सबहक सब उघारि रहल अछि (कविता) : अशोक झा उर्फ भोली बाबा - मिथिला दैनिक

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मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

सबहक सब उघारि रहल अछि (कविता) : अशोक झा उर्फ भोली बाबा

हम अहिँक छी, कहि कहि सब के
अप्पन काज सुतारि रहल अछि
सबहक सब उघारि रहल अछि

जय मैथिली, जय मैथिल कहि-कहि
सबहक पीठ ससारि रहल अछि
सबहके सब खिहारि रहल अछि

आफद एकटा, पांच टकिया पर
पनसैया नवका चाहि रहल अछि
सबहक़े सब संघारि रहल अछि

सुच्चा मैथिल कहि , हमहिं टा
अप्पन शान बघारि रहल अछि
सबके सब पछारि रहल अछि

दड़िभंगा दिल्ली वा बम्बई
मैथिलीक भीत उखाड़ि रहल अछि
अप्पन चूल्हि पजारि रहल अछि

उपलब्धि एखनहु तक किछु नहि
छिट्टे पथिये बाँटि रहल अछि
मैथिलीक शोणित चाटि रहल अछि

जे .... करबै .. हमहीं टा करबै
सब के सब टिट कारि रहल अछि
अप्पन रूप निखारि रहल अछि

हम छी बाभन तू छैं सोल्हकन
मनुख मनुख्ख के बाँटि रहल अछि
जरि मिथिला राज्यक काटि रहल अछि

थौक् भाव सम्मान 'विभूतिक'
परसि परसि चुचकारि रहल अछि
अप्पन बाट सुधारि रहल अछि

सबहक सब उघारि रहल अछि