कबइ-इच्छा -कथा- अनलकांत - मिथिला दैनिक

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गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009

कबइ-इच्छा -कथा- अनलकांत

अगस्त, १९९२
श्रीकान्तक दोकान मे सभ साँझ छोट-मोट महफिल जमैत छलै । जाहिमे ओहि बीच लगातार तीन दिन धरि आरएल उर्फ रतन लाल सेहो, सँझुका पहर बुलै लेल बहराय तँ, शामिल भ’ जाइ छल ।
साल-दू साल पर आरएल जहिया कहिया कहियो एम्हर अबै छल, एहि महफिलक शोभा बड़ेबाक अवसरि ओकरा प्राय: भेटि जाइ छलै । एहि बेर कने बेसी आ नियमित छल । से एहू लेल जे एक तँ बेसी दिन पर आयल छल, दोसर सासुरक स्थिति सेहो बदलि गेल छलै । दुनू सारक बीच बाँट-बखरा भ’ गेल छलै । करजाईन बजारक पुरना दोकान जाहि मे रेडियो-टीवी मरम्मतिक काज होइ छलै जेठका श्रीकान्तक फाँट मे आयल छलै । छोटका मदन अपन नव आ भव्य इलेक्ट्रॉनिक्सक दोकान नवे जिला बनल शहर सुपौल मे शुरू कयलाक बाद सपरिवार ओतहि रह लागल छल । करजाईन बजारक सटले गाम गोसपुर सँ मदनक सम्बन्ध टूटि जकाँ गेल छलै। साल मे दू-एक बेर आम-कटहर आकि उपजाक हिस्सा लेव’ सन काज सँ अबैत रहै । श्रीकान्तक परिवार गामे छलै । ओ नित्य भोरे घर सँ दोकान अबैत आ खूब राति केँ घर घुरैत ।
इलाहाबाद मे बैसि गेल आरएल सन खानदानी दरभंगिया बिना प्रयोजने एते दूर सासुर जाइवला कहाँ ! ई तँ ओकर सासुक अचानक गंभीर रूपेँ असक पड़ब आ कनियाँ विभाक फालतू जिदक कारणेँ आब’ पड़ल रहै । ओना विभाक जिदक मोकाबिला क’ सकबा जोग बहाना तँ बना सकैत छल ओ, मुदा एक टा गलती उत्साहवश अनजाने मे ओकरे सँ भ्’ गेल छलै । भेलै ई जे एक दिन ऑफिस विदा होइ काल वोभा एक किलो एअसगुल्लाक फरमाइश क’ देलकै । तत्काल तँ ओ कोनो ढंगक उतारा धरि नइँ द’ सकलै, मुदा साँझ मे घुरल तँ दू किलो रसगुल्लाक संग !...
महँगी आ तंगी सँ गड़बड़ गणितक चलते जे आर्थिक किच-किच आ कृपणता स्थाइ भाव बनि गेल छलै ओहि मे आरएलक ई अप्रत्यशित उदारता दुर्घटना साबित भ’ गेलै । बहस आ आरोप-प्रत्यारोप मर्यादाक सभ सीमा नाँघि गेलै आ आधा राति धरि कानब-खीजब, रुसब-फुलब संग चलैत वाक्-युद्धक कारणेँ रातुक भोजन सेहो स्थगित भ’ गेलै । ई सभ सहि क’ भुखलो सुति सकै छल ओ, मुदा सुतैत काल विभा तेना ने नाक सुड़कैत हिचकब शुरू कयलकै जे ओकरा आत्म-समर्पण करहि टा पड़लै । एहने क्षण मे कयल करारक कारणेँ सासुक जिज्ञासा मे सासुएअक ई यात्रा आरएलक कपार बथायल छलै । देह-धर्म लेल निरोध-सम्बन्धी खर्च पर जे बीस बेर मनन करैत हो, तकरा लेल एहि यात्राक खर्च !...
