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मुम्बई। 07 मार्च। [राजकुमार झा] मिथिलांचलक संस्कृति व्यापक व गौरवपूर्ण अछि। एहि व्यापकताक सहज प्रस्तुतिक चिंतनधारा वर्तमान समयावधिमे एतेक व्यापक परिलक्षित संभवतः नञि भऽ पाबि रहल अछि जकर प्रयोजन अखुनका समयमे नितांत प्रयोजनीय हेबाक चाही। तखन प्रश्न उठैत अछि - की हमरालोकैन सामाजिक जीवनमे सामर्थ्य आओर आदर्श स्थापित करबाक उद्वेश्यसँ विमुख भऽ जाई ? नञि, एहि प्रकारक चिंतन मैथिल समाजक प्रति पलायनवादी मानसिकता व विकासक प्रति समर्पणक मूल धारणाके बाधित करैत अछि। आवश्यकता अछि जे सभतरि नव ऊर्जाक तरंगकें तरंगित कयल जाय। 

सुस्त पड़ल समाजकें ऊर्जा प्रदान करैत स्फूर्तिक खोराक पिआओल जाय। जन-जागरण अभियानक तहत् एहि कार्यकें संचालित कयल जा सकैत अछि। बेशीसँ बेशी मिथिला-मैथिलक प्रति समर्पित प्रबुद्ध मैथिलजनक मार्गनिर्देशनमे सामाजिक जनान्दोलन चलाओल जाय । काज कठिन अवश्य छैक परन्तु लक्ष्य प्राप्ति हेतु एहि कठिन कार्यकें अवसरमे परिवर्तित कयल जा सकैत अछि । जय श्री हरि ।

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