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"अतीतक स्मृति"
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काल्हि हरिमोहन बाबूक पाँच पत्रमे सँ पहिल पत्र प्रस्तुत कयल । दोसर पत्र प्रस्तुत कऽ रहल छी ।
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"हथुआ संस्कृत विद्यालय"
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दिनांक : 01.01.1929
प्रिये,
बहुत दिनपर अहाँक पत्र पाबि आनन्द भेल । अहाँ लिखैत छी जे ननकिरबी आब तुसारी पूजत, से हम अठहत्थी नूआ शीध्र पठा देब । बंगट आब स्कूल जाइत अछि कि नहि ? बदमाशी तँ नहि करैत अछि ? अहाँ लिखैत छी जे छोटकी बच्ची कें दाँत उठि रहल छैक, से ओकर दबाइ वैद्यजीसँ मङ़बाकऽ दऽ देबैक । अहू के एहिबेर गामपर बहुत दुर्बल देखलहुँ जीरकादि पाक बनाकऽ सेवन करू । जड़काला मे देह नहि जुटत तँ दिन-दिन ह्लस्त भेल जाएब । ओहिठाम दूध उठौना करू । कमसँ कम पाओभरि नित्य पिउल करब ।
हम किछु दिनक हेतु अहाँकें एहिठाम मङा लितहुँ । परन्तु एहिठाम डेराक बड्ड असौकर्य । दोसर जे विद्यालयसँ कुल मिला साठि टका मात्र भेटैत अछि । ताहि मे एहिठाम पाँचगोटाक निर्वाह हयब कठिन । तेसर ई जे फेर बूढ़ीलग के रहतनि । इएह सभ विचारिकऽ रहि जाइत छी । नहि तँ अहाँक एतऽ रहने हमरो नीक होइत । दुनू सांझ समयपर सिद्ध भोजन भेटैत बंगटोके पढ़बामे सुभीता होइतैक । छोटकी कनकिरबीसँ मन सेहो बहटैत । परन्तु कयल की जाए ! बड़की ननकिरबी किछु आओर छेटगर भऽ जाए तँ ओकरा बूढ़ीक परिचर्यामे राखि किछु दिनक हेतु अहाँ एतऽ आबि सकैत छी । परन्तु एखन तँ घर छोड़ब अहाँक हेतु संभव नहि । हम फगुआक छुट्टीमे गाम अएबाक यत्न करब । यदि नहि आबि सकब तँ मनीआर्डर द्वारा रूपैया पठा देब ।
पुनश्च : चिट्ठी दोसराकें छोड़क हेतु नहि देबैक अपने हाथ सँ लगाएब । रतिगरे आँचरमे नुकौने जाएब आओर जखन केओ नहि रहैक तँ लेटरबक्सा मे खसा देबैक ।
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