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पतंगबाजीक हो अवसर 
आ कि छठि के भगदर
मरइए बे कसूरे सब
सूतल अछि नींद मे अफसर
बैसत जाँच लेल कमीटी
निभायत ओहो फार्मलिटी
गमौलक जान जे अप्पन
करत के आन से परतर
बिहारक कर्म मे लीखल
मानवता क्यो नहि सीखल
डूबइ छल नाव गंगा मे
कोनो उपाय नहि कसगर
लागल छल खूब जे मेला
गुड्डिक चलि रहल खेला
व्यवस्था छल नहि कोनो
आयोजनो मे छलै धरफर
हुजुम पहुँचलह छलै दीयरा
होनी बूझल छलै ककरा
दही चूड़ा तँ खैने छल
खिच्चड़ि नहि चिखल रूचिगर
जलक समाधि सब लेलनि
दैव अन्याय ई कयलनि
श्रद्धांजलि अछि मणिक दिस सँ
बहय आँखिक नोर ई गड़गर।।

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