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मुम्बई। 04 मार्च। [राजकुमार झा] परिवार बदलि गेल, बाबा-दादा-पूर्वज द्वारा प्रदत्त संस्कार महत्वहीन भऽ गेल, श्रेष्ठक प्रति विचार बदलि गेल आओर सबसँ बेशी महत्वपूर्ण बात जे अर्थक उपार्जनक मदमे सगा-संबंधी केर प्रति अपनत्व व अनुरागक अटूट संबंध व बंधन, खंड-खंडमे बिखंडित भऽ गेल। जाहि संस्कारकें धारण करैत पारिवारिक आओर सामाजिक स्तर पर गौरवक बोध होइत छल, सएह पूँजी वर्तमानक चकाचौंधमे विलुप्त भऽ गेल। हमरालोकनि कल्पना विलासी तथा भोग विलासी बनि हमहीं सत्य बांकी सभ झूठ केर आवरण रूपी धुंधकें धारण करैत यथार्थक वास्तविकतामे विलीन भऽ चुकल छी।

हमर पूर्वज की छलाह, हम किनक संतान छी, खानदानक परम्परा की छल, हुनक पारिवारिक आओर सामाजिक प्रतिष्ठाक संग कोन प्रकार यशोगाथा छल, सभटा मस्तिष्कसँ विलीन भऽ चुकल अछि आ एकांकी बनल जीवनमे स्वप्नवत आनंदक खोज करबामे अपस्यात भेल छी। स्वर्गमे बैसल हमर महान पूर्वज अरण्य रोदन करैत वर्तमानमे अपन संतान द्वारा कयल जा रहल कृत्यकें देखि छटपटा रहल हेताह।

 विवशताक अन्हरगुप्पी समस्त चेतनाकें स्याह व सुस्त बना देने अछि। चूँकि हमरा अपना समाजक श्रेष्ठ प्रबुद्ध ज्ञानीजनक सानिध्य प्राप्त हेबाक सौभाग्य प्राप्त अछि जाहिठाम संस्कार, उत्तम विचार तथा विद्वतजनक कार्यशैलीसँ नव-नव विचारक तरंग तरंगित होइत अछि,हमर महान पूर्वज अभावोमे आनंद एवं प्रसन्नचित्त जीवन निर्वहन करैत कतेक आनंदित छलाह  इएह सभ सोचि विचार व्यक्त कऽ रहल छी। वर्तमान विपरीत भऽ चुकल अछि। नगर-महानगर-उपनगरमे कृत्रिम व बनावटी आनंदकें अर्थक (पैसा) बलें जबर्दस्ती प्राप्त करबाक होड़ लागल अछि।  किनको ककरौसँ आत्मिय संबंध नञि, एकाकी जीवनक पथिक बनि विराट सांस्कृतिक-सामाजिक संबंधकें खंड-खंडमे बिखंडित करबाक पाछां व्यस्त अछि वर्तमान पीढ़ी।

एतदर्थ, इएह कहब जे पूर्वज प्रदत्त संस्कार, मर्यादा व धरोहर वर्तमान पीढ़ीक लेल महत्वहीन भऽ चुकल अछि। मनक व्यथाकें टूटल-फूटल शब्द केर माध्यमें धकमकाइत अभिव्यक्त करबाक साहस कयलौं अछि। वस्तुतः वर्तमान भयावह अछि । जय श्री हरि ।

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