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मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध-प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ पुरोहित आ स्त्री-धन केर संदर्भमे
एहि प्रबन्धमे मायानन्दजीक स्त्रीधन, पुरोहित, मंत्र-पुत्र आ प्रथमं शैलपुत्री च- एहि चारि पोथीक जे कथा-विधान आ साहित्यिक विवेचन छल तकरा यथा संभव नञि छुअल गेल आ मात्र इतिहास-बोधक सन्दर्भमे विवेचना अछि।
प्रबंधमे मायानान्द जीक १.प्रथमं शैल पुत्री च २.मंत्रपुत्र ३.पुरोहित आ ४. स्त्री-धन एहि चारि ऐतिहासिक उपन्यास सभक आधार पर लेखक द्वारा लगभग दू दशकमे पूर्ण कएल गेल इतिहास यात्राक समीक्षा कएल गेल अछि। एहिमे प्रयुक्त पुस्तकमे, मंत्रपुत्र मैथिलीमे अछि आ शेष तीनू उपन्यास हिन्दीमे, तथापि यात्रा पूर्णताक दृष्ट्वा आ श्रृंखलाक तारतम्य आ समीक्षाक पूर्णताक हेतु चारू किताबक प्रयोग अनिवार्य छल।
कालक्रमक दृष्टिसँ प्रथमं शैल पुत्री च प्रथम अछि । एहिमे १५०० ई.पू.सँ पहिलुका इतिहासक आधार लेल गेल अछि। मंत्रपुत्रमे १५०० ई.पू. सँ १२०० ई.पू. धरिक इतिहास उपन्यासक आधार अछि। ई सभ आधार भारत युद्धक पहिलुका अछि। पुरोहितमे १२०० ई.पू.सँ १००० ई.पू. धरिक इतिहास अछि- एकरा ब्राह्मण साहित्यक युगक इतिहास कहि सकैत छी। स्त्रीधनक आधार अछि सूत्र-स्मृतिकालीन मिथिला।
मुदा रचना भेल मैथिली मंत्रपुत्रक पहिने -नवंबर १९८६ मे। प्रथमं शैल पुत्री च एकर दू सालक बाद रचित भेल आ ताहिमे मायानन्द जी चारू किताबक रचनाक रूपरेखा देलन्हि मुदा ई हिन्दीक संदर्भमे छल। एकर बाद सभटा किताब हिन्दी मे आएल। हिन्दी मंत्रपुत्र आएल जाहि कारणसँ तेसर पुस्तक पुरोहित किछु देरीसँ १९९९ मे प्रकाशित भेल। स्त्रीधन जे एहि श्रृंखलाक अंतिम पुस्तक अछि, २००७ ई. मे प्रकाशित भेल।
“प्रथमं शैल पुत्री च” केर प्रस्तावनाक नाम कवच छल।मंत्रपुत्रक प्रस्तावनाक नाम ऋचालोक छल आ ई पुस्तकक अंतमे राखल गेल, किएक तँ ई लेखकक प्रथम ऐतिहासिक रचना छल, प्रस्तावनाकेँ अंतमे राखि कय रहस्य आ रोमांचकेँ बनाओल राखल गेल । पुरोहितक प्रस्तावनाक नाम विनियोग छल आ एकरासँ पहिने दूर्वाक्षत मंत्र राखल गेल जे भारतक आ विश्वक प्रथम देशभक्ति गीत अछि। मिथिलामे एकरा आशीर्वादक मंत्रक रूपमे प्रयोग कएल जाइत अछि जकर पक्ष-विपक्षमे विस्तृत चरचा बादमे होएत।
स्त्रीधनक प्रस्तावनाक नाम लेखक पृष्ठभूमि रखने छथि जे उपन्यासक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि प्रदान करबाक कारण सर्वथा समीचीन अछि।
मायानन्दक इतिहास-बोधक समीक्षा हम श्रुति, परम्परा, तर्क आ भाषा-विज्ञानक आधार पर कएने छी। पाश्चात्य विद्वान सभक उच्छिष्ट भोज सँ निर्मित भारतीय इतिहास-लेखन सँ बचि कए इतिहासक समीक्षा भेल अछि आ मध्य एशिया आ यूरोपक कनियो प्रभाव समीक्षा पर नहि पड़ए से प्रयास कएल गेल अछि।
१. प्रथमं शैल पुत्री च- कवच रूपी प्रस्तावनाक बाद ई पुस्तक १. अग्ना, २.अग्न-शैला, ३. शैला- कराली, ४. कराली- महेष, ५. महेष- पारवती, ६. गणेष, ७. हरकिसन, ८. किसन, ९. हरप्पा : मोअन गाँव, १०. गणेष का श्रीगणेश, ११. किश्न, १२. महाजन, १३. मंडल, १४. किश्न मंडल, १५. मंडल : मंडली, १६. पतन: पुरंदर आ १७. उपसंहार : पलायन खंडमे विभक्त अछि।
१. अग्ना- २००० ई. पू. सँ आरम्भ होइत अछि ई उपन्यास। खोहमे रहएबला मनुष्यक विवरण शुरू होइत अछि। बा एकटा दलक सर्वाधिक बलिष्ठ मनुष्य अछि। पूर्वज बा सेहो बलिष्ठ छल। एतेक रास बच्चा सभक बा। एकटा छोट आ एकटा पैघ पाथरक आविष्कार कएने छलाह पूर्वज बा। अम् दलाग्राकेँ कहल जाइत छल। बा भयंकर गंधवला पशुक नाम सेहो छल। हाथक महत्व बढ़ल आ बढ़ल वृक्षसँ दूरी। सर्पकेँ मारि कए खाएल नहि जाइत अछि, से गप पूर्वजसँ ज्ञात छल। प्राचीन देव वृक्ष, दोसर नाग देव आ तेसर नदी देव छलाह। अम्बासँ बा संतान उत्पन्न करैत आएल छलाह। नव कुठार आ नव काताक आविष्कार भेल। अः आः अग अग्ग केर देखि कए वन्य पशुकेँ भागैत देखि एकर जानकारी भेल। मानुषी हुनकर संख्या वृद्धि करैत छलि। प्रथम मानुषीक नाम पड़ल अग्ना। ओकर मानुष-मित्र छलाह अग्ग। अग्ना दलाग्रा बनि गेलीह आ हुनकर नेतृत्वमे दल उत्तर दिशि बढ़ल। फेर लेखक लिखैत छथि जे पृथ्वीक उत्पत्ति लगभग २०० करोड़ वर्ष पूर्व भेल जे सर्वथा समीचीन अछि। कर्मकाण्डमे एक स्थान पर वर्णन अछि- “ब्राह्मणे द्वितीये परार्धे श्री स्वेतवाराह कल्पे वैवस्वत मन्वंतरे अष्ठाविंशतितमे कलियुगे प्रथम चरणे” आ एहि आधार पर गणना कएला उत्तर १,९७,२९,४९,०३२ वर्ष पृथ्वीक आयु अबैत अछि। रेडियोएक्टिव विधि द्वारा सेहो ईएह उत्तर अबैत अछि। यूरोपमे सत्रहम शताब्दी धरि पृथ्वीक आयु ४००० वर्ष मानल जाइत रहल। ईरानक विद्वान १२०० वर्ष पहिने पृथ्वीक उत्पत्ति मानलन्हि। ई दुनू दृष्टिकोण वैज्ञानिक दृष्टिकोणसँ देखलापर हास्यास्पद लगैत अछि।
अग्ना-शैलासँ शुरू होइत अछि दोसर भाग। १०००० ई.पू.। भाषाक आरंभक प्रारंभ मायानन्द मिश्र एहिमे प्रकट कएने छथि। एहिमे बड्ड नीक जेकाँ, संकेत भाषासँ ध्वनिक संबंध परिलक्षित कएल गेल अछि। चलंत सँ स्थिर जीवनक शुरुआत सेहो देखायल गेल अछि। तकर बाद शैला कराली अध्यायक प्रारंभ होइत अछि, ७५०० वर्ष पूर्वसँ। गौ पालनक चर्चा होइत अछि, गायक संख्यामे पर्याप्त वृद्धि भेल छल। सभ रहथि चरबाह, चर्मस्त्र्धारी। आ कटिमे पाथरक हथियार। भेड़, बकरी आ सुग्गर छल, किछु आन पोसिया जंतु जात सेहो रहए। घासक रस्सी, त्रिशूल आ नागदेवक चर्चा होइत अछि। बाक नाम आब भऽ जाइत अछि, ओजा। दलाग्राक नाम पड़ैत अछि शैला कराली। पशुक संख्या बढ़ल तँ पशुक चोरि सेहो शुरू भऽ गेल।पीपरक गाछक नीचाँ बैठकीक प्रारम्भ भेल। करालीक नाम अंबा पड़ल।
कराली-महेष अध्यायमे ५००० ई.पू. मे कृषिक प्रारम्भ देखाओल गेल अछि। महेष बीया बागु कए रहल छथि। जवकेँ पका कऽ खयबाक चर्चा होइत अछि। आब धारक नाम सेहो राखल जाए लागल। महेष कुल द्वारा पोस केर माँस खेनाइ तँ एकदम निषिद्ध भऽ गेल।ओजा लिंग स्थानमे बैसल रहैत छलाह।
तकर बाद महेष-पारवती अध्याय शुरु होइत अछि ४ सँ ५ हजार वर्ष पूर्व। धानक फसिलक प्रारंभ भेल। पारवती जहिया अएलीह तहिया ओतुक्का प्रथाक अनुसार लाल माटि माथमे लगा देल गेल। पुत्रक नाम गणेष पड़ल। एहिसँ पहिने संतानक परिचय नहि देल जाइत छल।
गणेष- ई अध्याय ४००० वर्ष पूर्वसँ शुरू होइत अछि। स्त्री-पुरुष संबंध आ पितृ कुलक आरंभक चर्चा शुरू भेल। नून अनबाक आ खेबाक प्रारंभ भेल। नून अनबासँ कुलक नाम नोनी पड़ल। जव आ गहूमक खेतीक प्रारंभ आ दूध दुहबाक आरंभ देखाओल गेल अछि। हाथीक पालनक प्रारंभ आ अदला-बदलीसँ विनिमयक प्रारंभ सेहो शुरू भेल। शिश्न देव पर जल आ पात चढ़ेबाक प्रारंभ सेहो भेल। यवकेँ कूटब आ बुकनी करबाक प्रारंभ भेल। गहूमकेँ चूरब आ पानिमे भिजा कए आगिमे पकाएब प्रारंभ भेल। पक्षिपालन करएबला एकटा भिन्न दल छल। मृतक-संस्कार आ मृत्यु पर कनबाक प्रारंभ सेहो भेल। लिपिक प्रारंभ सेहो भेल।
