पोसपुत (भाग - २)- सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू - मिथिला दैनिक

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शनिवार, 25 अक्तूबर 2008

पोसपुत (भाग - २)- सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

छेदीलाल जखन अप्पन आमदनी पूर्णरुपसँ देख लेला तखन हुनका अप्पन बड़का भैया प्रति मदति करबाक भावना मोनमे जागृत भेलनि । माय ओ अप्पन भतिजा निरंजनके अपनेसंग राखऽलगलखिन । त्रिचन्द्र कौलेजमे नमांकन सेहो करा देलखिन आ, ओ निकसँ अध्ययननमे लागि गेल। मुदा घरक स्त्रीक कारणसँ मर्दक सब कएल–धएल सभ पानिमे चलि जाइ छैक । सेहे भेलै, छेदीलालक कनिञा निरंजनसँ भोजनक बरतनि धोबऽसँ घर–आंगन सभ किछु करबऽबनि । आ, जखने ओ अप्पन पतिक मोटरसाइकलक अवाज सुनिलैथि त ओछाएनपर जाकऽ सुतिरहै आ कुहरऽ लगै । जखन हुनका डाक्टरलग जचाबऽ लेल कहल जाए त ओ कहथिन –

"एँह, ......... अहिना ठिक भऽजएतै कि ।"

समय एहिना चलैत रहलै । एक दिन किछु बिदेशी हुनका घरपर अएलै आ किछु कागज–पत्र पर हस्ताक्षर कऽकऽ सहमति जना देबऽलेल कहलकै । छेदीलाल बैसकऽ ओहि कागज सबके अध्ययन करऽ लगलाह । ओहिमे पन्द्रह हजारक मसिनके अठारह लाखक बिजक तैयारी कएल गेल रहैक । ई देखिकऽ ओ एहि बातक बिरोध कएलनि । तैं बिरोध करैत देखिकऽ ओ बिदेशी सब हुनका तिन लाख रुपैया दऽकऽ कहलकनि –

"राखू।"।

तैयो ओ हस्ताक्षर नहि कऽ ओकरा सबके डाँटिकऽ भगा देलाह । ओकरा सब मे एकटा आदमी बाजलो रहै –

"तोहर भविष्य कारी छौ ।’

मुदा ओ एहि बातपर ध्यान नहि देलन्हि । आ, करिब एक सप्ताहक बाद एकटा पत्र हुनक नामसँ अएलै जाहिमे हुनकर अवकास पत्र छलैक । एहिके अलाबा भवानीक बेटासबमे एकटा बेटा सतीश होटल मेनेजमेन्ट, बिनोद कमर्स, गोपाल एम.बि.बि.एस करऽ बनारस गेलै । सबसँ छोट बेटा दिनेश पढ़ऽमे बड भुसकौल रहै । कहुना घुसकुनिया काटिकऽ एस.एल.सी. पास कएलकै आ आइ. कम. पढ़िते छोड़ि देलकै । भवानी एकटा निक आ कुशल बाप रहथि तैं धियापुताक जिम्मेबारी निकसँ निर्वाह कएलनि । अप्पन बालबच्चाक बियाहक सम्बन्धमे गोपालक बियाह झंझारपुर, निरंजनक बियाह मोतिहारी, सतिसक बियाह पटना आ बिनोदक बियाह सितामढ़ि कएलनि । मुदा दिनेशक बियाहक बात जखन चलै तखन ओ एक्कहिटा बात कहथि–

"एखनधरि किछु नहि कएलहूँ । किछु आर्जन कऽलैछी तखन बियाह करब ।’

दिनेश अप्पन लगन आ मेहनतिसँ बिभिन्न काजक शुरुवात कएलनि । हुनक कहब छलनि जे एहि दुनियामे कोनो काज खराब नहि होइत अछि, निर्भर करऽके तरिका आ करनिहारके सोंचपर फरक परैछ । जे जते मेहनति करत ओकरा ओतबे फल भेटतै । हुनका आगु जे काज अएलनि ओ छोरलखिन नइ । लकड़ि ढुवानीसँ लऽकऽ सड़क निर्माणक ठेक्का तक हुनका जे काज भेटलनि सबटा लेलनि आ, भाग्य सेहो साथ देलकनि । समयक गति अपने हिसाबसँ चलैत रहलै । गोपालके एकटा बेटी रिना आ दूटा बेटा जँहिमेसँ जेठकाके नाम राजा आ छोटकाके नाम छोटु परलै । दिनेश राजाके बड मानै । ओकर पढ़ाइ–लिखाइसँ लऽकऽ आओर सब किछुपर ओबिचार कऽ देथिन्ह । आ, दिनेश सब दिन एकहि बात कहथिन्ह –

