जागि गेल छी- महेन्द्र नारायण राम

नम्हर-नम्हर
मोटगर-मोटगर
सादा कागत पर
रे अन्यायी,
हमारा अऊँठा निशान लगा गेल छी,
तकरे प्रभावे
आइ धरि
देख! कतेक हमारा सुखा गेल छी।
रक्त, हाड़-माँसु समर्पित क' तोरा
शोषण उत्पीड़नक बीच
भावनाक चिक्कस बनि पीसा गेल छी।
जरि गेल अछि आब मुदा
अन्हार घरक दीया
पढ़ब, लिखब, गुनब
मोन मे
गड़ि गेल अछि
आब हमारा खुश भ' रहल छी
आखर-आखर पढ़ि रहल छी
कुशल भ' रहल छी
साक्षर भ' रहल छी
हमारा जागि गेल छी।
आब क्यो अऊँठा निशान नहीं लगबाओत
रक्त-हाड़-माँसु केँ नहीं चिबाओत
सुन्दर हृष्ट-पुष्ट शरीर केँ नहीं तड़पाओत॥

5 टिप्पणियाँ

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