हर- एहि अध्यायक प्रारंभ ३५०० ई.पू. देखायल गेल अछि। नूनक व्यापार आ सुगढ़ नावक निर्माण प्रारंभ भेल। पइलीक कल्पना नपबाक हेतु भेल। हर आ बड़दक सम्मिलन प्रारंभ भेल। इनार खुनबाक प्रारंभ आ जनक लंबवत केर अतिरिक्त चौड़ाइमे बसबाक प्रारंभ सेहो भेल। घर बनएबाक प्रारंभ सेहो भेल।कारी, गोर आ ताम्रवर्णी कायाक बेरा-बेरी आगमन होइत रहल।
हरकिसन अध्यायक प्रारम्भ ३४०० वर्ष पूर्व होइत अछि। कृषि विकासक संग स्थायी निवासक प्रवृत्ति बढ़य लागल। तकरा बाद परिवारक रूप स्पष्ट होमय लागल। कृषि-विकाससँ वाणिज्य विस्तारक आवश्यकता बढ़ल। ऊनक वस्त्र, चक्की, भीतक घर आ इनारक घेराबा बनए लागल।
किसन अध्यायक प्रारम्भ ३३०० ई.पूर्व भेल। श्रम-बेचबाक प्रारम्भ भेल। पटौनीक प्रारम्भक संग कृषि-विकास गति पकड़लक। भूगोलक जानकारी भेलासँ वाणिज्य बढ़ल। अलंकारक प्रवृत्ति बढ़ल।
हड़प्पा: मोहनगाँव अध्याय ३२०० वर्ष पूर्व देखाओल गेल अछि।श्रम-बेचबाक हेतु काठक टोलक उदाहरण अबैत अछि। अलंकार प्रवृत्ति बढ़ल। गोलीक मालाक संग कुम्हारक चाक सेहो सम्मुख आयल। समाजमे वर्ग विभाजनक प्रारम्भ भेल।
गणेषक श्रीगणेष अध्याय ३१०० ई. पूर्व प्रारम्भ भेल। दक्षिणांचल लोकक आगमनक बाद हड़प्पा हुनका लोकनि द्वारा बनेबाक चर्च लेखक करैत छथि। मोहनजोदड़ो, लोथल आ चान्हूदोड़ोक विकास व्यापारिक केन्द्रक रूपमे भेल। लिपि, कटही गाड़ी आ मूर्त्तिकलाक आविष्कार भेल आ वस्तु विनिमयक हेतु हाट लागए लागल। मेसोपोटामियाक जलप्लावन आ सुमेरी आ असुरक आगमनक चर्चा लेखक करैत छथि।
किश्न अध्यायक प्रारम्भ ३००० ई.पू. सँ भेल। विदेश व्यापारक आरम्भ भेल। तामक आविष्कार भेल। कृषि दासत्वक सेहो प्रारम्भ भेल। बाढ़िसँ सुरक्षाक हेतु ऊँच डीह बनाओल जाए लागल।
महाजन अध्याय २८०० ई. पू. प्रारम्भ होइत अछि। नगरक प्रारम्भ वाणिज्यक हेतु भेल। नहरि पटौनीक हेतु बनाओल जाए लागल। डंडी तराजूक आविष्कार आवश्यकता स्वरूप भेल। प्रकाश-व्यवस्थाक ब्योँत लागल।
मंडल अध्यायमे चर्च २६०० ई.पू.क छै। संस्था निर्माण, विवाह व्यवस्था आ दूरगर यात्राक हेतु पाल बला नावक निर्माण प्रारम्भ भेल।
किश्न मंडल अध्याय २४०० ई.पू. केर कालखण्डसँ आरम्भ कएल गेल अछि। एहिमे वर्षाक अभावक चरचा अछि। आर्यक पूर्व दिशामे बढ़बाक चर्चासँ लोकमे भयक सेहो चर्चा अछि।
मंडल:मंडली अध्याय २२०० ई.पू.सँ प्रारम्भ भेल। आर्यक आगमनक आ वर्षाक अभाव दुनूकेँ देखैत लोथल वैकल्पिक रूपसँ विकसित होमए लागल।
पतन:पुरंदर: एहि अध्यायक कालखण्ड २००० ई.पू.सँ प्रारम्भ भेल अछि। आर्यक राजा द्वारा पुरकेँ तोड़ि महान केंद्र हड़प्पाकेँ ध्वस्त करबाक चर्चासँ मायानन्द जी अपन पहिल किताब ‘प्रथमं शैल पुत्री च’ केर समापन करैत छथि। आर्य हड़प्पाकेँ हरियूपियासँ संबोधित कएल, आर्य बाहरसँ अएलाह प्रभृत्ति किछु सिद्धांतक आधार पर रचित ई उपन्यास ऐतिहासिक उपन्यास होएबाक दावा करैत अछि। आ एहिमे २०,००० ई.पू.सँ १८०० ई.पू. धरिक इतिहासोपाख्यानक चर्चा अछि। मुदा मौलिक ऐतिहासिक विचारधारा आ नवीन शोधक आधार पर एकर बहुतो बात समीचीन बुझना नहि जाइत अछि।
अग्नासँ शुरू भेल ई कथानक बड्ड आशा दिअओने छल। लेखक पहिल अध्यायमे लिखैत छथि जे पृथ्वीक उत्पत्ति लगभग २०० करोड़ वर्ष पूर्व भेल जे सर्वथा समीचीन अछि। कर्मकाण्डमे एक स्थान पर वर्णन अछि- “ब्राह्मणे द्वितीये परार्धे श्री स्वेतवाराह कल्पे वैवस्वत मन्वंतरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथम चरणे” आ एहि आधार पर गणना कएला उत्तर १,९७,२९,४९,०३२ वर्ष पृथ्वीक आयु अबैत अछि। रेडियोएक्टिव विधि द्वारा सेहो ईएह उत्तर अबैत अछि। ई अनुमानित अछि जे यूरेनियमक १.६७ भाग १०,००,००,००० वर्षमे सीसामे बदलि जाइत अछि। विभिन्न प्रकारक पाथर आ चट्टानमे सीसाक मात्रा भिन्न रहैत अछि। एहि प्रकारसँ गणना कएला पर ई ज्ञात होइछ जे रेडियोएक्टिव पदार्थ १,५०,००,००,००० वर्ष पहिने विद्यमान छल। एहि प्रकारेँ कोनो शैलक आयु २,००,००,००,००० वर्षसँ अधिक नहि भऽ सकैछ। यूरोपमे सत्रहम शताब्दी धरि पृथ्वीक आयु ४००० वर्ष मानल जाइत रहल। ईरानक विद्वान १२०० वर्ष पहिने पृथ्वीक उत्पत्ति मानलन्हि। एहि तरहक पाश्चात्य शोधकेँ लेखक पहिल अध्यायमे तँ नकारि देलन्हि मुदा अंत धरि जाइत-जाइत ओ - आर्य लोकनि हड़प्पाकेँ हरियूपिया कहैत छथि - एहि प्रकारक पाश्चात्य दुराग्रहक प्रभावमे आबि गेलाह। पश्चिमी विद्वानक उच्छिष्ट भोजसँ बचि श्रुति परम्पराक परीक्षा तर्कसँ नहि कए सकलाह। एहि प्रकारे ‘प्रथमं शैल पुत्री च’ निम्न आधार पर अपन इतिहासोपाख्यान साहित्यिक रूपसँ नहि बना पओलक :-
पुरातात्विक, भाषावैज्ञानिक आ साहित्यिक साक्ष्य एहि पक्षमे अछि जे आर्य भारतक मूल निवासी छलाह। आर्य भाषा परिवारक नामकरण मैक्समूलर द्वारा कएल गेल छल। द्रविड़ परिवारक नामकरण पादरी रॉबर्ट काल्डवेल द्वारा कएल गेल छल।आर्यक आक्रमणक सिद्धांत आएल ग्रिफिथक ऋग्वेदक अनुवादमे देल गेल फूटनोटसँ। पहिने तँ ई नामकरण विदेशी विद्वान द्वारा कएल गेल छल ताहि द्वारे ओकर अपन उद्देश्य होएतैक।
सरस्वती नदी, जल-प्रलय, मनु आ महामत्स्यक कथा, गिल्गमेश कथा काव्य, प्राणवंतक देश गिल्गमेशक खोज, सृष्टिकथा आ देवतंत्रक विकास एहि सभटा समाजशास्त्रीय विकासक विश्लेषण आर्य लोकनिक भारतक मूल निवासी होएबाक साक्ष्य प्रस्तुत करैत अछि।
ऋग्वेदमे मातृसत्तात्मक व्यवस्थाक स्मृतिक रूपमे बहुवचन स्त्रीलिंगक प्रयोगक बहुलता अछि।
सघोष आ महाप्राण ऋग्वेदिक आ भारतीय भाषाक ध्वनिक प्रतिरूप, नहि तँ ईरानी आ नहिये यूरोपीय भाषा सभमे भेटैत अछि। सरस्वती आ सिन्धु धारक बीचक सभ्यता छल आर्यक सभ्यता। सरस्वती धारक तटवर्ती भरत, पुरु आ अन्य गण सभ मिलि कए ऋगवेदक रचना कएलन्हि। सरस्वतीमे जल-प्रलयक बाद ई सभ्यता सारस्वत प्रदेश सँ हटि कए कुरु-पांचाल आ ब्रह्मर्षि प्रदेश-मध्यदेश- पहुँचि गेल। इतिहासमे भरत लोकनिक महत्व समाप्त भऽ गेल। एहि जल प्रलयक बाद आर्यजन लोकनिक वंशज मोहनजोदड़ो आ हड़प्पा नगरक निर्माण कएने होएताह सेहो सम्भव। हड़प्पा सभ्यताक ८०० मे सँ ५३० सँ ऊपर स्थान एहि लुप्त सरस्वती धारक तट पर अवस्थित छल। सिन्धुक धार पर एहि स्थल सभक बड्ड कम निर्भरता छल आ जखन सरस्वतीमे पानिक प्रवाह घटल तँ एहि सभ केन्द्रक ह्रास प्रारम्भ भऽ गेल।
पहिने सरस्वतीमे जल-प्रलयसँ आर्यक पलायन भेल (ऋगवेद आ यजुर्वेदक रचनाक बाद) आ फेर सरस्वतीमे पानिक कमी भेलासँ दोसर बेर आर्यक पैघ पलायन भेल (अथर्ववेदक रचनाक पहिने)। अरा-युक्त रथक वर्णन वेदमे भेटैत अछि। नहि तँ ई पश्चिम एशियामे छल आ नहिये यूरोपमे। भारतीय देवनाम, शिल्प, कथा, अश्वविद्या, संगीत, भाषिक तत्व आ चिंतनक संग ई उद्घाटित होमए लागल पश्चिम एशिया, मिश्र आ यूनानमे। दोसर सहस्राब्दी ई.पूर्व अरायुक्त्त रथ, भारतीय देवनाम, भारतक धार, ऋगवेदिक तत्वचिंतन, अश्वविद्या, शिल्प-तकनीकी आ पुरातन् कथा भारतसँ पच्छिम एशिया, क्रीट-यूनान दिशि जाए लागल। कालक्रमसँ मिश्र, सुमेर-बेबीलोन, आदि सभ्यता आ मित्तनी आ हित्ती सभ्यतासँ बहुत पहिनहि ऋगवेदक अधिकांश मंडलक रचना भऽ गेल छल।