"राजा हमर बेटा छै ।’

एकबेर निरंजन दिनेशक बियाहक प्रस्ताव रखलकै । दिनेशक पएर स्थिर भऽ गेल रहै । ओ अप्पन पएरपर ठाढ़ऽ भऽगेल रहे । तैं ओ बियाहक लेल तैयार भऽ गेलै । निरंजन अपने ससुरारिमे निक आ खानदानी लड़की पिंकी संग बियाह कऽ देलकै । बियाहक बाद त बहुतो लोक स्थिर भऽजाइए । मुदा दिनेशक ब्यापारिक क्रियाकलाप रुकलै नहि । बल्कि आओर तेज भऽ गेलै । सच कहथिन हमर बाबूजी –

"मरदाबा उपजाबे धान त मौगी लक्षणमान ।’

सबहक कहब छलनि जे हुनक कनिञा लक्ष्मीपात्र छथि । एकबेर ओ अप्पन कनिञासँ बिचार कएलनि जे भैयारीमे सबके पूँजी दऽ ब्यापार सञ्चालन कराबऽ परलै । कनिञा सेहो सबहक निक सोचि सकरात्मक जबाब देली । एहि बातपर बिचार कऽकऽ ओ बड़का भैया गोपालके बजाकऽ कहलखिन –

"भाइ, अहाँ कोनो ब्यापार सुरु कऽलिअ ।’

गोपाल कोनो प्रकारक उत्तर नहि देलकै तैं ओ फेर कहलनि –

"अहाँके जाहि क्षेत्रमे ज्ञान अछि ताहि क्षेत्रक ब्यापार करु ........ पूँजी हम देब ।’

ओना सच कही त गोपाल बनारस जाकऽ पढ़ल नहि, नक्कली प्रमाण–पत्र लऽकऽ आएल छलथि । दिनेश हुनका एक सप्ताहक समय दैत कहलखिन –

"एक सप्ताह भितरमे बिचार कऽकऽ कहु अहाँ कि करब ?"

एक सप्ताह ठिकसँ बितलो नहि रहै कि दिनेशलग जाकऽ गोपाल कहलकै–

"हमरा फिल्मके सम्बन्धमे निक ज्ञान अछि तै हम फिल्म डिस्ट्रीब्यूसनके काज करऽचाहैछी ........ मुदा एहि काजक लेल कम सऽ कम तिस लाख रुपैया चाही ।"

आमदनीक बारेमे पुछलापर ओ जबाब देलखिन –

"भाग्य जौ साथ दऽदे त साल भरिमे पूँजी निकलि जाएत ।’

दिनेश तिने–चारि दिनमे तिस लाख रुपैया गोपालके देलखिन आ चेताबनी सेहो देलखिन –

"निकसँ काज करऽब, प्रतिष्ठा नहि खसए ।’

गोपाल शुरुमे बड निकसँ काज कएलनि । मेहनति, लगन आ धैर्यतासँ काज कएलासँ सबके सफलता भेटैत छैक, हुनको भेटलनि । जाहिके देखिकऽ निरंजनके सेहो ब्यापार सञ्चालन करबाक इच्छा भेलनि आ दिनेशलग इच्छा जाहिर कऽकऽ प्रेशवला काजक शुरुवात कएलनि । फिल्मके सम्पूर्ण जिम्मेवारी गोपाल आ प्रेशक जिम्मेवारी निरंजनके सौंपल गेल रहै । साझिल भाइ बिनोदक कनिञा सब दिन बिमारे रहऽके कारणे ओ काठमाण्डूएमे रहिके ब्यवस्था कएलनि । आ ओतै ब्यावसाय करऽ लगलाह । शायद बिष्णु लोकसँ लक्ष्मी आबिकऽ ओहि घरमे बास लऽ लेने छलखिन तैं सबहक ब्यापार निके रहै ।

