देखैत दुन्दभीक तान - मिथिला दैनिक

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शुक्रवार, 30 जनवरी 2009

देखैत दुन्दभीक तान

देखैत दुन्दभीक तान

बिच शामिल बाजाक



सुनैत शून्यक दृश्य

प्रकृतिक कैनवासक

हहाइत समुद्रक चित्र



अन्हार खोहक चित्रकलाक पात्रक शब्द

क्यो देखत नहि हमर चित्र एहि अन्हारमे

तँ सुनबो तँ करत पात्रक आकांक्षाक स्वर



सागरक हिलकोरमे जाइत नाहक खेबाह

हिलकोर सुनबाक नहि अवकाश



देखैत अछि स्वरक आरोह अवरोह

हहाइत लहरिक नहि ओर-छोर



आकाशक असीमताक मुदा नहि कोनो अन्त

सागर तँ एक दोसरासँ मिलि करैत अछि

असीमताक मात्र छद्म, घुमैत गोल पृथ्वीपर,

चक्रपर घुमैत अनन्तक छद्म।



मुदा मनुक्ख ताकि अछि लेने

एहि अनन्तक परिधि

परिधिकेँ नापि अछि लेने मनुक्ख।



ई आकाश छद्मक तँ नहि अछि विस्तार,

एहि अनन्तक सेहो तँ नहि अछि कोनो अन्त?

तावत एकर असीमतापर तँ करहि पड़त विश्वास!



स्वरकेँ देखबाक

चित्रकेँ सुनबाक

सागरकेँ नाँघबाक।

समय-काल-देशक गणनाक।



सोहमे छोड़ि देल देखब

अन्हार खोहक चित्र,

सोहमे छोड़ल सुनब

हहाइत सागरक ध्वनि।



देखैत छी स्वर, सुनैत छी चित्र

केहन ई साधक

बनि गेल छी शामिल बाजाक

दुन्दभी वादक।



*राजस्थानमे गाजा-बाजावलाक संग किछु तँ एहेन रहैत छथि जे लए-तालमे बजबैत छथि मुदा बेशी एहन रहैत छथि जे बाजा मुँह लग आनि मात्र बजेबाक अभिनय करैत छथि। हुनका ई निर्देश रहैत छन्हि जे गलतीयोसँ बाजामे फूक नहि मारथि। यैह छथि शामिल बाजा।