मायानन्दजीक एहि सीरीजक दोसर रचना मंत्रपुत्र अछि। एहिमे ऋगवैदिक आधार पर जीवन-दर्शनकेँ राखल गेल अछि।
ऋगवेद १० मंडलमे (आ आठ अष्टकमे सेहो) विभक्त्त अछि। मायानन्द मिश्रजी मंडलक आधार पर मंत्रपुत्रक विभाजन सेहो १० मण्डलमे कएने छथि। एहि पुस्तकक भूमिकाक नाम अछि ऋचालोक आ ई पुस्तकक अंतमे १०म मण्डलक बाद देल गेल अछि।
प्रथम मण्डलमे काक्षसेनी पुत्री ऋजिश्वाक चर्च अछि संगहि ऋतुर्वित पुत्री शाश्वतीक सेहो। जन सभा आ जन-समिति द्वारा राजाकेँ च्युत करबाक/ निर्वासन देबाक आ दोसर राजाक निर्वाचन करबाक चर्चा सेहो अछि। नेत्रक नील रंग रहबाक बदला श्यामल भऽ जएबाक चर्चा आ एकर कारण खास तरहक विवाहक होयबाक चर्चा सेहो भेल अछि।वितस्ता तटसँ कृष्ण सभक निरन्तर उपद्रवक चर्चा सेहो अछि। सुवास्तु तटसँ रक्त्त मिश्रणक प्रक्रियाक वर्णन अछि। गोमेधकेँ वर्जित कएल जाय, ई विचार विमर्श कएल जाए लागल। दासक चर्चा सेहो अछि। हरियूपिया पतन आ ओकर विभिन्न नगर सभक उजड़ि जएबाक चर्चा अछि आ पश्चात्, बल्बूथ द्वारा अनार्य सभक ध्वस्त वाणिज्य व्यवस्थाकेँ संगठित करबाक चर्चा अछि।
द्वितीय मण्डलमे राजाकें समिति द्वारा एहि गपक लेल पदच्युत कएल जएबाक चर्चा अछि, कि धेनुक चोरिक बादो गव्य-युद्ध ओ नहि कएलन्हि। अभिषेकक सङ्ग राजा सेहो प्रायः निश्चित होमए लगलाह आ कौलिक परम्परा चलि गेल। पहिने समितिक निर्णयक बादे क्यो समर्थन-याचनामे जाइत छलाह, राजदण्ड सम्हारैत छलाह। धेनुक हरण कएने छल अनास दस्यु सभ। सुवास्तु, क्रुमु, वितस्ता आ अक्खनीक तट पर श्रुति अभ्यास आ युद्ध-कार्य संगहि चलैत छल, एके संग ब्राह्मण, क्षत्रिय आ वैश्य कर्म करैत छथि। मुदा सरस्वतीक तट पर बात किछु दोसरे भऽ गेल, ऋषिग्राम फराक होमय लागल। सभटा अनास दस्यु दास बनि गेल आ दासीसँ आर्यगणक संतान उत्पन्न होमए लगलन्हि। दासीपुत्र लोकनिकेँ तँ गाममे घर बनेबाक अनुमति छलन्हि मुदा अनास दस्युकेँ ओ अनुमति नहि छलन्हि। एहि गपक चर्चा अछि, जे आर्य चर्म वस्त्र पहिरैत छलाह आ अनास दस्यु लोकनिक संपर्कसँ सूतक वस्त्र आ लवणक प्रयोग सिखलन्हि। एहि दुनू चीजक आपूर्त्ति एखनो अनास लोकनिक हाथमे छलन्हि। अनार्य लोकनिक संपर्कसँ अपन शब्द कोश बिसरबाक आ तकर संकलनक आवश्यकताक पूर्त्तिक हेतु निघण्टुक संकलनक चर्चा सेहो अछि। गंधर्व विवाहक सेहो चर्चा अछि।
तृतीय मण्डल
अग्निष्टोम यज्ञक चर्चा अछि। छागर आ महीसक बलि केर चर्च अछि।
माँस-भात महर्षि लोकनिकेँ प्रिय लगलन्हि, तकर चर्चा अछि मुदा भातक बदला गहूमक सोहारीक प्रचलन एखनो बेशी होएबाक चर्चा अछि।
चतुर्थ मण्डल
राजाक अभिषेक यज्ञक चर्चा आ ओहिमे अरिष्टनेमिक ब्रह्मा बनबाक चर्चा अछि। ग्रामणी, रथकार, कम्मरि, सूत, सेनानी सेहो यज्ञमे सम्मिलित छलाह।
“अति प्राचीन कालमे सृष्टि जलमय छल”! एकर चर्चा मायानन्द मिश्रजी नहि जानि ऋगवेदिक युगमे कोना कए देलन्हि।
पञ्चम मण्डल
अश्वारोहण प्रतियोगिताक चर्चा अछि। अनास दास-रंजक नाट्यवृत्तिक चर्चा सेहो अछि। राजा द्वारा एकर अभिषेक कार्यक्रममे स्वीकृति आ एकर भेल विरोधक सेहो चर्चा अछि। दासकेँ स्वतंत्र कृषि अधिकार आ एकरा हेतु विदथक अनुमति राजा द्वारा लेल जाए आकि नहि तकर चर्चा अछि।
षष्ठ मण्डल
महावैराजी यज्ञक चर्चा अछि। समस्त दस्यु-ग्रामक दास बनि जएबाक सेहो चर्चा अछि आ ओ सभ पशुपालन आ पणि कार्य कऽ सकैत छथि। नग्नजितक प्रसंग लए मंत्र गायन केनिहार ब्राह्मण, गविष्ठि युद्ध कएनिहार क्षत्रिय आ एकर अतिरिक्त्त जे कृषि विकासमे बेशी ध्यान दैत छलाह से विश- सामान्य जन छलाह मुदा एहिमे मायानन्द जी वैश्य शब्द सेहो जोड़ि देने छथि।
सप्तम मण्डल
बर्बर उजरा आर्यक आक्रमणक चर्चा आब जा कए भेल अछि। प्रायः विदेशी विशेषज्ञक एक भागक संग मायानन्द जी सेहो पैशाची आक्रमणकेँ बादमे जा कए बूझि सकलाह आ एकरा सेहो आर्यक दोसर भाग बना देलन्हि। आर्य हरियूपियाकेँ डाहि कए नष्ट कए देने छलाह एकर फेर चर्च आबि गेल अछि। मोहनजोदड़ो आतंकसँ उजड़ि गेल फेर भूकम्पो आयल ताहूसँ नगर ध्वस्त भेल। आब मायानन्दजी ओझराएल बुझाइत छथि। वर्षा कम होएबाक सेहो चर्चा अछि।
अष्टम् मण्डल
ऋषिग्रामक चर्चा अछि। कुलमे दास आ दासी होएबाक संकेत अछि। वृषभ पालनक सेहो संकेत अछि। मंत्र-पुत्रक ग्रामांचल चलि जएबाक आ विशः-वैश्य बनि जएबाक सेहो चर्चा अछि। मुदा आगाँ मायानन्दजी ओझराइत जाइत छथि। कश्यप सागर तटसँ प्रस्थान-पूर्व द्यौस आ त्वराष्ट्री केर गौण देव भऽ जएबाक चर्चा अछि। ब्राह्मण आ क्षत्रियक विभाजन नहि होएबाक चर्च अछि आ क्यो कोनो कर्म करबाक हेतु स्वतंत्र छल। देवासुर संग्राम आ हेलमन्द तटक युद्ध आ पशुपालनक चर्चा अछि। पश्चात ब्रह्मण आ क्षत्रियक कर्मक फराक होएब प्रारम्भ भए गेल। पश्चात् मंत्र-द्रष्टा ऋषि द्वारा मंत्रमे देवक आ अपन नाम राखब प्रारम्भ भेल- एकर चर्चा अछि।श्रुति अभ्यासक प्रारम्भ होएबाक चर्चा अछि कारण मंत्रक संख्या बढ़ि गेल छल।
नवम् मण्डल
वस्तु विनमयक हेतु हाट व्यवस्थाक प्रारम्भ भेल। हाटमे मृत्तिका प्रभागमे दास-शिल्पी पात्रक उपस्थिति आ वस्त्र प्रभागक चर्चा अछि। मृत्तिका, हस्ति-दन्त, ताम्र सीपी आदिक बनल वस्तुजातक चर्चा अछि। शिशु-रंजनक वस्तुजात - जेना हस्ति, वृषभ आदिक मूर्त्तिक, लवणक, अन्नक, काष्ठक आ कम्बलक बिक्रीक चर्चा अछि।
दशम् मण्डल
श्वेत-जनक आगमनक -बर्बर श्वेत आर्य- सूचना नागजनकेँ भेटबाक चर्चा अछि। नाग जन द्वारा अपन दलपतिकेँ राजा कहल जाएब, नागक पूर्व-कालमे ससरि कए यमुना तट दिशि आएब आ ओतुक्का लोककेँ ठेल कए पाछाँ कए देबाक सेहो चर्चा अछि।कृष्ण जनक काष्ठ दुर्ग आ नागक संग हुनका लोकनिकेँ सेहो अनास कहल गेल अछि। मुदा ओ लोकनि दीर्घकाय छलाह आ नागजन कनेक छोट। एहि मण्डलमे दासक संग शूद्रक आ गंगा तटक सेहो चर्चा आबि गेल अछि। आर्य, दास आ शूद्रक बीचमे सहयोगक संकेत अछि।
अंतमे ऋचालोक नामसँ भूमिका लिखल गेल अछि। देवासुर संग्रामक बाद इन्द्र असुर उपाधि त्यागलन्हि, हित्ती मित्तानी चलल आ आर्य पूर्व दिशा दिशि बढ़ल- एहि सभ तथ्यक आधार पर लिखल ई मंत्रपुत्र ऐतिहासिकताक सभटा मानदण्ड नहि अपना सकल।
मायानन्द मिश्रजी साहित्यकारक दृष्टिकोण रखितथि आ पाश्चात्य इतिहासकारक एक भाग द्वारा पसारल गॉसिपसँ बचितथि तँ आर्य आक्रमणक सिद्धांतकेँ नकारि सकितथि। सरस्वतीक धार ऋगवेदक सभ मंडलमे अपन विशाल आ आह्लादकारी स्वरूपक संग विद्यमान अछि। सिन्धु आकि सरस्वती नदी घाटीक सभ्यता तखन खतम आकि ह्रासक स्थितिमे आएल जखन सरस्वती सुखा गेलीह। अथर्ववेदमे सेहो सरस्वती जलमय छथि। ऋगवेदमे जल-प्रलयक कोनो चर्च नहि अछि आ अथर्ववेदमे ताहि दिशि संकेत अछि। भरतवासी जखन पश्चिम दिशि गेलाह, तखन अपना संग जल-प्रलयक खिस्सा अपना संग लेने गेलाह। जल-प्रलयक बाद भरतवासी सारस्वत प्रदेशसँ पूब दिशि कुरु-पांचालक ब्रह्मर्षि प्रदेश दिशि आबि गेलाह।
सरस्वती रहितथि तँ बात किछु आर होइत मुदा सुखायल सरस्वती एकटा विभाजन रेखा बनि गेलीह, आर्य-आक्रमणकारी सिद्धांतवादी लोकनिकेँ ओहि सुखायल सरस्वतीकेँ लँघनाइ असंभव भऽ गेल।
