<strong>१/५- १-देव दिनेश, २-जय दिवाकर, ३-गणेशगीतम्, ४-शक्तिगीतम्, ५-कृष्णभगिनि गिरिनन्दिनि -कवि चन्द्र/</strong> <em>प्रस्तुति-गजेन्द्र ठाकुर</em> - मिथिला दैनिक

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गुरुवार, 24 जुलाई 2008

१/५- १-देव दिनेश, २-जय दिवाकर, ३-गणेशगीतम्, ४-शक्तिगीतम्, ५-कृष्णभगिनि गिरिनन्दिनि -कवि चन्द्र/ प्रस्तुति-गजेन्द्र ठाकुर


कवि चन्द्र (चन्दा झा)

१.देव दिनेश

पालय पालय देव दिनेश।
कमलज कमलनाथ महेश।
जय जय तिमिर विनाशन दक्ष।
सतत गगन चर सकल समक्ष॥

कृत पङ्कज कुल ललित विकास।
जगदुद्धारक विश्वनिवास॥
जय जय चन्द्र विवधित सत्त्व।
विश्वविलोचन पूर्णमहत्त्व॥

२. जय दिवाकर


जय दिवाकर विश्वलोचन,
पाप-तिमिर समस्त मोचन,
हृत्कमलकुल-मुखविकोचन,
धर्म-रोचन हे॥

अखिल भुवन तुषार नाशन,
वृष्टिदायक सृष्टि-शासन,
गगन कृत टाटा सुख विलासन,
वह्निलोचन हे॥

जय सकल-जन-पालनापर,
सतत निर्जर गगन विस्तर,
विश्व बोध निदान सुखकर,
व्याधिमोचन हे॥

चक्र कातरता निवारक
जय विभो प्रणतार्ति-हारक,
जय सदैव हि विश्वधारक,
दीन शोचन हे॥

३. गणेशगीतम्

भज भज भज गजवदनम्।
गिरिजा-सुत-गुणसदनम्॥
सुकृतरतँ नितमदनम्।
कृत-पातक-तति-कदनम्॥
अहमीडे मृडबालम्।
खर्वं कुक्षिविशालम्॥
सेवक-जनचय-पालम्।
'चन्द्रं' कलाञ्चित-भालम्॥

४.शक्तिगीतम्

रिपुनिधन- कराले बगले! हे॥
कनक-कुण्डले गौरि, सुषमा-विशाले हे।
राकेश-समानने सुजन-चय-पाले हे॥
अधि सुधोदधि मणि, मण्डमुदारे हे।
पीताम्बरे रत्नवेदि, सिंहासनाधारे हे॥
वामेन करेण, क्तजनमन: पूर्ते हे।
आदाय जिह्वाग्रमप्रियस्य रोषमूर्ते हे॥
मुद्गरं विपक्षजिह्वां हस्तेनाऽऽश्रयन्ति हे।
दक्षिणे च कराभिघातैररिं पीडयन्ति हे॥
पीताभरणाञ्चिताङ्गि पालय वदान्ये हे।
चन्द्रकविं किङ्कर-विधीश-वृन्द-मान्ये हे॥

५. कृष्णभगिनि गिरिनन्दिनि

जय जय कृष्णभगिनि गिरिनन्दिनि।
विन्ध्यनिवासि! दुर्जन-खण्डिनि॥
जय जय कंसकरच्युत चरणे।
सततं कृतसेबक- जन- भरणे॥
जय जय महिषासुर संहारिणि।
मत्त-निशुम्भ-शुम्भ-रणमारिणि॥
संकटहारिणि जय शाकम्भरि।
चन्द्रसूर्यनयने विश्वम्भरि॥




नमस्कार। चन्दा झाक पाँच गोट रचना लए हम प्रस्तुत भेल छी। अनुज जीतूक उत्साह/सदाचार/शिष्टाचार हमरा बाध्य कए देलक एहि मंच पर अएबाक लेल। अहाँ लोकनिकेँ जौँ ई रचना सभ नीक लागत, तँ हम आर पुरान मैथिली साहित्य लए कए आयब।-गजेन्द्र ठाकुर