एक दिन बिनोद अप्पन कनिञाके लऽकऽ डाक्टर लग गेलाह । हुनक कनिञाक बिभिन्न जाँच कएलाक बाद डाक्टर हुनका एकान्तमे बजाकऽ कहलकनि जे हुनक कनिञा कहियो माय नहि बनि सकती । ई सुनिते हुनका पर पहाड़ खसि पड़लनि । जखन ओ डाक्टर लगसँ अएला तखनेसँ ओ त किछु बजबे नहि करथि । हुनक कनिञा हुनकासँ बेर–बेर पुछबो कएलखिन मुदा ओ कोनो प्रकारक जबाब नहि देथिन्ह । ओइ दिन हुनका दिनोमे अन्हार जकाँ महसुस होइत छलनि । ओ घर कटाओन लगै छलनि । मुदा कि ...........। करिब पाँच बजे एकटा झोड़ा लऽकऽ ओ कालीमाटी दिश तरकारी किनऽके बहानासँ निकललाह । किछुए दूर आगू हुनक परम मित्र रामकिशन हुनका भेटलनि । अप्पन मित्रके देखियोकऽ आन दिन जकाँ हुनका चेहरापर मुस्कान नहि अएलनि तैं हुनका बुझऽमे चलि अएलनि जे पक्का कोनो मुस्किलमे अछि । तेँ ओ बिनोदक हाथ पकरिकऽ कहलकै –

"रे, चल दारु पिबै छी"।

दुनू ओतैके भठ्ठिमे गेल आ ब्रिन्चिपर बैसिगेल । काउन्टरपर बैसल युबकके रामकिशन एक बोतल दारु ल्ऽ कऽ आबऽ लेल आदेश देलकै । कनिक देरक बाद एकटा पच्चिस–तिस बर्षक महिला एकटा बोतलमे दारु, दूटा गिलास आ एकटा थारीमे मुरही, दालबुट आओर किछु लाबिकऽ टेबुलपर धऽ देलकै । रामकिशन दूनु गिलासमे दारु धएलकै आ एकटा गिलास अपने उठएलकै आ दोसर मिताके उठाबऽलेल आग्रह करैत ’चियर्स’ कहलकै । दारु पिबऽके क्रममे करिब आठ बजे धरि चलैत रहलै । रामकिशनके त कम मुदा बिनोदके कने बेशिए निशा लागि गेल रहए। तखन मूँह लरबरबैत बिनोद अप्पन मितसँ कहलखिन–

"आइ हमरा डाक्टर कि कहलकऽ से तोरा बुझल छौक ..... नइ होतौ बुझल ........ कैला त तु ओतऽ नहि छलेहऽ ....... आ ओकर बात हमरा सिधा दिलपर लागल । ........ ओ हमरा कहलक जे हमर कनिञा कहियो माय नहि बनिसकैए । ..... ओकरा कहियो बालबच्चा नहि होएतै ।’

एते बाजिकऽ ओ भोकासी पारिकऽ लागल कानऽ । बिनोदके कनैत देखिकऽ रामकिशन ओकरा सम्झाबऽ लागल । अन्ततः ओ सम्झा बुझाकऽ बिनोदके ओकर घर पहुँचाकऽ अप्पन घर दिश चलल । ताहि दिनसँ बिनोद प्रायः सब दिन पिबऽ लागल । एहि बातक चर्चा प्रायः सब दिन घरमे चलै मुदा कारण किनको बुझल नहि छलनि । एक दिन निरंजन, दिनेश आ बिनोदक कनिञा लक्ष्मीसंग बैसकऽ बिनोदके दारु पिबऽके कारण प्रति बिचारबिमर्श करऽलेल बैसल मुदा कारण किनको बुझल नहि छलनि । बिभिन्न बातसभक सम्भावना भऽसकैए कहिकऽ ओ सब चर्चा करैत रहे । ताबते लक्ष्मी बजलिह –