सिन्धु लिपिक विवेचन सेहो बिना ब्राह्मीक सहायताक संभव नहि भऽ सकल अछि।
ग्रिफिथक ऋगवेदक अनुवादक पादटिप्पणीमे पहिल बेर ई आशंका व्यक्त्त कएल गेल जे आर्य आक्रमणकारी पश्चिमोत्तरसँ आबि कए मूल निवासीक दुर्ग तोड़लन्हि। दुर्गमे रहनिहार बेशी सभ्य रहथि। १९४७ मे ह्वीलर ई सिद्धांत लऽ कए अएलाह जे विभाजित पाकिस्तान सभ्यताक केन्द्र छल आ आर्य आक्रमणकारी विदेशी छलाह। एकटा भारतीय विद्वान रामप्रसाद चंद ताहिसँ पहिने ई कहि देने रहथि जे एहि नगर सभक निवासी ऋगवेदक पणि छलाह। मुदा मार्शल १९३१ ई मे ई नव गप कहने छलाह जे आर्यक भारतमे प्रवेश २००० ई.पूर्व भेल छल आ तावत हड़प्पा आ मोहनजोदड़ोक विनाश भऽ चुकल छल। १९३४ मे गॉर्डन चाइल्ड कहलनि जे आर्य संभवतः आक्रमणकारी भऽ सकैत छथि। १९३८ मे मकॉय मोहनजोदाड़ोक आक्रमणकेँ नकारलन्हि, किछु अस्थिपञ्जड़क आधार पर एकरा सिद्ध कएनाइ संभव नहि। डेल्स १९६४ मे एकटा निबन्ध लिखलन्हि ‘द मिथिकल मसेकर ऑफ मोहंजोदाड़ो’ आ आक्रमणक दंतकथाक उपहास कएलन्हि। तकर बाद ह्वीलर १९६६ मे किछु पाछाँ हटलाह मुदा मकॉयक कबायलीक बदलामे सभटा आक्रमणक जिम्मेदारी बाहरी आर्यगणक माथ पर पटकि देलन्हि। आब ओ कहए लगलाह जे आर्य आक्रमणकेँ सिद्ध नहि कएल जा सकैत अछि मुदा ज्योँ ई संभव नहि अछि तँ असंभव सेहो नहि अछि। स्टुआर्ट पिगॉट १९६२ धरि ह्वीलरक संग ई दुराग्रह करैत रहलाह। पिगॉट आर्यकेँ मितन्नीसँ आएल कहलन्हि। नॉर्मन ब्राउनकेँ सेहो पंजाब प्रदेशक शेष भारतक संग सांस्कृतिक संबंधक संबंधमे शंका रहलन्हि। संस्कृत आ द्रविड़ भाषाक अमेरिकी विशेषज्ञ एमेनो लिखलन्हि जे सिन्धु घाटी कखनो शेष भारतसँ तेना भऽ कए सांस्कृतिक रूपसँ जुड़ल नहि छल। जे आर्य ओतए अएलाह सेहो ईरानी सभ्यतासँ बेशी लग छलाह।
मुदा पॉर्जिटर १९२२ मे साहित्यिक परम्परासँ सिद्ध कएलन्हि जे भारत पर आर्यक आक्रमणक कोनो प्रमाण नहि अछि। ओ सिद्ध कएलन्हि जे भारतसँ आर्य पश्चिम दिशि गेलाह आ तकर साहित्यिक प्रमाण उपलब्ध अछि। लैंगडन सेहो कहलन्हि जे आर्य भारतक प्राचीनतम निवासी छलाह आ आर्यभाषा आ लिपिक प्रयोग करैत छलाह। ब्रिजेट आ रेमण्ड ऑलचिन आ कौलीन रेनफ्रीव आदि विद्वान प्राचीन भारतक इतिहासक प्रति पूर्वाग्रहक विश्लेषण कएने छथि।
मितन्नी शासक मित्र, वरुण, इन्द्र आ नासत्यक उपासक छलाह। हित्ती राज्यमे सेहो वैदिक देवता लोकनिक पूजा होइत छल।आलब्राइट आ लैंबडिन सेहो दू हजार साल पहिने दक्षिण-पश्चिम एशियामे इंडो आर्य भाषा बाजल जाइत छल आ संख्यासूचक शब्द सेहो भारतीय छल, एहि तथ्यकेँ मानलन्हि।
ई लोकनि भारतीय छलाह आ ऋगवेदक रचनाक बाद भारतसँ बाहर गेल छलाह। बहुवचन स्त्रीलिंग रूप, ऋगवेदक देवगणक विशिष्ट रूप अन्यत्र उपलब्ध नहि अछि। इंडो योरोपियन देवतंत्रमे भारतीय देवीगणक विरलता पूर्ववर्त्ती भारतीय मातृसत्तात्मक व्य्वस्थाक बादक योरोपीय परवर्त्ती पितृसत्तात्मक व्यवस्थाक परिचायक अछि।
आब आऊ सुमेरक जल प्रलयपर जेकि ३१०० ई.पू. मे मानल जाइत अछि। भारतीय कलि संवत ३१०२ ई.पू. मानल जाइत अछि। अतः एहि तिथिसँ पूर्व ऋगवेदक पूर्ण रचना भऽ गेल छल।
देवासुर संग्रामक बाद इन्द्र असुर उपाधि त्यागलन्हि आदि गप पोथीक समाप्ति पर ऋचालोकमे मायानन्द जी लिखैत छथि। किछु पाश्चात्य विद्वान सेहो ऋगवेदक दार्शनिक महत्वकेँ कम करबाक लेल ई गप कहैत छथि जे यूनानमे देवतंत्र पूर्ण रूपसँ पल्लवित छल मुदा ऋगवेदिक समाज घुमंतु छल आ देवतंत्र ताहि द्वारे विकसित नहि छल। ओ लोकनि ई सेहो कहैत छथि जे ऋगवेदक रचना अश्व पर घुमंतु जीवन यापित केनहार पश्चिमी आक्रमणकारी कएने छथि। ऋगवेदिक कवि लोकनि आरंभिक सामूहिक संपत्ति आ रक्त्त संबंध आधारित गणसमाज दुनूसँ परिचित छलाह मुदा स्वयं ओहिसँ बाहर आबि गेल छलाह आ व्यक्त्तिगत आ कुटुम्बक संपत्तिक आधार बला व्यवस्था शुरू कए देने छलाह। संपत्ति पुरुष केंद्रित आ परिवार पितृसत्तात्मक छल। मुदा मातृसत्तात्मक व्यवस्थाकेँ ओ बिसरल नहि छलाह कारण ओ आपः मातरः कहि बहुवचनमे जलदेवीक उपासना आ स्मरण करैत छथि, संगहि मरुतगण सदिखन गणक रूपमे स्मरण आ उपासना करैत छथि।
आब जा कए एंगेल्स कहैत छथि जे यूनानमे मातृसत्तासँ पितृसत्ता प्राचीन कालक सभसँ पैघ क्रान्ति छल। ई क्रान्ति ऋगवेदिक कालमे घटित भए गेल छल। श्रमक वैशिष्टीकरणसँ उत्पादनमे गोत्रक भूमिका घटि जाइत अछि आ कुटुम्बक बढ़ि जाइत अछि। गण, गोत्र, कुल आ कुटुम्बक क्रमशः विकास सामूहिक भूसंपत्तिक संगठनसँ होइत अछि। ऋगवेदमे कुम्भकार, कमार (काष्ठकार), लोहार आ धातु शिल्पक चर्च अछि। प्राचीन ईरानमे असुरक प्रतिरूप अहुरक प्रयोग भेल। ओ लोकनि एकर उपासक छलाह मुदा असुर-उपासक भारतीय जनक प्रभाव ईरान धरि सीमित छल, आगाँ एकर प्रसार नहि भेल। भारतमे असुर दुष्ट छथि मुदा ईरानमे देव दुष्ट छथि। असुरक गरिमा सम्पूर्ण ऋगवेदमे अछि। कोनो मण्डल एहन नहि अछि जाहिमे कोनो एक वा आन देवताकेँ असुर नहि कहल गेल होअए। मुदा एहनो असुर छथि जे देवक विरोधमे छथि आ इन्द्रसँ एहन अदेवाः असुराः केर नाशक हेतु आह्वाण कएल गेल अछि।इन्द्रक समान अग्नि सेहो असुरक नाश करैत छथि आ इन्द्र आ बृहस्पति दुनू गोटे स्वयं असुर छथि। असुर देवताक उपाधि छल। ऋगवेदमे देव आ असुरक सदृश असुर एकटा भिन्न वर्ग छल असुर श्वास लैत छलाह मुदा देव नहि। देवसँ असुर बेशी प्राचीन छथि ताहि द्वारे असुर वरुण देव आ मनुष्य दुहूक राजा छथि।
पैशाची त्वग् त्वचा भारतमे कहियो तेहन आह्लादसँ नहि देखल गेल । ओहिनो आर्य आक्रमण पोषक सिद्धान्तकार जे ई तथ्य उदाहरणार्थ देखथि जे दक्षिण भारतीय ब्राह्मण, कश्मीरी ब्राह्मण आ नेपालक ब्राह्मण मे त्वचा नहि वरण रूप सेहो भिन्न अछि, ई सिद्ध करैत अछि जे ई सभ स्थानीय जन छथि आ जाति-व्यवस्थामे ताहिरूपेँ सम्मिलित भेल छथि । कारण पाँच-सए आ हजार बरखमे मानवशास्त्रीय आ वैज्ञानिक रूपेँ ओतेक रूप-रंगक अन्तर सम्भव नहि। जे यूरोपवासी दक्षिण अमेरिका-अफ्रीकामे छथि तिनको, आ जे नीग्रो-रेड इन्डियन अमेरिका-अफ्रीका-यूरोपमे छथि तिनको रूप रंगमे कोनो परिवर्तन पाँच सए बरखमे नहि आएल छन्हि। ई लाख बरखक आवाससँ सम्भव होइत अछि जे गरम प्रदेशक निवासी कारी आ ठंढ प्रदेशक गोर होइत छथि ।
पुरोहित
पुरोहित हिन्दीमे अछि आ श्रृँखलाक तेसर पोथी थीक। दूर्वाक्षत जकरा मायानन्दजी सुविधारूपेँ आशीर्वचन सेहो कहि गेल छथि सँ एकर प्रारम्भ भेल अछि।
पुरोहित केर आरम्भ दूर्वाक्षत आशीर्वचन मंत्रसँ होइत अछि। शुक्ल यजुर्वेदक अध्याय २२ केर मंत्र २२ “ॐ आब्रह्मन…” सँ “नः कल्प्ताम्” धरि अछि। मिथिलामे एहि मंत्रक संग अन्तमे “ॐ मंत्रार्था सिद्धयः संतु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव”। एकर सेहो मंत्रोच्चार होइत अछि आ एहि चारि पादसँ ई मंत्र आशीर्वचनक रूप लए लैत अछि।
यजुर्वेदीय २२/२२ मंत्र सौसेँ भारतमे देशभक्त्ति गीतक रूपमे मंत्रोच्चारित होइत अछि।
दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)

आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥

आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥

मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।

ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।

हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बड़द भार वहन करएमे सक्षम होथि आ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होअए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ मित्रक उदय होए॥

मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।

एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।

अन्वय-

ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म

रा॒ष्ट्रे - देशमे

ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त

आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए

रा॑ज॒न्यः-राजा

शुरे॑ऽ–बिना डर बला

इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण

ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला

म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर

दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)

धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बड़द ना॒शुः-आशुः-त्वरित

सप्तिः॒-घोड़ा

पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री

जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला

र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर

स॒भेयो॒-उत्तम सभामे

युवास्य-युवा जेहन

यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे

वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला

निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे

नः-हमर सभक

प॒र्जन्यों-मेघ

वर्षतु॒-वर्षा होए

फल॑वत्यो-उत्तम फल बला

ओष॑धयः-औषधिः

पच्यन्तां- पाकए

योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा

नः॑-हमरा सभक हेतु

कल्पताम्-समर्थ होए

ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/ संरक्षित करी।

तकर बाद लेखकीय प्रस्तावना जकरा पुरोहितमे विनियोगक नाम देल गेल अछि, केर प्रारम्भ होइत अछि। पुरोहित शतपथ ब्राह्मणकालीन समाज पर आधारित अछि।
विनियोगमे पूर्व आ उत्तर वैदिक युग, महाभारत काल इत्यादिक काल निर्धारण पर चरचा कएल गेल अछि। संन्यास आ मोक्ष धारणाक प्रवेश, सूत्र साहित्य, आरण्यक आ उपनिषद आ ब्राह्मण ग्रंथक रचनाक सेहो चरचा अछि।कर्मणा केर बदलामे जन्मना सिद्धांतक प्रारम्भ आ शूद्र शब्दक उद्भव, नगरक, आहत मुद्राक, उद्योगक सुदृढ़ीकरणक आ लोहाक प्रयोगक सेहो चरचा भेल अछि। फेर मायानन्द जी ई लिखि जाइत छथि जे दाशरज्ञ युद्ध ई.पू. १८०० मे भेल- भरत आ कुशिक-कस्साइटक सम्मिलित समूह सरस्वती तटसँ व्यास नदी पार करैत इलावृत पर्वत प्रदेश होइत ; आ ओ लोकनि कोशल मिथिलाक राजतंत्रक, कुरु-पांचालक संस्कृतिक विकसित होएबासँ पूर्वहि, स्थापना कएने छलाह।
पुरोहित तेरह टा सर्गमे विभक्त्त अछि आ एकर अन्त उपसंहारसँ होइत अछि। प्रथम सर्ग दक्षिण पांचालक कांपिल्य नगरसँ शुरू होइत अछि। अथर्वणपल्लीक पशुशालामे साँझ होइत देरी उठैत धुँआक चरचा अछि। मेधा आ कुशबिन्दुसँ कथा आगू बढ़ैत अछि। ऋषि गालबक आश्रममे ऋगवेदकेँ कंठाग्र कराएल जएबाक आ बादमे जा कए कृषि संबंधी शिक्षा देल जएबाक वर्णन अछि।
दोसर सर्गमे राजा प्रवाहण जैबालिक मूर्ख पुत्र द्वारा ब्राह्मणक अपमानक, प्रथम श्रोत्रिय आ दोसर पुरोहित ब्राह्मणक वर्णन अछि।
तेसर सर्गमे आचार्य चाक्रायणक अपमानक कारण पुरोहित वर्ग द्वारा पौरहित्य कर्म नहि करबाक निर्णयसँ प्रजाजनक दैनिक अग्निहोत्र कार्य आ बिना लग्नक कृषि आ वाणिज्य कार्यमे होअए बला भाङठक वर्णन अछि।
चतुर्थ सर्गमे व्यास कथा आ भारत युद्धक चर्चा अबैत अछि आ एतए मायानन्द जी पाश्चात्य दृष्टिकोणक अनुसरण करैत छथि। जय काव्यकेँ भारत युद्धकथाक रूप दए देल गेल- ई वक्त्तव्य अनायासहि दए रहल छथि मायानन्द मिश्र।
पाँचम सर्गमे वैश्य द्वारा उपनयन संस्कार छोड़बाक चरचा अछि मुदा क्षत्रिय पुत्र आ पुत्री दुनूक उपनयन करैत छलाह। वैश्य कन्या शिक्षासँ दूर जा रहल छलीह आ ब्राह्मण कन्या गुरुकुलक अतिरिक्त पितासँ शिक्षा लए रहल छलीह। ब्राह्मणकेँ पौरहित्यसँ कम समय भेटैत छलन्हि।
छठम सर्गमे ब्राह्मण पुरोहित द्वारा अथर्व वेदकेँ नहि मानबाक चरचा अछि।
सातम सर्गमे अथर्वनपल्लीमे अथर्ववेदीय संस्कारक शिक्षा आ प्रथम श्रेणीक ब्राह्मण द्वारा ओतए नहि जएबाक चरचा अछि।
आठम सर्गमे इद्रोत्सवमे रथदौड़, अश्वारोहण, मल्लयुद्ध, असिचालन, लक्ष्यभेद आ विलक्षण अनुकृतिक चरचा अछि आ व्यासपल्लीक लोक द्वारा अनुकृति करबाक चरचा अछि। व्यासपल्लीमे व्रात्य करुष भारत युद्धक कथा कहि रहल छलाह। भारत युद्धक बहुत पूर्व भरत, त्रित्सु, किवी आ सृंजय मिश्रित जनक आर्यवर्तमे शूद्र नामसँ सुमेरियाक जियसूद्रक स्मृतिमे अपनाकेँ गौरव देबाक हेतु सूद्र कहबाक वर्णन अछि।
नवम सर्गमे तन्तुवाय द्वारा स्त्री निमित्त वस्त्रमे तटीयता देल जएबाक कारण भेल अन्तरक चरचा अछि, पहिने ई अन्तर नहि छल। अथर्वण आ याज्ञिक ब्राह्मणमे भेदक चरचा अछि।
दशम् सर्गमे शिश्नदेवक पूजा अनार्य द्वारा होएबाक आ अथर्वण पुरोहित द्वारा एकर अनभिज्ञताक चरचा अछि। व्यासपल्लीमे अक्षर लिपिक प्रयोग आ आचार्य गालबक श्रुति आश्रममे अंक लिपिक अतिरिक्त्त किछु अन्य देखब वर्जित होएबाक गप कहल गेल अछि।
