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भवानीशंकरकेँ बुढ़ारीमे पुत्रसोग देखऽ पड़लनि ओहो सबसँ छोट बेटाक । रहि–रहिकऽ ओ बेहोश भऽ जाइछ, किए तँ आओर किछु नहि, मुदा ओते कम समयमे मुसमात पुतहू आ...।... दूटा पोती जाहिमेसँ एकटा दस बर्षक आ दोसर पाँच बर्षक...स‍ंगमे एकटा पोता सेहो छलै, जे दूइयो बर्षक नहि । हम जखन हुनकालग बैसलहुँ तँ ओ कानि–कानि कऽ अप्पन घटना सुनाबऽ लगलथि आ हम एकटा कागजमे नोट करऽ लगलहुँ । ओना ई बात सुनिकऽ ककरो रोंआ ठाढ़ भऽ जएतै, जे ओ आई हमरा लग बैसिकऽ सुना रहल छथि । हुनक अप्पन ओ दिन जे बाबुजी जुवानीएमे घर परिवारसँ मतलब छोरिकऽ धार्मिक क्रियाकलाप अपनौलथि । आ, तिनु भाईकेँ अपने कष्ट कइयो कऽ पोसि–पाइलकऽ निक बाटपर चलऽके सिखौलथि ।

एक दिनक बात छैक– साँझक समय रहै । पुरा अन्हार नइं भेल रहै तै लालटेमक ईजोत सेहो भकइजोत बुझाइ । भवानीशंकरक माय चारु बेटाक संगे बैसिकऽ भानस बनबैत रहथिन । ताबते हुनक दूनु बटिदार जोगिया आ नगिना ‘मलिकिनी– मलिकिनी’ करैत आंगनमे अएलै । एते साँझक समयमे ई सभ कहियो नइ आबऽबाला आदमीके देखिते भवानीशंकरके बुझऽमे चलि अएलै जे पक्का किछु अनिष्ट भेल । हुनक माय सेहो अचरामे हाथ पोछैत बाहर अएली । ताबते भवानीशंकर पुछिदेलखिन –

‘कि रे जोगिया, कि भेलौ ?....आइ बड़ अबेर धरि एमहर घुमि रहल छे ।’

जोगिया मुड़ी निहुरएने पुछलकै–

‘ बड़का मालिक कहाँ छथिन ?’

बहुत दिन भऽगेल छलनि हुनका आंगन अएला । पुरे गौंआके बुझल छलनि जे ओ मन्दिरे पर रहै छथि । आ, आब सभ किछु हुनक पुजापाठ मात्र छनि नहि कि घर–परिवार । माय भवानी कने रोखाइएकऽ कहलखिन–

‘जँ तोरा बड़के मालिकसँ भेटवाक छौ त जो ........पुरे गौंआके बुझल छैहे जे ओ कतऽ रहै छथि, .....पुछिलीहे ।’

एते बाजिकऽ ओ पित्तसँ थुक धोटऽ लगलथि । ई देखकऽ नगिना कने डेराइएकऽ पुछलकै–

‘आइ मालिक पैतिस बिग्घा खेत ओमप्रकाशक हाथे बेचलेलखिन.........से कि कोनो बिशेष छलैक ।’

ई सुनिते त भवानीक देह पित्तसँ काँपऽ लगलनि । किछु देरक बाद ओ माय पर ताकि कऽ कहलखिन–

‘एखन त हुनका कोनो चिजक कम्मी नहि छलनि.....तैयो एना किए ?’

पुरा घरक भार हुनके पर होबऽके कारणसँ माय आ बाँकी तिनू भाइ सब सेहो हुनका इज्जत करनि । सबहे कातपर निक बिचार कैनिहार भवानीपर घरसँ गाम धरि केओ नाखुस नहि रहै छलैक । तैं माय कहलखिन –

"एखन छोड़ि दिअ, काल्हि भोरे मन्दिरपरसँ बजाकऽ पुछबनि ।’

घरक बात बाहर तक नहि पहुँचे से सोचि ओ दूनु बटिदारके कहलखिन–

"अहूँ दूनुगोटे भोजन कऽ लिअ तखन चलि जाएब ।’

ई सुनिते दूनु पोन्ह झारैत उठल आ नगिना बाजल –

"नइं मलकिनी, हमर भनसिया भानस बना लेने हैतै ...... बल्की अपने हमरो सभके बिदा देलजाए ।’

बिदा हेबऽलेल त ओ कहनहि रहथि, माय सकारात्मक मुरी हिलाकऽ कहलखिन –

"ठिके छै ।’