जे-से, सासुर अबै आकि एहि सँ पहिनेक घटना सभ आरएल लेल रहल-खेहल छलै । सार सभक बीच भेल बाँट-बखरा आकि सासुक असक पड़लाक बाद श्वसुरक रंग-रभस मेभेल प्रगति सेहो कोनो नव बात नइँ छलै । विभा तँ कीर्तिमान बनेबे कयलक, मुदा ओकरा बुझैक शक्ति, नव ऊर्जा आ उत्तेजना जाहि स्त्री सँ आरएल केँ भेटलै तकरा ओ कखनो बिसरि नइँ सकल ।
भेलै ई जे आरएलक पहुँचला पर पहिल साँझ दारू आ मुरग फ्राइक खर्च उठब’वला जाहि दू टा चिक्कन मुल्ला केँ फँसाक’ श्रीकान्त अनने छल, ओ दुनू दूए पेग मे बहक’ लगलै । दू पीस पहिनहि एक टा खाकी लिफाफ मे फराक क’ कतहु पठा देने छलै श्रीकान्त । बाकी मे सभ कने-कने टोंगने छल कि प्लेट मे बचल अंतिम टुकड़ी लेल सभ एक-दोसरा केँ ’अहाँ लिअ’ अहाँ लिअ’?...’क अनावश्यक आग्रह कर’ लागल । ताहि पर पहिल मुल्ला दोसर सँ कहलकै, “एखने एक प्लेट आरो आबि जाइ तँ सभ सँ पहिने टाँग तोकीं घीचमें!”
“खाय नइँ सकै छी, से तँ नइँ कहलियौ हम ? आधा किलो तँ आराम सँ आरो खा सकेते छी!” दोसर गुल्ला बजलै ।
“हम तीन पाव आरो ख सकै छी ।“ पहिल कहलकै ।
“हम तँ सवा किलो मे एक्को टुक नइँ छोड़ि सकै छी ।चाटि-पोछि क’ खत्म क’ देबौ । नइँ खा सकबौ तँ एक सय टाका जुर्माना ! जाँच कर’क हौअ ककरो तँ ऑर्डर द’ सकै छें!” श्रीकान्त कहलकै ।
“हम दू किलो मे एक्को टा पातर सन दड्डी धरि नइँ फेकब । नइँ खाय सकलौ तँ पन्द्रह दिन मुफ्त खटब ।...चलू पूरा महीनाक दरमाहा काटि लेब ।“ मेवालाल चहकैत बाजल ।
“चुप हरामी! दू किलो मुरगा एक थारी मे परसल कहियो देखबो केलही ?” श्रीकान्त डाँटि केँ बरजलक ।
सभक अतृप्त क्षुधाक ध्यान राखि आरएल सन मक्खीचूसोक मन कयलकै जे एक प्लेट अपना दिस सँ मँगवा दै । मुदा नमरी बहरेला पर एक्को पाइ वापस नइँ भेटबाक आशंका सँ ओ चुप्पे रहल । दोसरो केओ साहस नइँक’ सकल ।...सभक मन छोहायलै रहलै ।
दोसर साँझ एक टा बूढ़वा मुल्ला केँ फँसौने छल श्रीकान्त आ दारूक संग डेढ़ किलो रेवा-बचबा माछ फ्राइ करबाओल गेल छलै । आरएल अझक्के देखलक, किछु माछ एक टा खाकी लिफाफ मे राखिक’ श्रीकान्त स्वयं दोकानक पछुआड़ दिस गेल छल । घरिक’ पेग बनौलक आ सभ गोटे कौआ-चिल्हा जकाँ बेसी सँ बेसी माछ झपटैत दारूक घोंट लेब लागल । जखन गिलास-प्लेट साफ भ’ गेलै, तँ काज-धंधाक संग गप्प हँकैक दौर शुरू भेलै । गप्पक विषयक ओना तँ कोनो सीमा नइँ छलै—गाम-घर आ बजारक बदहाली सँ राजनेताक दलाली धरिक चर्चा एक समान भ रहल छलै—मुदा बेसी बात घुमि-फिरिक’ खायबे-पीब पर आबि जाइ छलै । सहसा तखने सभ सँ बेसी माछ उदरस्थ क चुकल खूस्सट बूढ़वा कहलकै, “एहि पर सँ रसगुल्ला भेटि जाइत, तँ आनन्द आबि जाइत !...पचास तँ एक साँस मे गटकल जा सकै छै ।“
“हम तँ पचहत्तरि धरि एम्हर-ओम्हर नइँ ताकब ।“ श्रीकान्त लेर खसबैत बाजल ।