"पहिल दिन दारु पियलमे घर पहुचाबऽ रामकिशन आएल रहै । ...... एहि सम्बन्धमे पूर्ण जानकारी ओकरा होएत ..... ।"

ई बातक बाद दिनेश आ निरंजन दूनु भाइ रामकिशन लग पहुचल । बहुत देरक बिचार-बिमर्शक बाद ओ घटना पूर्ण रुपसँ कहलकै । तखन दूनु भाई ओतऽसँ घुरि आएल । आब बात अएलै समस्याक समाधानके । आखिर कि कएल जाए । दोसर बियाह कऽदेलासँ घरमे मात्र कल्लह बढ़ि जएतै आओर किछु नहि । एहि समस्याक समाधान बड कठिन भऽ गेलै आ जौँ एहिना रहत त भाइसँ हाथ धोबऽ परत । ओ त एकटा आओर नमहर समस्या भऽजाएत । बहुत देर धरि बिचार बिमर्श कएला बाद निरंजन कहलकै –

"हम अप्पन जेठ बेटाके दऽ दै छी ।"

तकर बाद दिनेश कहलकै –

"बेटी चाही त हम अप्पन बेटीके दऽदैछी ।"

आ सेहे भेलै । एकटा पूजाके आयोजना कऽकऽ निरंजन अप्पन आठ बर्षक बेटा आ दिनेश अप्पन तिन महिनाक बेटी सदाकऽ लेल दऽ देलकै । फेर, समय निकसँ चलऽ लगलै । नहि त कोनो कष्ट आ नहि त कोनो झंझट । दिनेश अप्पन बडका भाइके बेटा अभिषेकके बड मानै । ओ अभिषेकके प्रेमसँ राजा कहिकऽ बजाबै । आ ओकरे सभ दिन आगु बढाबऽमे प्रयासरत रहै छलाह । दिनेशक मोनमे रहै जे ओकरा निक बनाबी आ बेटा ओहे बनि जाए । दिनेशक ब्यापार खुब निकसँ चलै । तैं ओ अप्पन ब्यावसायके खुब निकसँ बिस्तार करऽ लेल राजधानीमे कार्यालयक स्थापना कएलनि । जे प्रमुख कार्यालय रहलै आ शाखा कार्यालय सभ बिभिन्न जगह । ब्यापार ओतहू निके गतिमे चलैत रहलै । मुदा काठमाण्डू एकटा खर्चाक प्रमुख बाट सेहो छैक । आ एकटा आओर बात जे लगभग सबहक मुँहसँ सुनैछीऐ–

"काठमाण्डू बाबा पशुपतिनाथक एहन धाम छैक जतऽ निक काज कैनिहारके शरण भेटै छैक आ अधलाह काज कैनिहार जतऽ सँ आएल रहैए ओ ओतहू निकसँ नहि रहऽपबैए ।"

ठिक ओहिना भेलै ओकरा अमृत नामक ब्यत्तिसँ परिचय भेलै । जे बिभिन्न ब्यत्ति सभसँ दिनेशक परिचय करौलकै । एहि क्रममे भारतिय ब्यापारी गुप्ताजीसँ परिचय भेलै आ लगले किछु दिनक बाद सोना–चाँदीक ब्यापारी दिपकसँ परिचय भेलै । सबहक बात बुझि ओ अप्पन कनिञा आ एकटा फेर बेटी भेल रहै ओकरा आ राजाके लऽकऽ काठमाण्डूए चलि आएल । ओ समय, ब्यापारक बड निक समय रहै । बहुतो लोकके इच्छा छलनि जे दिनेशक पार्टनर बनिकऽ काज करी । आ, एहि क्रममे एकटा बिरगंजक ब्यापारी अशोक हुनका लग ब्यापारक लेल प्रस्ताव रखलाह । दिनेश सकरात्मक जबाव देलखिन । मुदा एकटा कहबी छैक –

"सब दिन होत न एक समाना ।"

ब्यापार आओर बिस्तारक क्रममे हुनक किछु साथी सभ सोनाक ब्यापार करऽ लेल हुनका बिचार देलकनि । नाफा त खुब रहै । दिनेश करऽ लेल तैयार भऽ गेल । सोना हङकङसँ अबै आ नेपाल होइत भारत । एक टिपमे दू सँ तिन लाखक बचत । एहि काजमे दिनेश अप्पन टोल परोसक साथी भाइ सभके काज देलखिन । सभके एकबेर–दूबेर हङकङ जएबाक मौका भेट जाइ छलनि । मुदा एकटा कहबी हमर मा हमेशा कहै छलखिन –