तखन ओ दूनु ओतऽ सँ बिदा भेल । दूनु बटिदारक गेलाक बादो हुनका पित्तसँ भोजन नहि घोटानि। माय ओ हाथ धोकऽ अप्पन कोठरीमे चलि गेलाह । हँ एते बात तँ हमरो कहवाक अछि जे ओ बाबा–दादा वा बाप बड़ नमहर पापी रहैए जे अप्पन बाल–बच्चाक लेल किछु सम्पत्ति नहि मुदा कर्जा जरुर धऽकऽ जाइए । भवानीके एते अवश्य बुझल छलैक जे लोक दू पाइ केनाकऽ कमाइ छैक । कते मेहनति आ कष्ट कऽकऽ लोक किछु अर्जन करैछ । ओहुना जँ ई बुझल नहि रहितनि त सतरह–अठारह बर्षक समयमे एते केना करऽ सकैत । राति भरि निन्न नइं परलनि हुनका, अप्पन बाबूजीक बारेमे सोचैत–सोचैत । ई आठ घण्टाक समय एकटा जुग बनि गेल रहैक । मुदा समयके अप्पन गती होइ छैक । भोरमे जखन कछमछिया बजलै, ओ कोठरीसँ निकलि सबसँ छोट भाइ बिश्वनाथके जगएलन्हि । हुनकर आवाज सुनिकऽ माय सेहो बाहर निकललीह आ प्रश्न कएलन्हि –

"बौआ, कि बात ? सबेरे जागि गेले......... ? कि आइ निन्न नइ परलौ ?’

ओ मायके बातक कानो जबाब नहि देलकै । ताबते बिश्वनाथ सेहो उठिकऽ अएलै आ, अबिते ओकरा कहलखिन–

"जो कुरुर कऽकऽ आ ।’

माय बुझि गेलीह जे ई एखनो धरि पिताएले अछि । माय ओ भवानीक हाथ पकरिकऽ कहलन्हि–

"चल भन्सा घरमे .......... चाह बनबैछी ।’

बिना किछु बजने ओ माय संगे भन्सा घर गेल । माय चाह बनएलीह।भवानी आ बिश्वनाथकेँ चाह दऽकऽ दोसर कोठरीमे सुतल दूनु बेटा छेदिलाल आ ओमप्रकाशकेँ चाह देबऽ चलि गेलीह । चाह दऽकऽ जखन ओ पुनः भन्साघर अएलीह तँ छोटका चाह पी लेने रहै । ओकरा कहलनि –

"जो रे, मन्दिरपरसँ बाबुके बजाकऽ ला गऽ ।’ ओ बाबुके बजाबऽ लेल प्रस्थान कएलनि । ओ जखन मन्दिरपर पहुँचल तँ देखलक जे बाबुजी पुजामे ब्यस्त छथि । ओ मन्दिरक असोरापर बैसिकऽ हुनक प्रतिक्षा करऽ लागल । कर्रीब दू घण्टाक बाद जखन पुजा समाप्त कऽकऽ ओ बाहर निकललाह तँ छोटकाकेँ देखिकऽ आश्र्यमे परिगेलाह । सबसँ पहिने ओकरे हाथक प्रसाद दैत पुछलन्हि–
"कि बात, केम्हर अएले ?’

ओ प्रसाद मुहँमे धरैत, मुँह लटपटबैत जबाब देलकै –

"अहाँके माय आ बड़का भैया बजौलनि अछि ।’

ई सुनिते ओ प्रसादक थारी दोसर पूजारीक हाथमे दैत कहलाह –

"हम कने देरीसँ आएब ।’

एते कहिकऽ ओ छोटकासंगे बिदा भेलाह । मुदा बाट भरि एक्कहिटा बात सोंचैत गेलाह–

"किए बजौलक ?"

आ, सोचिते–सोचिते कखन आंगन पहुचलाह से हुनका पते नहि चललनि । जखन ओ आंगन पहुँचलाह तखने हुनक कनिञा पुछलिह–

"जमिन बेचऽके कोन प्रयोजन छलैय ?’

