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मुंबई। 03 नवम्बर। [जितमोहन झा (जितू)] सामा चकेवा मिथिलाक प्रसिद्ध पाबनि अछि। भाई - बहिनक बीच घनिष्ठ प्रेम दर्शाबै बला आठ दिवसीय एहि पाबनि केँ समापन हर बरख कार्तिक पुर्णिमा क' बड़ा धूमधाम सँ कायल जायत अछि अछि। सामा - चकेवा केँ खिस्सा बहुत  प्रसिद्ध अछि। 

कहल जायत अछि कि सामा भगवान कृष्ण केँ बेटी छलीह। जाहिक वर्णन पुराण सभमे सेहो कायल गेल अछि। कहल जायत अछि कि एक दुष्ट चरित्र बला व्यक्ति सडयंत्र रची सामा पर गलत आरोप लगौलनि कि हुनकर अबैध सम्बन्ध एक तपस्वी संग छल। ओ दुष्ट आदमी ई गप भगवान कृष्ण सँ सेहो कहलनि। कृष्ण क' अप्पन बेटी सामा पर बहुत तामस उठलैन्ह, ओ क्रोध मए आबि सामा क' पक्षी बनबाक श्राप द' देलनि। सामा मनुख सँ पक्षी बैन गेलीह। 

जखन सामा केँ भाई चकेवा क' एहि घटनाक असल कारणक पता चललनि   तेँ हुनका मोन म' अप्पन बहिन सामा केर प्रति सहानुभूति जागलनि। अप्पन बहिन क' पक्षी सँ मनुख रूप म' आनबाक लेल चकेवा तपस्या करब शुरू क' देलनि। हुनकर तपस्या सफल भेलनि। सामा पक्षी रूप सँ पुनः मनुख रूप म' आएब गेली। अप्पन भाई केँ स्नेह आओर त्याग देखि सामा द्रवित भ' गेली। सामा अप्पन भाई केर हाथ म' एक मजबूत रेशम केँ धागा बान्हली, कहल जायत अछि ओहि दिन सँ बहिन सभ अप्पन भाई केर हाथ म' राखी बान्हैत छथि। 


सामा चकेवा पाबनि पर एक नजैर;

छठी पूजा ख़त्म होयते ओहि सांझ सँ युवा महिला सभ अप्पन संगी सहेली सभक टोली बना मैथिली लोकगीत गाबैत अप्पन - अप्पन घर सँ निकलैत छथि। सभक हाथ म' बाँसक बनल डाला म' माटी सँ बनल सामा-चकेवा केर मूर्ति, सतभइया, भम्हरा, बृंदावन, चुगला, ढोलिया बजनिया आओर दोसर मूर्ति सभ रहैत अछि। मिथिलांचल म' जे कियो चुगलखोरी करैत छथि हुनका चुगला कहल जायत अछि। अप्पन मिथिलांचलक लोग सभक एहेन मानव अछि कि चुगले भगवान कृष्ण सँ सामा केर चुगलखोरी केना रहथिन। 

सामा खेलैत घरी मिथिलानी सभ लोक गीत गाबि आपस म' हंसी - मजाक सेहो करैत छथि। भौजी अप्पन ननद आ ननद अप्पन भौजी सँ लोकगीत केर भाषा म' मजाक करैत छथि। अंत म' चुगलखोर चुगला केर मुंह जराओल जायत अछि आओर सभ महिला पुन: लोकगीत गाबैत अप्पन - अप्पन  घर वापस चल जायत छथि। ऐना आठ दिन धरी चलैत रहैत अछि। सामा-चकेवा केर उत्सव मिथिलांचल म' भाई - बहिनक जे सम्बन्ध अछि ओहिके दर्शाबैत अछि। ई उत्सव इयो दर्शाबैत अछि कि सर्दी शुरू होयते हिमालय सँ रंग - बिरंगक पक्षि मिथिलांचल केर मैदानी भाग म' आबैत अछि।  

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