"कुकूरके घी नइ पचै छैक ।"

नहि जानि किए नहि पचै छैक । भऽ सकैए ओकरा खाएके लुरि नहि होए । दिनेश ब्यापारसभ देखभाल करऽलेल अप्पन माझिल भाइ निरंजनके जिम्मा दऽ देलक । आ, अपने क्यासिनो आ बिभिन्न जुवाक अड्डासभ घुमऽ लागल । दिनेश एकटा आओर ब्यापार सुरु कएलकै । जखन नेपालमे भ्याट (भेल्यू एडेड टेक्स) बि।सं. २०५२सालमे अएलै आ तकर नियमावली २०५३ क बाद सम्पूर्ण ब्यपारी सभके दर्ता होबऽजाए परलै । ताहि समयमे बहुतो ब्यापारीलग समान त रहै मुदा ओकर बिल त नहि रहै । आन्तरिक राजश्व कार्यालयद्वारा सर्बेक्षण सुरु भेलाक बाद बिलक श्रृजना करब शुरु होबऽ लगलै । ई ब्यापार बड चलै । ओ अप्पन टोलक साथी–भाइसभक नाममे फर्म आ कम्पनी दर्ता कराकऽ बिल बेचब चालू कयलक । आ, आम्दनीसँ क्यासिनो जाएब, दारु पियब आदी–इत्यादि । एहि सन्दर्भमे एकटा संस्कृतमे बड सुन्दर कहबी छैक –

"भाग्यं फलतु सर्वत्रः न च बिद्या न च पौरुषः"

अर्थात एहि दुनियामे जे किछु होइछ भाग्यसँ नहि त बिद्या आ नहि त तागतसँ । भाग्य खराब जौ भऽ जाए त ककरो किछु नहि लगैछ । ओकर भाग्य खराब तहिएसँ सुरु भेलै जहिया ओ ब्यापारक देखभाल निरंजनके हाथमे दऽ देलकै । बि.सं. २०५७ साल जेष्ठमे हम काठमाण्डू अएली आ २०५८ साल जेष्ठ १० गते दिनेशक अफिसमे एकाउन्टेन्टक पदपर हमरा नोकरी भेल । बि.सं. २०५९ साल जेष्ठ १९ गते राज परिवारक हत्या पश्चात देशमे अशान्ति फैलल रहै । तकर बादक तात्कालिन प्रधान मन्त्रि शेरबहादुर देउवा द्वारा देशमे संकटकालक घोषणा भेलाक बाद नेपालक ब्यापारमे मन्दि आबऽ लगलै । आ, सुरक्षाक जाँचक प्रभावसँ ब्यापार प्रभावित होबऽ लगलै । जाहिमे दिनेश अपने गामपर रहऽ लागल । ओतै होटल आ फैक्ट्रीके देखभालमे लागि गेल । काठमाण्डूमे अशोक कहियोकाल अबै मुदा पुरा देखभाल राजाक हाथमे रहै ।एहि क्रममे एकबेर फैक्ट्रीक अडिट चलैत रहै । हमरा ओतऽ एक्सपर्ट बनिकऽ जएबाक मौका भेटल । मुदा हमरा ओतऽ फैक्ट्रीक हिसाब–किताब कम आ सोना चाँदीवाला हिसाब देखऽलेल बेशी आग्रह कएल गेल । छ बर्षक पहिलेके हिसाब रहै । ओ हिसाबमे की देखाओल गेल छैक से हमरा किछु बुझऽमे नहि आबे । तिन दिन हम लगातार ओकर अध्ययन करैत रहली । बादमे ई बुझऽमे आएल कि ओ हिसाब गलत रहै । ओहिमे अरसठि लाख नाफा होबऽचाही मुदा मुदा छेहतर लाख घाटा देखाओल छलैक । हम अपना अनुसार ओ रिपोर्टके ठिक बनाकऽ दिनेशक कनिञाक हाथमे दऽ देलियइ । दोसर दिन साँझक समय रहै । दिनेश हमरा बजाबऽ लेल हमर कोठरीके नोकरके पठौलक । हम तुरत ओतऽ गेलीऐ । सम्मान पूर्वक ओ हमरा बैसऽ लेल आग्रह कएलक । हम ओतऽ सोफापर बैसि गेलिऐ । नोकरके ओ ओतऽसँ जाएके लेल आदेश देलकै । ओकरा ओतऽसँ गेलाक बाद दिनेश आ हुनक कनिञा बातक शुरुवात कएलखिन । पहिने दिनेश हमरासँ पुछलक –

