निष्छल प्रेम (मैथिली कविता) : नवल किशोर झा - मिथिला दैनिक

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शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

निष्छल प्रेम (मैथिली कविता) : नवल किशोर झा

एक शांत बसातक प्रेमी हम,
दिल तरपई हुनका लेल हरदम।
बस आश रहैछ स्पर्शक तैं,
छी पात बनल तरू पीपल केर।।
               जौं आहट कनियो पाबी हम,
              भs व्याकुल डोलs लागी हम ।
              मन करै जे हरदम संग रही,
              मुदा तरू शाखा सँ कोना हटी।।
हमरा मन में बस एकहि डर,
सब जानि ने लै ईs गाछ हमर।
कोना मुँह दिखायब टहनी सँ,
जिनका तन पर अछि भार हमर।।
               हिया डोलई आब ने गाबय गीत,
               बस देख अतत्तह अहांक रीत।
               अछि धार बनल हमर लोचन,
               जुनि रोकु आब हे वेग अपन।।                   
नहिं बंधनयुक्त अहाँ कण सँ,
छी मुक्त बनल अहाँ तन सँ।
नहि देखत कियो बरू धीरे आऊ,
हे प्रिय पवन कने सटि केर जाऊ।।
                   मन आतुर भेल अछि प्राण-प्रिय,
                   गाबय लs फेर सँ गान प्रिय।
                   बिनु संग अहां नहिं चाल हमर, 
                   तन स्थिर हाल बेहाल हमर।।
अछि एकहि विनती सुनु समीर,
रहु सिसकति सदिखन पातक भीड़।
कखनहुं तs हमरो सँ मिलबई,
भले अजनबी बनि हमरा तकबई।।

    - नवल किशोर झा
शिवनगर घाट, दरभंगा।