ओ कनी हँसिएकऽ कहलाह–

"ओना पैतिसे बिगहा बेचलिययए, जाहिसँ अहाँसभके कोनो प्रकारक कष्ट नहि होबऽ के चाहि ......... हम एहि पाइसँ पाठशाला बनाएब, ...... धर्म कर्ममे खर्च करब ...... भन्सा बनि गेल अछि तँ हमरो दिअ...... भुख लागि गेल अछि ।’

भानसमे कने देर रहै तैँ हुनक कनिञा कहलखिन –

"कनिक देर रुकु तरकारी बरकैछै ।’

फेर, भवानी पिताएले मुद्रामे पुछलखनि –

"आब त अहाँके किछु नहि चाहि जँ चाहि त एखने बाजि लिअ........ किए त बाल–बच्चाके कष्ट देब पाप छैक, धर्म नहि ।’

कनिक देर धरि चुप भऽ ओ फेर कहलनि–

"बाहर कतबो पूजा कऽ लिअ, जँ घरक लोक खुशी नहि अछि त अहाँ धर्म, ....... अँह सोचबे नहि करु ।’

बेटाके पिताएल देखिकऽ ओ कने स्थिरेसँ सफाइ दैत कहलाह–

"हमरालग जे अछि ताहिसँ एकटा बिद्यालयके लेल मकान, एकटा पोखरि आ किछु जगेड़ा कोषमे पाइ धऽकऽ समाप्त भऽ जएतै । हमरा भोजन आ अन्य आवश्यकता पुरा करऽलेल अलगसँ पाई चाही ।’

फेर ओ भवानी दिश ताकिकऽ कहलाह –

"तहूँ अठारह बर्षक भेले ..... जे करबे से कर ।"

हुनका आओर किछुके डर नहि मुदा सम्पति बिकएला बाद होबऽबाला बेइज्जतीसँ डर रहै । माय फेर ओ बाबूजीसँ कहलनि –

"अहाँके भोजन एतहि आबिकऽ करऽपरत । आ, खर्च जते महिनाबारी चाही लऽलेब मुदा जमिन नहि बेचु ।"

ताबते भवानीक माय भोजन लकऽ अएली बाबू भोजन कएलनि आ तौनीमे हाथ पोछैत बिदा भऽगेलाह । हुनका बिदा भेलाक बाद भवानीक माय एकटा माटिके चुकिया बाहर लाबिकऽ फोरली आ पाइ उठाकऽ भवानीके गनऽ लेल कहली । भवानी ओ पाइ गनलकै । पाई अठाहृ हजार तिन सय संतानबे रहै । फेर हुनक माय सोनाके पहूँची आ, करिब एक किलोके कसुली दऽकऽ कहली –

"ई तोरा पूजी देलीयौ ..... तों केना करबे ...... कि करबे तोही जान, ...... तोरासँ छोट तिन भाइ सेहो छौ सेहो बुझिले ।’