"हँ सन्तोष, जे कागज तोहर चाची हमरा देखऽ देलकौ से ....... कि ठिक छौ । तों कतेक बिश्वस्त छे, अप्पन काज प्रति ?"

"जी" –हम जबाब देलिऐ ।

"एतऽके नामी अडिटरके हाथसँ बनाओल ब्यालेन्स शिटके तों गलत कहिरहल छही .. एहि लेल तों बिचार कऽले .......आ, अडिटर संगैह हमर बाप समान भाइ सेहो बदनाम भऽरहल अछि ....... एहि बातक बिचार कऽले ।"

हम कने मुस्कैत कहलीऐ –

"एकाउन्टमे चचा ई कतौ नहि लिखल छैक जे नामी आदमी बनएतै त गलत नहि होएतै आ नहि तऽ कतौ लिखल छै जे कोनो बडका आदमी बदनाम हुए त चुप भऽजाइ । ....... आ ओहुना हमर गुरुजी पढ़ऽएने छथि जे अडिटक काम गल्ती आ जालसाजी पत्ता लगाउ आ ओकर रोकथाम करु ।"

हुनक कनिञा हमरासँ फेर पुछलखिन –

"अहाँके अप्पन हिसाबपर भरोशा अछि कि नहि ?"

सकरात्मक मुरी हिलाकऽ हम जबाब देलिऐ । फेर ओ सभ अडिटर आ भाइसाहेबके बजाबऽके बात कएलनि । हम फेर कहलियनि –

"जी हमरा एकटा अनुभव अछि जौं ओ अडिटर दोसरके कहलपर हस्ताक्षर कएने होएत त ..... नहि आओत ।"

"हेतै, ....... अहाँ जाउ, अराम करु ।" –हुनक कनिञा हमरा कहलखिन ।

हम ओतऽसँ अप्पन कोठरीमे अएलहुँ । किछु देरक बाद खाना त खएली, मुदा निन्न नहि आबे । रातिमे कखन निन्न परल से धरि बुझबे नहि कएलिऐ । भोरमे करिब आठ बजे नोकर चाह लऽकऽ उठाबऽ आएल । आ, चाह हाथमे दैत कहलक–

"निरंजन भैया सेहो आएल छथि, ........ किछु पिताएल जकाँ बुझाइछथि ।"

हम ओकरा हाथसँ चाह लऽलेलिऐ । चाह पिलाक बाद ओतै राखल लोटामेका पानिसँ हम मुँह धोएलिऐ आ रुमालसँ मुँह पोछैत निच्चा उतरलिऐ । हमरा देखिते निरंजन पिताकऽ बाजल –

"कि रे, तों तऽ हिरो भऽगेले ?"

तखने दिनेशक कनिञा निरंजनके कहलखिन –

"आप उसको कुछ मत बोलिए ....नहि तो ठिक नहि होगा .....’।

एतबे बात पर ओ शान्त भऽगेलै । तखन दिनेश हुनकासँ पुछलकनि –

"भैया, ओ अडिटरके कि भेलै ?"

एकदम शान्त भऽ बिनम्र आवाजमे निरंजन जबाब देलकै –

"ओ त बाहर गेलछै ।"

"त ....... अहाँ सन्तोष जे हिसाब निकाललकैए से देखलिए, कि नहि ....?"

"हँ, देखलिए ।"

"कि बुझाइए ?"