“हम एक सय नइँ खाय गेलौ तँ एक मास मुफ्ते खटब ।“ मेवालाल उत्साह सँ भरिक’ कहलकैओ ।
“चुप हरामी ! हरदम हमरा सँ बढ़िए क’ बाजत !...कहियो एक सय रसगुल्ला देखबो कयलही?” श्रीकान्त दहाड़लक ।
आरएल गौर कयने छल जे एहन गप्प जखन-जखन छिड़ैत, मेवालाल सरिपहुँ सभ सँ बड़िक’ बाजी लगबै छल आ श्रीकान्त कखनो डाँटब बिसरैत नइँ छल ।
ओहि साँझ घर घुरैत काल रस्ता मे मेवालालक मादे श्रीकान्त सँ फैल सँ पूछताछ कयने छल आरएल । शुरू मे तँ श्रीकान्त गुम्मी लाधने रहलै, मुदा फेर नीक जकाँ बतौनहुँ छलै, “आसल मे मेवालाल आदमी तँ बड़ काजक यए! खूब हुनरमंद सेहो, मुदा व्यवहार सँ तेहने चटोर आ अहदी!...चलबैऐ भरि दिन रिक्शा, मुदा दारू आ नीक-निकुत तरल-बघारल रोज चाहीएकरा । घरवाली आ तीन-तीन टा बेटी छै, तकर चिन्ते ने एक्कोरत्ती !...ई तँ मदनक कृपा जे आइ ओ हमरा संग ऐश क’ रहकऐ !...”
किछु क्षण बिलमि ल’ भेद खोललक, “भेलै ई जे एक दिन ओ हमरा दोकान आयल आ एक टा एहन रेडियो जकरा ठीक करैत हम हारि गेल रही, ओ पाँचे मिनट मे चालू क’ देलकै । हम पुछलिऐ, ई काज कहिया सीखलही ?’ तँ बतेलक जे मदनक दंग उठैत-बैसैत किछु गुण पाबि गेलिऐ भैया!’...असल मे पहिने हम तँ कमे दोकान पर बैसैत रहिऐ । बाबूजीक बाद मदने सम्हारने रहै ई पूरा कारबार । बीन भेलाक बाद कपार पर अयलै, तँ...। तैयो की? हम तँ एखनो कमे काज ठीक-ठीक क’ सकै छिऐ । एहि हरामी मेवालाल केँ हमरा सँ बेसी इल्म आ अनुभव छै, मुदा से पता आ विश्वास नइँ छै ओकरा ।“ एही संग अनायास खूब जोरगर ठहाका मारलक श्रीकान्त आ धनुखटोलीवला मोड़ पारक फेर कह’ लागल, “...तेँ हम साँझ टा केँ तीन घंटा अपना संग बैसायब शुरू कयलहुँ, र्तान-चारि मास सँ । पन्द्रह टके रोज, उपर सँ दारू-नाश्ता फ्री!...मंगल-मंगल हाटरोज एकर घरवाली एक सय पाँच टाका ल’ जाइ छै । दिन भरि रिक्शा सँ जे होइ छै, सेहो दारू मे नइँ उड़ै छै आब! दिन घुरि रहल छै ।...”
“तीन घटा मे अहाँ केँ ई रोज कतेक लाभ दै यए?” आरएल पूछलकै ।
“रोज एक्के रंग तँ नइँ होइ छै, तखन ई बुझियौ जे डेढ़-दू सयक एकन कज क’ए दै छै जकरा पहिने हम घुरा दै छलिऐ ।“ श्रीकान्त सहज ढंगेँ कहलकै ।
“तखन होलटाइम किऐ नइँ राखि लै छिऐ?” तह धरि जयबा लेल आरएल आरो कुरेदलक ।
“असल मे तक्लर कैक टा कारण छै । एक तँ छोट बजार, ओतेक काजे नइँ अबै छै । दोसर, सभ सँ पैघ बात ई जे दिन भरि काज कयने एकरा पता चलि जयतै जे ई हमर कतेक काज करै छै। आ ईहो जे कतेक जनै छै । तखन भ’ सकै छै जे बेसी पाइ माँगय आकि मदन सँ मीलिक’ अलग काज शुरू क’ दिअ’ आकि ओकरे लग चलि जाय तेँ हम एकरा ग्राहक सँ नइँ बतियाब’ दै छिऐ, नइँदिन मे काज लै छिऐ आ बिना दारूक सेहो नइँ। दारू पीबि ई की बाजै आ करै छै से हमरा जनैत बाद मे एकरा मन नइँ रहै छै ।...”
