदाहरण बनल अछि।