दिनेशक प्रश्न सुनिते निरंजन बजलै –

"गँरि धोबऽके त लुरि छैहे नइ, ..... ओ कथी हिसाब निकालतै ।"

हमरा बेइज्जत कऽकऽ बजैत सुनिकऽ दिनेशक कनिञाके बरदास्त नहि भेलनि आ ओ निरंजनके डटैत बजलिह –

"माइन्ड योर ल्याङ्गवेज ........ आप मुँह सम्हालकर बोलिए ....... एक अफिसर रैंकके आदमीको आप इस तरह बोलते आपको शरम आनी चाहिए ।"

जहिना ओकरा डाँट परलै ओ मुहसँ गारि निकालिते ओतऽसँ चलि गेलै । हमहुँ अप्पन काठरीमे जाकऽ कपड़ासभ जे बाहरमे रहे ओहिके बैगमे धऽकऽ बाहर निकलैत रहि । ई देखकऽ दिनेश हमरा हाथसँ बैग लऽलेलक । आ, हाथ पकड़िकऽ अप्पन कोठरीमे लऽ जाकऽ सोफापर बैसऽ लेल कहलक । ताबते हुनक कनिञा सेहो निरंजनके गारि पढ़िते ओहि घरमे अएलखिन । जखन ओ सेहो बैस गेलखिन तखन दिनेश गम्भिर भऽ हमरा कहलनि –

"देख सन्तोष, लोक जीवनके छोट कहै छैक, मुदा जीवन छोट नहि छैक । एहिमे लोक जस–अपजस, ...... धर्म–पाप, ...... प्रेम–घृणा, आदि बिभिन्न चिजक भागिदार बनैछ । हालाकि केकरो किछु लऽलेलासँ किछु नहि बिगड़ैछैक ।..... एकटा चोरके बारेमे जौ कहऽ परै त ओ केहन केहन घरमे चोरी करैछ, मुदा पुरी त नहिए परैछ । ....... माय हमर कहबाक आशय ई अछि जे भेलै भऽ गेलै । ...... जहिना तों रातिमे कहले जे ओ अडिटर नहि आओत तहिना नहि आएल .... जखन की ओ हमरा भोरमे भेटले छल । ..... खैर, तों ई अडिट कऽकऽ हमर आँखि खोलि देले माय एमकी बेरके सभहेसँ नमहर प्रमोशन तोरे भेटतौ । ..... हँ, आब कह तों ई बेग लऽकऽ कतऽ चलले ?"

हम मुरी गोतनहि कहलियइ –

"मुड अफ भऽ गेल जनकपुर जाकऽ चलि अबै छी ।"

ताबते हुनक कनिञा बजलिह–

"भोजन कऽलिअ, तखन चलि जाएब ।"