आरएल आरो किछु पूछ’ चाहै छल, ताबत घर आबि गेल रहै ।
तेसर साँझक महफिल मे थानाक हवलदारक संग एक टा स्थानीय नेता सेहो छलै जे विधानसभाक टिकट लेल एक संग कतेको पाटी मे जोर अजमाय रहल छलै । एहि साँझक खर्च श्रीकान्ते केँ उठब’ पड़ल छलै। एहू साँझ आरएल ध्यान देने छल जे जलखै मे मँगाओल आमलेट-भूजा आ सलाद-पकौड़ी मे सँ किछु अंश ओही लिफाफ मे अलग क’ पैकेट श्रीकान्त स्वयं पछुआड़ दिस ल’ गेल छल महफिल समाप्त भेला पर पान खयलाक बाद नेता आ हवलदारक संग लागल श्रीकान्त जखन थाना दिस चलि गेल, तँ मौका पाबि ओ मेवालाल सँ पूछलक, “अहाँ सँ एक-दू टा बात पूछ’क मन होइ यए । जँ अहाँ बेजाय नइँ मानी तँ...?
“यौ मेहमानजी, अहाँ तँ चौहद्दीबान्ह’ लागलिऐ ! सोझे मुँहेँ पूछू ने, जँ फूसि कही तँ बहिन चोद होइ, देह काज नइँ आबय!” मेवालाल कड़कि क’ बाजल ।
“तीनू साँझ देखलहु मुरगा, माछ, अंडा जे किछु आयल, तकर एक हिस्सा एक टा लिफाफ मे अलग क’ श्रीकान्तजी पछुआड़ ल’ गेलथि। से ककरा लेल ?” आरएल नहुए पूछलकै । अगिला प्रश्न पर जाइ लेल शुरुआत यैह ठीक लगलै ओकरा ।
मेदालाल कान लग फुसफुसाक’ बाजल, “एहि मकानक मालकिन पछिला साल भरल जवानी मे विधवा भ’ गेलि । पति फौज मे रहै, बोर्डर पर बर्फ मे गुम भ’ गेलै । बेचारी ब्राहाणी ई सभ कोना बना-खाय सकतै?तेँ श्रीकान्त जी चोरा-नुका...” आओ मुस्किआब’ लागल ।
किछु क्षण बाद फेर हीं-हीं करैत ओ आरएल दिस तकलक, “एक टा बात कही, प्रेम मे कमीना सँ कमीना प्राणी सेहो मनुक्ख भ’ जाइ छै!...नइँ बुझलिऐ मेहमानजी?”
“बुझलहुँ-बुझलहुँ!” प्रकटत: तँ आरएल मुस्किआ देने छलै, मुदा भीतर सँ सरकि गेल रहय । किछु क्षण पहिने धरि ओहिस्त्रीक प्रति आरएलक भीतर जे भाव छलै, से अनायास बदलि गेलै । सहसा ओहि स्त्रीक प्रति सम्मान सँ भरि गेल छल ओ । फेर पूछने छल, “अच्छा, एक टा आर बात कहू ! तीनू दिन हम देखलहुँ जे अहाँ मुरगा, माछ, रसगुल्ला सब मे सभ सँ बेसी खाइक बाजी लगा लैत छी । ई कहू जे घर मे रोज कते खाइ छिऐ ?”
अचानक मेवालाल गंभीर भ’ गेल ! किछु क्षण चुप रहिक’ ओ बाजल “मेहमानजी हमहू अही सभ जकाँ खाइ छी । कने भात कि एकाध टा रोटी बेसी !...सैह, कोनो हाथी-घोड़ा नइँ ! अहाँ ईहो बुझ चाहै हैबै जे घर मे हमर पेट भरै छै कि नइँ ? भरै छै मेहमानजी, भरै छै! हमहू भरि पेट खाइ छी, हमर घरवाली आ बच्चा-बुतरू सब सेहो ।...कहियो-कालक बात छोड़ि दियौ, से बहुतो केँ होइ छै। हँ, रसगुल्ला आकि मुरगा सन चीज भरि मन कहियो नइँ खेलिऐ । नइँ जानि कहिया सँ ई लौलसा लागल यए, से कहियो-काल निसाँ मे भरमिक’ किछु बोलि दै छिऐ । मुदा कैथ-बाभन आरू केँ देखियौ, बराती मे जते खायत नइँ तते छुतायत । तैयो हरदम खाइ लेल लेर चूबबैत डिंग हाँकैते रहत !”
