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मिथिला - संस्कृतिक महान पाबनि थिक -मधुश्रावणी, जे साओन मासक कृष्ण - पक्षक पंचमीसँ प्रारम्भ आ शुक्लपक्षक तृतीया तिथिकेँ सम्पन्न होमऽबला मिथिला - संस्कृति व भक्तिक पाबनि मधुश्रावणी एहिबेर आए 14 जुलाइ  (शुक्रदिन) मैना पंचमीक संग शुरू भेल। नवविवाहिता स्त्रीगणकलेल एहि पूजाक विशेष महत्व छनि। नवविवाहिता एकदिन पहिनहि  (चौठ तिथिकेँ) अर्थात 'नहाय-खायदिन' भोरे ब्रह्म मुहूर्तमे पवित्र गंगाजलसँ नहा सूर्यास्तसँ पहिनहि अरबा भोजन कऽ पूजन श्री गणेश करैत छथि।
             
पूजाक महत्व : मधुश्रावणी पूजन अहिबाती स्त्रीगणकलेल बड़ महत्वपूर्ण होइछ। ई विशिष्ट पाबनि पतिक दीर्घायु आ सुख - समृद्धिलेल होइछ। पूजन क्रममे मैना - पंचमी, मंगला - गौरी, पृथ्वी - जन्म, पतिव्रता - कथा, महादेवक कथा, गौरी - तपस्या, शिवबिबाह, गंगा - कथा, सती बिहुला -कथा, शीत - बसन्तक कथादि सहित 14 खंडमे 'कथा - श्रवण' होइत छै। गाम - समाजक वृद्धा वा जानऽबाली महिला कथा - वाचिका द्वारा नवविवाहिता (समूह/एसगरो) केँ कथा सुनबैत छथिन। पूजनक सातम्, आठम् आ नवम् दिन घोरजर, खीर, गुलगुलाक भोग लगैत छै। सभदिन  साँझमे स्त्रीगण सोहागक गीत, कोबर गीत, आरतीसभ गाबि महादेवकेँ मनयबाक, प्रसन्न करबाक प्रयत्न करैत रहैत छथि।    

एहि पाबनिमे नइहर आ सासुर दूनूक सहयोग अपेक्षिते टा नहि अनिवार्य होइत छै। नवविवाहिता सासुरसँ आयल नव वस्त्रादि धारण करैत छथि। पूजाक समापनपर यत्र - तत्र भायक द्वारा हाथ पकड़ि पूजनहारिकेँ उठयबाक प्रथा सेहो अछि; मुदा सभठाम नहि।          

टेमी दागबाक परम्परा : पूजाक अन्तिम दिन पूजनहारिकेँ कठिन' अग्निपरीक्षा' देमऽ पड़ैत छनि जे आन संस्कृतिमे दुर्लभ अछि। टेमी दागऽ केर परम्परामे नवविवाहिताकेँ हाथ - पयर आ ठेहुनपर आरतक पात आ  पान राखि जरैत टेमी  (बाती) सँ दागल जाइत छनि आ 'इस्स ......' नहि बजबाक छनि, एहिसँ हुनक सहनशक्ति आ सतीत्वक परीक्षण होइत छनि।

पूजाक अन्तिम दिन  (टेमीदिन) 14 टा पनपथिया आ एकटा चनाइक डालामे अंकुरी, फल-मधुर, दऽही आदिसँ सजा  14 टा अहिबाती स्त्रीगणकेँ बाँटल जाइत छनि ।

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