एगारहम सर्गमे गालब आश्रममे दण्डनीति पर चरचा निषिद्ध होएबाक बादो दक्षिण पांचालक सभासदक आग्रह पर एतद संबंधी चरचा होएबाक गप अछि। राजा शिलाजित द्वारा राजपद प्रधान पुरोहितकेँ देबाक चरचा अछि।
बारहम सर्गमे भारत युद्धक बाद नियोग प्रथाक अमान्य भऽ बन्द भऽ जएबाक बात अछि। शिश्नदेवक शिवदेवसँ एकाकारक चरचा सेहो अछि।
तेरहम सर्गमे क्रैव्यराजक अभिषेक उत्सवक चरचा अछि। दूर्वाक्षत मंत्रमे
“ॐ मंत्रार्था सिद्धयः संतु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव” आ दीर्घायुर्भव केर मेल शुक्ल यजुर्वेदक २२/२२ मंत्रसँ कए दूबि अक्षत लए, विशेष लए ताल गति यति मे गएबाक वर्णन अछि। एकर अनुवाद सेहो मायानन्द जी देने छथि, जे ग्रिफिथक अनुवादसँ प्रेरित अछि:-
समस्त विश्वमे ब्राह्मण विद्याक तेजक वर्चस्व स्थापित करए बला, सर्वत्र, वाण चलएबामे निपुण, निरोगि, महारथी, शूर, यजमान राज्य सभक जन्म होए, सर्वत्र अधिकाधिक दूध दएबाली धेनु होए, शक्तिशाली वृषभ होए, तेजस्वी अश्व होए, रूपवती सध्वी युवती होथि, विजयकामी वीरपुत्र होथि, जखन हम कामना करी पर्जन्य वर्षा देथि, वनस्पतिक विकास होए, औषधि फलवती आ सभ प्राणी योगक्षेमसँ प्रसन्न रहथि।राजन शतंजीवी होथि।
क्रैव्यराजक अभिषेकक लेल ई मंत्र हाथमे अक्षत, अरबा, ब्रीहि आ दूर्वादल लए आ मंत्र समाप्ति पश्चात राजा पर एकरा छीटबाक आ फेर दहीक मटकूरीसँ दही लए महाराजक भाल पर एहिसँ तिलक लगएबाक वर्णन अछि। एहि प्रकरणमे मायानन्द जी लिखैत छथि जे एहि मंत्रक, जकरा मिथिलामे दूर्वाक्षत मंत्र कहल जाइत अछि, रचना याज्ञवल्क्य द्वारा वाजसनेयी संहिताक लेल कएल गेल। एहि मंत्रक उपयोग मिथिलामे उपनयनक अवसर पर बटुकक लेल आ विवाहक अवसर पर वर-वधुककेँ आशीर्वचनक रूपमे प्रयुक्त होअए लागल।
पुरोहितक अन्त होइत अछि उपसंहारसँ। एतय वर्णित अछि, जे काशीक रस्ताक अनार्य ग्रामक आर्यीकरण भेल आ व्रात्यष्टोम यज्ञ भेल। शिश्नदेवाः पर चरचा अछि, शुनःशेप आख्याण आ भारत कथाक कहबाक परम्पराक प्रारम्भ आ मगध द्वारा आर्य धर्मक प्रति वितृष्णाक चर्च सेहो अछि।
मायानन्दजी महाभारतक समस्याक समाधानमे सेहो पाश्चात्य विचारक लोकनिक अनुसरण करैत बुझना जाइत छथि। प्रोफेसर वेबर पहिल बेर एहि सिद्धांतकेँ लए कए आएल छलाह। ओ अपन विचार व्यक्त कएने छलाह जे ८८०० पद्यक जय संहिता छल आ पहिने युद्ध पर्व (१८ पर्व मे चारि पर्व भीष्म, द्रोण, कर्ण आ शल्य पर्व) मात्र छल। ओकर आधार ओ बनेने छलाह एकटा श्लोककेँ-
अष्टौश्लोक सहस्राणि..... अहं वेद्मि शुको वेत्ति सञ्जयो वेत्ति वा न वा
संजय, व्यास आ शुक तीनू गोटे ८८००-८८०० प्रत्येक कए भारतक श्लोक मात्र स्मरण कए सकल छलाह। माने भारत एतेक विशाल छल जे प्रत्येक गोटे सम्पूर्ण स्मरण नहि कए सकल छलाह आ ताहि दृष्टिसँ भारत कहियो २६४०० श्लोकसँ कम नहि छल, जकरा व्यास लिखने छलाह। जय संहिता भारत आ महाभारत दुनूकेँ कहल जाइत छै। युद्ध पर्व (१८ पर्व मे चारि पर्व भीष्म, द्रोण, कर्ण आ शल्य पर्व) तेना ने परस्पर दोसर पर्व सभसँ जुड़ल अछि जे बिना पछिला पर्व पढ़ने अगिलाक कोनो भाँज नहि लगैत छै। इलियडक युद्ध १० साल धरि चलल छल मुदा इलियड मात्र ट्रॉयक घेरा धरि सीमित छल। मुदा महाभारत बहुत पहिने सँ १८ दिनुका युद्धक कारणसँ शुरु होइत अछि। भीष्म पर्व छठम पर्व अछि, द्रोण पर्व सातम, कर्ण पर्व आठम आ शल्य पर्व नवम। तकरा बाद ९ टा पर्व आर अछि।
किएक तँ कैक बैसारीमे महाभारत केर पाठ सुनाओल जाइत छल ताहि द्वारे ई स्वाभाविक अछि जे पुरान पाठ सभ जे भए चुकल छल केर फेरसँ पुनःस्मरण बेर-बेर कएल जाइत छल। ताहिसँ ई अर्थ निकालब जे ई क्षेपक अछि, अनर्गल होएत। तहिना गीता सेहो पाश्चात्य विद्वान लोकनिक लेल क्षेपक अछि कारण ओ लोकनि भारतीय संस्कृति, साहित्य आ कलाक अनुभव विदेशी मानसिकतासँ करबाक कारण गलती करैत छथि। विदेशी विद्वान ई मानबामे कष्ट अनुभव करैत छथि जे महाभारत ओतेक पुरान भेलाक बादो ओतेक वृहत् अछि आ इलियड ओकर सोझाँ किछु नहि अछि। से एक गोट पद्यक वेबर द्वारा कएल गेल मिथ्या व्याख्याक आधार पर जय संहिता केर संकल्पना आएल। मात्र भारत आ महाभारत केर रूपमे एहि महाकाव्यक विकासकेँ बिना कोनो कारणसँ जय संहिता, भारत आ महाभारत रूपी तीन चरणमे प्रस्तुत कएल गेल। महाभारत केर सभसँ छोट रूपमे सेहो २४६०० सँ कम श्लोक नहि छल आ जय संहिता भारत आ महाभारतकेँ सम्मिलित रूपसँ कहल जाइत छल।
स्त्रीधन
ई ग्रन्थ मायानन्द बाबूक इतिहास बोधक अन्तिम कड़ी अछि। प्रागैतिहासिक “प्रथम शैलपुत्री च”, ऋगवेदिक कालीन “मंत्रपुत्र”, उत्तरवैदिककालीन “पुरोहित” केर बाद ई पुस्तक सूत्र-स्मृतिकालीन अछि, ई ग्रंथ हिन्दीमे अछि। आ ई सूत्र-स्मृतिकालीन उपन्यास मिथिला पर आधारित अछि। ई पोथी प्रारम्भ होइत अछि मायानन्दजीक प्रस्तावनासँ जकर नाम एहि खण्डमे “पॄष्ठभूमि” अछि। एतए मायानन्दजी रामायण-महाभारत केर काल गणनाक बाद इतिहासकार लोकनिक एकमात्र साक्ष्य शतपथ ब्राह्मणक चर्च करैत छथि।
मिथिलाक प्राचीनतम नाम विदेह छल, जकर प्रथम वर्णन शतपथ ब्राह्मणमे आएल अछि। सार्थ-गमनक प्रक्रियाक विस्तृत वर्णन एहि ग्रन्थमे अछि, से मायानन्द जी कहैत छथि।
ई ग्रन्थ प्रथम आ द्वितीय दू अध्यायमे अछि आ अन्तमे उपसंहार अछि। प्रथम अध्यायमे प्रथमसँ नवम नौ टा सत्र अछि। द्वितीय अध्यायमे प्रथमसँ अष्टम ई आठ टा सर्ग अछि।