आरएल चुपे रहल । आक्रोश सँ भरल मेवालांलक ठोर काँप’ लगलै । सोझाँ मे खुजल रेडियोक पोइन्ट्स चेक करैत, राँगा हटबैत-लगबैत, रेडियो पर आबि रहल गीत बजैत आ बंद होइत रहलै । ओहि रेडियोक काज पूराक’ सहसा ओ फेर बाज’ लागल, “मेहमानजी, खाइ केँ ल’क’ हम गपो मारै छिऐ तँ एक मासक दरमाहा दाव पर लगा क’ । कियो हिम्मती कखनो तैयार भ’ गेल आ हम किनसाइत हारियो जायब, तँ एक बेर भरि मन रसगुल्ल खाइक मनोरथ तँ पूर भ’ जायत ने !”
“चलू हम खुआबै छी । देखै छी, कते खाइ छी अहाँ ?”
“नइँ मेहमानजी, बिना बाजी लगौने नइँ खायब हम । फेर आइ सयवला भूखो नइँ यए, नइँ तेहन मूडे ।...” ओ रेडियो मे नजरि गड़ौने बाजल ।
आरएल केँ अफसोच जकाँ भेलै जे ओ बेकारे ओकर घ कोड़ि आहत क’ देलक । तेँ संयत स्वर मे पूछलकै, “आइ कते ? पचास तँ खाय लेब ने, बिना रस गारने ?”
“साठि खाय् लेब, मेहमानजी!”
“चुप हरामी!” तखने घुरिक’ आयल श्रीकान्त अनचोके दहाड़लक ।
मुदा आरएल हस्तक्षेप कयलक, “श्रीकान्तजी अकाँ शान्त रहू । आइ हम खुएबे एकरा । मँगबाउ सामनेक दोकान सँ ।”
“शर्त की छै?” श्रीकन्त सेरायल स्वर मे पूछलकै ।
“तय क’ लिअ’!” ओ डराइते-डराइत बाजल ।
“जँ नइँ खाय सकल तँ एक सय बीरा रसगुल्लाक दास एकरा दरमाहा सँ काटिक’ अपना सभ दारू-मुरगा आ रसगुल्ला खायब । आ, जा धरि अपन सभ खायब? एकरा कान पकड़िक’ उठ-बैसि करैत रहय पड़तै ।...पुछियौ, शर्त मंजूर छै?” श्रीकान्त नजरि फेरिक’ बाजल।
“मंजूर छै!” मेवालाल पूर्ववत गंभीर आ कड़क आवाज ने बाजल, “जँ खाय गेलौ, तँ ...?”
“इनाम मे स्पेशल पान!” श्रीकान्त मुश्किल सँ तामस दबवैत कहलक ।
आरएल किछु बाज चाहैतो पत्नीक जेठ भाइक लिहाज क’ चुप्पे रहल ।
मेवालाल सात मिनट मे छप्पन रसगुल्ला खयने छल कि ओकरा आँखि सँ नोर झहर’ लगलै ।
आरएल पूलकै, “कि भेल मेवालाल?”