मायके बातके ध्यानमे रखैत भवानी ई सोचलक जे एहि क्षेत्रमे कि कएलासँ निक होएत आ करिब एक हप्ता घुमफिर कएलाक बाद एहि क्षेत्रमे कपड़ाक दोकान करब उचित बुझि काज सुरु कएलनि । गामसँ कनिके हटिकऽ नेपाल आ भारतक सिमा छैक । साइकिलसँ समान सिमा पारसँ लाबऽ लगलाह । कनिक–कनिक समान लैनिहारके भंसारपर सेहो केओ किछु नहि कहै । लगनसँ काज करैत गेलाह । हुनक भोर चारि बजे आ राति बारह बजेक बाद होइ छलैक । इमान्दारीसँ ब्यापार करऽके कारण गामक प्रायः सबहे आ अराश–परोशक गामक लोक ओकरे लग समान किनै । समय अप्पन गतिसँ चलैत रहलै । सेकेन्ड मिनटमे, मिनट घण्टामे, घण्टा दिनमे, एवं प्रकारे दिन महिनामे आ महिना सालमे परिबर्तन होबऽलगलै । भवानीसँ छोट भाइसब सेहो नमहर भेलै । माझिल भाइ छेदिलाल ईन्जिनियरिङ्ग पढ़ऽलेल बेङ्गकक गेल । छात्र–बृती भेटलै मतलब पढ़ऽमे निक रहै । साझिल भाइ एम.बि.ए.करऽ दिल्ली गेलै आ छोटका बिद्यार्थीए समयसँ नेतगिरी (राजनिति) करऽ लगलै ।भवानीक बियाह भेलै । निक होनहार लड़िका रहै तैं सबहक नजरिमे गरले रहे । माय बियाह धरि निक इज्जतदार घरमे भेलनि ।एहि क्रममे नेपालमे राजनिति परिबर्तनक समय अएलै । २००७ सालमे प्रजातन्त्रक स्थापनाक लेल एकटा जबरदस्त क्रान्ति एकतन्त्रिय राणाशासनक बिरुद्धमे भेलै । द्वितिय बिश्व युद्धके बाद नेपालमे सेहो एसिया आ अप्रिकामे आएल नवजागरणके प्रभाव पड़लै । नेपाली जनतामे स्वतन्त्रताक अनुभूति भेलै आ ओ सब स्वतन्त्रताक लेल आवाज उठाबऽ लागल । जाहि क्रममे गंगालाल, धर्मभत्त, शुत्रराज आ दशरथचन्द्र सन सपूतके मृत्युदण्ड देल गेलै । जाहिसँ जनतामे सेहो एकटा आक्रोशक भावना जागृत भेलै । २००७ साल कार्तिक ११ गते जखन राजा त्रिभुवन शिकारक बहाना बनाकऽ भारतिय राजदुताबासमे जाकऽशरण लेलखिन आ बादमे भारत निर्वासित सेहो भेलखिन । राजा त्रिभुवनके दिल्ली सवारीसँ प्रजातन्त्रक क्रान्तिमे बल पहुँचलै । भारत सरकार द्वारा राणा आ त्रिभुवन बिच समझौताक बातचित चलाओल गेलै । आ, फागुन ४ गते त्रिभुवनके फिर्ति सवारी । फागुन ७ गते शाही
घोषणासँ देशमे एकटा नया भोर भेलै । तत् पश्चात् राणा शासनके मनोमानी खतम भऽ कानूनपूर्ण राज्यक स्थापना भेलै । देशमे किछु परिवर्तन होइक ताहिसँ भवानीशंकरके कोनो मतलव नहि । अप्पन नियमितता कहियो नहि तोरलक । भगवानक इच्छासँ हुनका पाँचटा बेटा आ एकटा बेटी भेलनि । ओतबे निक ब्यापारी छलैथ ओतबे निक बेटा, ओतबे निक पति, ओतबे निक भाइ आ बहुत निक बाप सेहो ।लोक किछु कऽले मुदा नेपालमे राजनितिक स्थिरता आबऽके त नहि । बि।सं. २०१७ साल पुस महिनाक १ गते राजा महेन्द्रद्वारा कोइरालाक मन्त्रिमण्डलके आ संसदके बिघटन कऽकऽ देशक शासन भार अपनेमे लऽलेलक । ताहिके बाद दलसभ प्रतिबन्धित भऽगेलै । नेतासभक भागा–भाग भेलै । बिरोध कैनिहारके बिभिन्न सजाय भेटलै । जाहिमे बिश्वनाथके दश–पन्दरह गोली लगलै । मुदा ओ बाँचिगेल । एमहर छेदीलाल सेहो जखन इन्जिनियरिङ्ग कऽकऽ आबिगेल त हुनका काठमाण्डूक त्रिभुवन अन्तराष्टिय बिमान स्थलमे नोकरी भऽगेलै । ओ सेहो पूर्ण इमन्दारीसँ काज करऽलगलाह ।


क्रमशः

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  1. प्रिय ब्लॉग प्रेमी बंधूगन....

    मैथिली कथाकारक क्षेत्र मेंs श्री संतोष मिश्राजीक नाम नव नञि अछि ! हिनकर आओर बहुतो कथा सभ प्रकाशित भेल छन्हि ! हुनकर नव प्रस्तुति पोसपुत (मैथिली कथा संग्रह) केs हुनकर सहमती सs मैथिल आर मिथिला ब्लॉग पर प्रकाशित करैत हमरा अपार ख़ुशी केs अनुभूति भो रहल अछि ! एतेक निक कथा संग्रह ब्लॉग पर प्रस्तुत करे हेतु ब्लॉग परिवार हुनकर तहे दिल सँ आभारी छैन ! उम्मीद करैत छलो हुनकर कलम सँ आर बहुत कथा ब्लॉग प्रेमी केs पढ़े लेल मिलतैन......

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  2. bes namgar khissa achhi muda pahil bhag te banhane achhi.

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  3. santosh ji pahine ahan kathmandu se chhi se ee blog me ahank rachna dekhi harshit bhel, rachna seho nik lagal.

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  4. nik, muda lagait achhi bina revision ke ek draft me likhal gel achhi, se kichhu tham tartamya garbara rahal achhi.

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  5. santosh bhaiya, ahank ela se ee blog aar sundar bhe gel, jitu ji blog ke design seho sundar bana delani, rachnak te bharmar laga delani, dunu gote ke dhanyavad

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  6. इंटरनेटपर रंगबिरंगक रचना देखि मैथिलीमे लिखबा के सख हमरो भ गेल। बड्ड नीक संतोषजी, कथामे कसावट कनी चाही मुदा तैयो नीक।

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