प्रथम अध्याय
प्रथम सत्र
एहिमे सृंजय द्वारा कएल जा रहल धर्म-पश्चात्ताप स्वरूप भिक्षाटनक, पत्नी-त्यागी होएबाक कारण छह मास धरि निरन्तर एकटा महाव्रत केर पालन करबाक चरचा अछि।
“द्वितीय वर” केर सेहो चरचा अछि।
द्वितीय सत्र
राजा बहुलाश्व जनकक ज्येष्ठ पुत्र कराल जनककेँ राजवंशक कौलिक परम्पराक अनुसार सिंहासन भेटलन्हि, तकर वर्णन अछि।
तृतीय सत्र
एतए पुरान आ नवक संघर्ष देखबामे अबैत अछि। वारुणी एक ठाम कहैत छथि जे जखन पूज्य तात हुनकर विधिवत उपनयन करबओलन्हि, ब्रह्मचर्य आश्रममे विधिवत प्राचीन कालक अनुसार श्रुतिक शिक्षा देलन्हि, तँ आब हमहूँ भद्रा कन्या बनि अपन वरपात्रक निर्वाचन स्वयं कए विवाह करए चाहैत छी।
चतुर्थ सत्र
एतए कराल जनकक विरुद्ध विद्रोहक सुगबुगाहटिक चरचा अछि। कृति जनक आ बहुलाश्व जनकक कालमे भेल न्यायपूर्ण आ प्रजाहितकारी कल्याणकारी कार्यक चरचा भेल अछि तँ संगहि सीरध्वज जनकक समयसँ भेल मिथिलाक राज्य-विस्तारक चरचा सेहो अछि। बहुलाश्व मरैत काल अपन पुत्र करालकेँ आचार्य वरेण्य अग्रामात्यखण्ड केर उपेक्षा-अवहेलना नहि करबाक लेल कहने छलखिन्ह मुदा कालान्तरमे वैह कराल जनक अग्रामात्यक उपेक्षा-अवहेलना करए लगलाह। आचार्य वरेण्य-खण्ड मिथिलासँ पलायन कए गेलाह।
पंचम सत्र
प्रणिपात, आशीर्वचन आ कुशल-क्षेमक औपचारिकताक वर्णन अछि आ स्त्रीधनक चरचा सेहो गप-शपक क्रममे आएल अछि। ईहो वर्णन आएल अछि जे वैशाली किछु दिन कौशलक अधीन छल आ भारत-युद्धमे ओ मिथिलाक अधीन छल। वन्य भूमिकेँ कृषि-योग्य बनेबाक उपरान्त पाँच बसन्त धरि कर-मुक्त करबाक परम्पराकेँ राजा कराल जनक द्वारा तोड़ि देबाक चरचा अछि।
षष्ठ सत्र
पांचाल-जन द्वारा अंधक वृष्णिक नायक वासुदेव कृष्णकेँ जय-काव्यक नायक मानल जएबाक चरचा अछि। जय-काव्य आ भारत-काव्यक पश्चिमक उच्छिष्ट भोज मायानन्दजीक मोनसँ नहि हटलन्हि आ जय-काव्यमे मुनि वैशम्पायन व्यास द्वारा बहुत रास श्लोक जोड़ि वृहतकाय भारत काव्य बनाओल जएबाक मिथ्या तथ्यक फेरसँ चरचा अछि। जयकाव्यक लेखक कृष्ण द्वैपायन व्यासकेँ बताओल गेल अछि। आ एकर बेर-बेर चरचा कएल गेल अछि जेना कोनो विशेष तथ्य होअए।
फेर देवत्वक विकासपर सेहो चरचा अछि। सरस्वती धारक अकस्मात् सूखि जएबाक सेहो चरचा अछि।
सरस्वतीक मूर्तिपूजनक प्रारम्भक आ मातृदेवीक सेहो चरचा भेल अछि।
सप्तम् सत्र
सरस्वतीकेँ मातृदेवी बनाकए काल्पनिक सरस्वती प्रतिमा-पूजनक चरचा अछि। मिथिलामे पतिक नाम नहि लेबाक परम्पराक सेहो चरचा भेल अछि।
अष्टम् सत्र
राजाक अत्याचार चरम पर पहुँचि गेल अछि। अपूर्वा द्वारा विवशतापूर्वक गार्हस्थ्य त्याग आ स्त्रीधन सेहो छोड़बाक चरचा भेल अछि।
नवम् सत्र
सएसँ बेशी ग्राम-प्रमुख द्वारा सम्मेलन-उपवेशनक चरचा अछि।
पाँच वसन्त धरि कर-मुक्ति आ ताहिसँ वन्यजन आ शूद्र जनक सम्भावित पलायनक चरचा अछि। सीरध्वज जनकक पश्चात् धेनु-हरण राज्याभिषेकक बाद मात्र एकटा परम्परा रहि गेल, तकर चरचा अछि। मुदा कराल द्वारा अपन सगोत्रीय शोणभद्रक धेनु नहि घुमेबाक चरचा अछि। कराल द्वारा बीचमे प्रधान पुरहितकेँ हटेबाक चरचा अछि। चिकित्साशास्त्रक नवोदित चिकित्सक बटुक कृतार्थकेँ राजकुमारीक चिकित्साक लेल बजाओल जाइत अछि, संगमे राजकुमारीक सखी आचार्य कृतक पुत्री वारुणीकेँ सेहो बजाओल जाइत अछि। ओ अपन अनुज बटुकक संग जाइत छथि आ कराल बलात् अपन कक्ष बन्द कए हुनकासँ गांधर्व-विवाह कए लैत छथि। प्रजा विद्रोह आ राजाक घोड़ा पर चढ़ि कए पलायनक संग प्रथम अध्यायक नवम आ अन्तिम सत्र खतम भए जाइत अछि।
द्वितीय अध्याय
प्रथम सर्ग
सित धारक चरचा अछि। वारुणिकेँ वरुण सार्थवाह सभक संग अंग जनपद चलबाक लेल कहैत छन्हि। आ संगे वरुण ईहो कहैत छथि जे अंग जनपदक आर्यीकरणक कार्य अखनो अपूर्ण अछि।
द्वितीय सर्ग
सार्थक संग धनुर्धर लोकनि चलैत छलाह, अपन श्वानक संग। सार्थक संग सामान्य जन सेहो जाइत छलाह।वरुण आ वारुणी हिनका सभक संग अंग दिशि बिदा भेलाह, एहि जनपदक राजधानी चम्पा कहल गेल अछि आ एकरा गंगाक उत्तरमे स्थित कहल गेल अछि।
तृतीय सर्ग
अंग क्षेत्रमे धानसँ सोझे अरबा नहि बनाओल जएबाक चरचा अछि, ओतए उसीन-सुखा कए ढेकीसँ बनाओल अरबाकेँ चाउर कहल जएबाक आ ब्रीहिकेँ धान कहबाक वर्णन भेल अछि। पूर्वकालक श्रेष्ठी द्विज वैश्य आ अद्विज नवीन वैश्यक चरचा भेल अछि।
चतुर्थ सर्ग
आर्यीकरणक बेर-बेर चरचा पाश्चात्य विद्वानक मायानन्दजी पर प्रभाव देखबैत अछि। आर्य आ द्रविड़ शब्द दुनू , पाश्चात्य लोकनि भारतमे अपन निहित स्वार्थक लेल अनने छलाह। कोशल आ विदेहक प्रसारक, देवत्वक विकासक सम्पूर्ण इतिहास एतए देल गेल अछि। मिथिलाक दही-चूड़ाक सेहो चर्च आएल अछि।
पञ्चम सर्ग
दिनमे एकभुक्त आ रातिमे दुग्धपान मिथिला आ पांचाल दुनू ठाम छल। तथाकथित आर्य आ स्थानीय लोकनिक बीच छोट-मोट जीवनशैलीक अन्तर- आ मायानन्दजी आर्यीकरण कहैत छथि ओकरा पाटब !
षष्ठ सर्ग
अंगक गृह आर्यग्राम जेकाँ सटि कए नञि वरन् हटि-हटि कए होएबाक वर्णन अछि। हुनका सभ द्वारा छोट-छोट वस्त्र आ पशु चर्म पहिरबाक सेहो वर्णन अछि। वन्यजनक बीचमे नरबलि देबाक परम्पराक संकेत आ निष्कासित वन्यजनसँ भाषाक आदान-प्रदान सेहो मायानन्दजी पाश्चात्य प्रभावसँ ग्रहण कए लेने छथि।
विक्रय-थान खोलबाक जाहिसँ भविष्यमे नगरक विकास संभव होएत, तकर चर्च अछि।
सप्तम सर्ग
उसना चाउरक अधिक सुपाच्य होएबाक आ ताहि द्वारे ओकर पथ्य देबाक गप कएल गेल अछि।लौह-सीताक लेल लौहकार, हरक लेल काष्ठकार, बर्तन-पात्रक लेल कुम्भकार इत्यादि शिल्पीक आवश्यकता आ ताहि लेल आवास-भूमि आ भोजनक सुविधा देबाक गप आएल अछि।
अष्टम सर्ग
कृषि उत्पादनक पश्चात् लोक अन्नक बदला सामग्री बदलेन कए सकैत छथि, वृषभ-गाड़ीसँ सामग्रीक संचरण, एक मास धरि चलएबला यज्ञक व्यवस्था भूदेवगण द्वारा कएल जएबाक प्रसंग सेहो आएल अछि। भाषा-शिक्षण क्रममे ब्राह्मणगामक अपभ्रंश बाभनगाम आ वनग्रामक वनगाम भए गेल। भाषा सिखा कए घुरैत काल वारुणीपर तीरसँ आक्रमण भेल आ फेर वारुणिक मृत्यु भए गेल।
उपसंहार
दोसर वसन्त अबैत मिथिलामे गणतंत्रक स्वरूपक स्थापना स्थिर भए गेल। वैशाली आ मिथिलाक बीच परस्पर सम्वाद एक गणतांत्रिक सूत्रमे जुड़बाक लेल होमए लागल। सितग्राम स्थित राजधानीमे पूर्वमे मिथिलाक सीमा-विस्तारक चरचा भेल। राजधानी सितग्राम आ पूर्वी मिथिलाक जितग्रामक बीच एकटा महावन छल। एकरा ब्राह्मणग्राम आ त्रिग्राम द्वारा मिलिकए जड़ाकए हटाओल गेल।