“मेहमानजी, पछिला दशहरा दिन हमर जेठकी बेटी रसगुल्ला लेल जिद पकड़ि लेलकै । तमसा क’ हम दू-तीन चाट मारि देलिऐ । पाइक तेहन दिक्कति रहै जे...। से ओकर माय राति भरि झगड़ैत रहलि जे अपना दारू लेल एकरा पैसा होइ छै, बेटी केँ एक टा रसगुल्लाक बदला पबनियो-तिहार केँ थपड़े ! अपना जीह पर साँप नइँ कटा होइ छै!...तहिया सँ कते बेर सोचलिऐ जे कहियो ल’ जायब रसगुल्ला । सात मास बीति गेलै, नइँ ल’ जा सकलिऐ । जेना भेलै, हम तँ गपागप गिड़िए रहल छिऐ!...” एते कहैत-कहैत ओकर हिचकी जोर पकड़ि लेलकै आ नोर झहरब आरो बढ़ि गेलै । प्लेट मे बचल चारो रसगुल्ला अखाद्य वस्तु जकाँ पड़ल ओत’क वातावरण केँ भारी बना देने छलै ।
“खा नइँ सकलें ने तों! बाजी हारि रहल छें । आब चुर्माना लागि जयतौ ।” श्रीकान्त ओकरा जरल पर नोन छिटैत बाजल । मुदा तखने दोकानक बाहर देबालक निकट अचानके आबिक’ ठाढ़ि भेलि आमक फाड़ा सन-सन आँखि वाली गोर-नार युवा स्त्री केँ देखतहि ओकर पारा नरम भ’ गेलै । आरएल केँ सहसा खाकी लिफाफ सभक स्मरण अयलै !... एखनो ओकरा प्रति सम्मनक भाव सँ भरल छल ओ ।
“नइँ, हारलौं नइँ! ई चारि टा की, खा तँ सकै छी पाँच-दस टा आरो। हम प्रेम सँ कहलौं, जँ हारि नइँ मानी तँ ई चारो रसगुल्ला घर लेल ल’ जाइ । तीन टा तीनू बेटी आ एक टा...।“ मेवालालक बोली लड़खड़ा गेलै आ सरिपहुँ हिचकि-हिचकिक’ कानय लागल ओ । ओत’ ठाढ़ि कोशी-कमलाक बाढ़ि जकाँ दलमलित करयवाली स्त्री आब दोकानक भीतर मेवालालक लग आबि गेलि छलि आ किछु बाज’ जा रहलि छलि...!
...कि ठीक ओही क्षण गाम सँ एक टा छौंड़ा दौड़ल हाँफैत अयलै आ हकलाइते जेना-तेना श्रीकन्तक कान मे किछु कहलकै ।
फेर श्रीकान्त आरएल दिस तकलकै—एक संग तामस, घृणा, धिक्कार, दया आ प्रार्थना भरल नजरि सँ !
आरएल तखन किछु बुझि तँ नइँ सकल छलै, मुदा कोनो पैघ अनहोनीक आशंका जरूर ओकरा कँपाब’ लागल छलै ।
तुरंत मेवालाल केँ चाभी थमा, दोकानक सभ टा जिम्मेदारी ओकरा पर सौंपि, श्रीकान्त बाहर भेल छल । श्रीकान्तक पाछू-पाछू संशयग्रस्त डेगेँ आरएल सेहो बहरायल रहै ।
गाम सँ आयल छौंड़ा केँ रोकिक’ ओत’ ठाढ़ि स्त्री घटनाक मादे खोदबेद कर’ लागलि छलि । मुदा झट-पट सभ बात उगलि छौंड़ा सेहो दौड़िक’ हुनके सभक पछोड़ ध’ लेने छलै।
दौड़िक’ आयल छौंड़ाक पयरक धमक पर आरएल पाछाँ तकलक । ओकर नजरि छौंड़ा केँ पार क’ दोकान मे ठाढ़ि स्त्री पर गेलै—ओ स्त्री मेवालालक आरो लगीच जा गप्प करैत रोमांचक मुद्रा मे फ्रीज भ’ गेलि आरएलक स्मृति-पटल पर ।
किछुक काल बाद आरएल केँ गामक घटना मादे जानकारी देने छलै श्रीकान्त ।...जे विभा अपन मोटरकार वला बहनोइक संग हुनका गाम माछ खाय लेल भागि गेल !...
आरएल केँ एतबे मन पड़ल छलै तखन जे ओकर साढ़क गामक कबइ बड़ मशहूर छै । वैह कबइ जे पानि सँ बहराय गाछ पर चढ़िक’ हवाखोरी करैत छै!...वैह जीवट कबइ!...मुदा...।
आ यैह सभ सोचैत कखन घर पहुँचल आ कोना बेहोश भ’ गेल छल आरएल, से सभ किछुओ मन नइँ छै ओकरा !....