बात काटब उचित नहि रहे माय हम भोजन करऽ बेर तक रुकि गेली । भोजन कएला बाद दिनेश हमरा एकटा लिफाफ देलक । तकर बाद हम ओतऽसँ जनकपुर चलि देली । काठमाण्डू अफिसक परोशमे एकटा अडिटक अफिस रहै । आ ओतऽ सुजाता नामक एकटा लड़िकि काज करै । देखऽमे मूँह–कान त निके रहै मुदा ओ लोभी प्रबृतीके रहै । राजाके अप्पन मुँह–कान त निक रहै नहि मुदा काका वाला पाइ त रहै जाहिके बलपर बराबर स्पेशल नास्ता आओर बिशेष ब्यवस्था करै । ओ लोभसँ ओकरा पाछु पड़लापर राजाके अनुभव होइक जे ओ ओकरासँ प्रेम करऽ लगलीह । माओवादीक चन्दा आतंकके प्रभावसँ दिनेश अप्पन अफिसके घरमे लऽगेल मुदा राजाके सुजातासँ भेटऽबाला क्रममे चलैत रहलै । बजारमे ब्यापारीसभ लग पाइ बाँकी त रहबे करै आ ख्याती सेहो । जेकरा कहै केओ नहि नइ कहै । ओ जतऽसँ चाहै पाइ उठऽबै आ सुजाता जे कहै किनदइ .... । किछु दिन बाद दिनेश बिमार भऽगेल । काठमाण्डूसँ दिल्ली धरि इलाज चललै । ओमहर अशोकक लगानी सबटा डुबि गेलै । क्यासिनोक प्रभाव पड़िते रहै । दोसर दिश राजा सबहे पार्टी सभसँ अग्रिम पैसा उठाकऽ सुजातामे खर्च करऽ लागल । रोकऽवाला केओ रहै नहिए । एक दिश स्टाफ सभके तलब नहि आ दोसर दिश चालिस–पचास लाख रुपैया चारिए महिनामे राजा खर्च कऽ देलकै । दिनेश बेटा कहिक पालने जे पोशपुत रहै जेकरा ओ प्रेमसँ राजा कहथि से साँप रहै से हुनका बुझल नहि छलनि । ओ त सोचथि जे हुनका बाद हुनक ब्यापार आ परिवारक देखभाल राजा करत मुदा ओ .......। दिनेशके दवाइसँ किछु दिन ठिक रहै आ फेर जहिनाके तहिना । दारुक कारण किडनी खराब भऽ गेल रहै । एहिना एकबेर हुनका बड़जोर मोन खराब भऽ गेलनि त एम्बुलेन्ससँ पटना लजाइते बेर ओ अप्पन पत्निके कोरामे ई संसारके छोरिकऽ सदाके लेल चलि गेला । ओतैसँ सतिश फोन कएलकै । हमरा सभके मालुम भेल । राजा संगहि ओकर परिवारके अन्य सदस्यसभ सोल्टि होटलके गाड़ी लऽकऽ गेलथि । आ हम आ रंजन बससँ गेलीयइ । बसमे हमरा त कनी देर निनो परल मुदा रंजन भाइजीके निन्न साफे नहि पड़लनि । किए त हुनको नामक एकटा कम्पनीसँ कारोबार बहुत भेल रहै मुदा आयकर एक्कहुटा रुपैया बुझाओल गेल नहि रहै । सायद स्टाफसभमे सभसँ बेशी ओहे बेचारा दुःखी रहे । मुदा दिनेशक अप्पन ब्यबहारक कारणे ओ हमरा कहलनि –

"सन्तोष भाइ जिवनमे कहियो हमरा लग कने बेशी पाइ अएलै त हम दिनेश भैयाके नामके धर्मशाला वा बिद्यालय जरुर बना देबै ।"

प्रातः स्थानिय बजार सोगमे एक दिनक लेल बन्द भेलै । आ करिब चालिस प्रतिशत परिवारमे कन्नारोहट । दिनेशके मरलाक बाद राजा आ ओकर बाबू गोपालके त लौटरीए पड़िगेलै । लोकके देखाबऽ लेल कानऽ लगै आ फेर आपसमे खुसी बाँटऽ लगै । राजा जे दिनेशक पोशपुत रहै ओकरा अप्पन धर्मक मायसँ ताबते मतलब रहै जाबे ओ दिनेशक ब्रास्लेट, औंठी, लकेट आ अन्य गहना सभ लेबऽके रहै । ओकरा हम एकबेर रोकबो कएलियइ मुदा माय त बुझे जे बेटे त अछि । आखिर ओ गहना की होइक, कतऽ जाइक ? त अकसर राजा गहनाके बैंकमे धऽकऽ पाइ निकालै आ सुजाताके कहियो नगरकोट, त कहियो धुलिखेल, कहियो दामन आ कहियो कतौ त ....... । ई क्रम चलैत रहलै । दिनेशके देहान्तक बाद सुरेन्द्र आ रंजन दुनु नोकरी छोड़ि देलकै मुदा हम नोकरी नहि छोड़ने रही । कहबी छैक –

"कौआ भेल भण्डारी त गुँहे–गुँह टार ।" सेहे भेलै । दिनेशक मरला बाद अफिसक कार्यभार सतिश, गोपाल आ निरंजनके हाथमे चलि गेलै । पहिलेके बितल घटना सबहक कारणसँ हमरासंगे सेहो किछु निक ब्यबहार नहि होए। हमहुँ छोडि देलियइ । मुदा, ओहि परिवारसँ हम अखनो नजदिक छियइ । ई कथा लिखऽसँ किछु दिन पहिने दिनेशक कनिञाके एते ओसभ दुःख देबऽ लगलै कि ओ नैहर चलि गेलि !


समाप्त