भाषा विज्ञान प्रसंग - ऋगवैदिक ऋचामे प्राकृतक किछु विशेष शब्द, ध्वनि, प्रत्यय आ वाक्य रचना भेटैत अछि। पाणिनी संस्कृतकेँ मानक भाषा आ प्रादेशिक तत्वसँ मुक्त भाषाक रूप देने छलाह। कर्णाटकमे पानिकेँ नीरू आ उत्तर भारतमे जल कहल जाइत अछि। पानिक ई दुनू रूप संस्कृतमे भेटत। प्राकृतिक तत्वसँ मुक्त भाषा बनेबाक लेल पाणिनी कोनो क्षेत्रक अवहेलना नहि कएने छलाह वरण सभ क्षेत्रक शब्दकोष लए उच्चारणक भेदकेँ खतम कएने छलाह। बहुत रास प्राकृत शब्द संस्कृतमे ध्वन्यात्मक संशोधन कए लेल गेल आ ताहिसँ बादमे ई धारणा भेल जे प्राकृतक शब्द सभ तद्भव छल। संस्कृतमे तद्भव ताहि कारणसँ नहि देखबामे अबैत अछि। तहिना अपभ्रंश आ प्राकृत भाषा सौँसे देशमे घुमए बलाक भाषा छल।
भारतमे देवतंत्रक विकास पानि संबंधी धारणासँ जुड़ल अछि। यावत विश्व अव्यक्त अछि तँ अन्धकारमय अछि, अकास अछि, व्यक्त भेलापर ओ जल बनि जाइत अछि। अकास आ जल दुनू भारतीय चिन्तनमे तत्व अछि। मूर्तिपूजनक जे चित्र मायानन्दजी चित्रित करैत छथि ओ सरलीकरण अछि। भाषा-प्रसारक जे विधि ओ स्त्रीधनमे देखबैत छथि सेहो अति सरलीकरण अछि।

श्रवण द्वारा परम्पराक निर्वहण साहित्यमे देखल गेल छल आ से महाभारतमे किछु ठाम बेर-बेर देखबामे अबैत अछि , से ताहि कारण कतेको पर्वकेँ क्षेपक कहल जाएब सम्भव नहि। वेदक प्रतिशाख्यकेँ ओना देखलापर ई ज्ञात होएत जे लिखबाक परम्पराक अछैत ई सम्भव नहि छल मुदा महाभारत अबैत-अबैत कट्टरता बढ़ल। महाभारतमे वर्णन अछि:
वेदविक्रयिणश्चैव वेदानांचैवदूषकः।
वेदानांलेखकश्चैव तेवै निरयगामिनः॥
(वेदक विक्रेता, गलत-व्याख्या कएनिहार आ लेखक, सभ नरकक पथपर गेनिहार छथि।)
कराल प्रसंग : कराल जनकक कुकृत्यक वर्णन अर्थशास्त्रमे एना आएल अछि:
(१.६ विनयाधिकारिकेप्रथमाधिकरणे षडोऽध्यायःइन्द्रियजये अरिषड्वर्गत्याग) : तद्विरुद्धवृत्तिरवश्येन्द्रियश्चातुरन्तोऽपिराजा सद्यो विनश्यति- यथा
दाण्डक्यो नाम भोजः कामाद् ब्राह्मणकन्यायमभिमन्यमानः सबन्धराष्ट्रोविननाश करालश्च वैदेहः,...।
भिक्षु प्रभामतीक जयमंगल भाष्य एहिमे जोड़ैत अछि जे कराल योगेश्वर तीर्थमे भीड़ दिशि देखैत काल एकटा सुन्दर ब्राह्मण-स्त्रीकेँ देखलक आ ओकरा अपन राज्य जबर्दस्ती लए गेल। ओ ब्राह्मण ओकर राजधानी गेल आ कानि खीजि कए कहलक जे ई धरती किएक नहि फटैत अछि जतए एहन कुकर्मी राजा रहैत अछि। धरती फाटल आ ओहिमे कराल परिवार समेत धसि कए मरि गेल।
एकटा ब्राह्मण स्त्रीक अपहरण करालक पतनक कारण छल ई चरचा अश्वघोषक बुद्धचरितमे सेहो आएल अछि जेना कौटिल्यक अर्थशास्त्रमे आएल अछि। मुदा दीपवंश कराल जनकक बाद ओकर पुत्र आ पौत्रक राजा होएबाक वर्णन करैत अछि। ब्राह्मण ग्रंथ सभ विदेहकेँ राजशाही आ बौद्ध ग्रन्थ सभ गणतंत्र (राजा समिति द्वारा चुनल) कहैत अछि आ मत विभिन्नताक से कारण।

एहि प्रकारें मायानन्द मिश्रजीक ऐतिहासिक यात्रा बहुत रास एहन तथ्य अनलक जे कोनो तरहेँ तर्कसँ पुष्ट नहि भए सकल।

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