११ अगस्त, २००२
आरएलक छोटकी बेटी नीनाक पहिल बर्थ-डे छलै । साँझ उतरि रहल छलै—एखन ओते सघन अन्हार नइँ भेल छलै, मुदा बाहरक ओसरा मे अन्हारक आभास होअय लागल छलै । ओसराक आगाँ लॉन मे आरएलक पिता एकसरे बैसल खाँसि रहल छलाह । नै सालक बेटी नीरा आ पाँच सालक बेटा रून्नू अपन दोस्त सभक संग भीतरका कोठली मे चहल-पहल मचौने छल जत’ बर्थ-डेक सजावटिक संग नीनाक साज-श्रृंगार सेहो भ’ रहल छलै । पड़ोसक एक टा सहेलीक संग किचन मे व्यस्त रहलाक बादो विभा गुनगुना रहलि छलि। मुदा बाहरक ओसरा मे कतेको साल बाद भेटल अपन एक टा पुरान मित्रक संग रहलाक बादो आरएल उदास छल । दस साल पुरान कैसेट जहिना समाप्त भेलै, आरएल चुप भ’ कतहु दूर हेरायल-हेरायल जकाँ भटक’ लागल छल ।
सहसा ओ दोस्त आरएलक ध्यान भंन करैत चुप्पी तोड़लक, “मीत, ई कह’ जे एहन की बात भेलै तकरा बाद जे तों ओहि घटनाक सदमा सँ आइ धरि उबरि नइँ सकलह? एहि सँ बढ़ियाँ तँ ई होइतह जे तों ओही समय तलाक ल’क’ अलग भ्’ जयतह । एना घुटु-घुटि क’ तिले-तिले मरैत रहब...?”
किबीचे मे दोस्त केँ रोकिक’ आरएल बाजल, “नइँ-नइँ, तों नइँ बुझलह मीत ! तों बुझियो नइँ सकै छह! बिलकुले ने बुझि सकलह तों हमर पीड़ा!...” फेर किछु क्षण रुकिक’ ओ कहलकै, “असल मे महत्त्वपूर्ण ई नइँ छै जे माछ खाय लेल ओ भागलि आ भागिक’ कत’-कत’ गेलि !...आकि एकसरे भाइक बुतेँ किऐ नइँ घुरलै आ घुराब’ लेल के-के गेलै आ कोन-कोन तरहक शक्तिक जरूरति पड़लै?...ई सभ कोनो बात नइँ...महत्त्वपूर्ण ई छै जे घुरिक’ अयलाक बाद ओकरा अपन कयल पर पछतावा आकि हीनताबोध नइँ भेलै । महत्त्वपूर्ण ई छै जे हम दबिक’ रहलहुँ तँ रहलहुँ, ओकर ठसक बरकरार छै!...हम ओकरा छोड़’क बात निश्चिते सोचि सकै रही, मुदा नइँ सोचलहुँ! जनै छह, किऐ?”
क्षणभरि बिलमि फेर वैह कह’ लगलै, “श्रीकान्तक दोकान मे जे विधावा भेटलि छलि, ओ हमरा ई अकील देलक जे मनुक्ख सरिपहुँ जीवित अछि तँ ओ अपन भूखक कारणेँ । आ भूखक सम्,मान लेल जरूरी छै ओहि दिशा मे रुचि आ कबइ सन इच्छा । हमरा तँ एहि बातक गौरव अछि जे हम ओहि स्त्रीक पति छी जे बदनामीक हद धरि जाक’ ओ अपन भीतरक मनुक्खक रुचि आ इच्छाक पाँखि कतरब नइँ जानलक । दुख मात्र एतबे जे हम एहि गौरव केँ भीतर सँ स्वीकार करैतो व्यवहार मे नइँ आनि सकलहुँ, तेँ अपन इच्छाक पाँखि उठेबा मे असमर्थ होइक दंड भोगै छी।“ फेर एक टा पैघ सन चुप्पी पसरि गेलै जकरा तोड़बाक इच्छा दुनूक भीतर जीवित होइतो, साइत अपन सामर्थ्य गमा चुकल छलै। आ, दुनूक बीच टेबुल पर राखल खाली कपक अलावा नाश्ताक प्लेट मे दू तिहाइ सँ बेसी बचल पकौड़ी सेराय गेल छलै ।