गजल- आशीष अनचिन्हार - मिथिला दैनिक

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गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

गजल- आशीष अनचिन्हार

गजल
मछगिद्ध जँ माछ छोड़ि दिअए त डर मानबाक चाही
लोक जँ नेता भए जाए त डर मानबाक चाही


रंडी खाली देहे टा बेचैत छैक अभिमान नहि
मनुख अस्वभिमानी हुअए त डर मानबाक चाही



अछि विदित शेर नहि खाएत घास भुखलों उत्तर
वीर अहिंसक बनए त डर मानबाक चाही



माएक रक्षा करैत जे मरथि सएह विजेता
माए बेचि जँ रण जितए त डर मानबाक चाही


सम्मानक रक्षा करब उद्येश्य अछि गजल केर
जँ उद्येश्य बिझाए त डर मानबाक चाही