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गामक पुरनका अगहन मास मोन पड़ि रहल अछि । अगहन महिना कृषक लोकनिक व्यस्ततम् महिना एवं आशा-आकांक्षाक महिना । सायंकाल शिवशंकर बाबू (कल्पित नाम) धनुक टोली मे जऽओन अढ़ेबाक हेतु जाकें गर्द करैत कहि रहल छथि - काल्हि फलां-फलां खेत मे धनकटनी हेतैक तैं सभ गोटे कें धान कटबाक लेल चलबाक अछि ।

आई धनकटनी छियैक । मजदूर-वर्ग समूहक संग टोली बनाय हाथ मे 'हांसू' लए शिवशंकर बाबूक खेत मे धान कटबाक लेल बिदा भऽ रहल अछि संगहि शिवशंकर बाबू सेहो धान कटेबाक लेल गामपर सँ खेत दिश बिदा भऽ चुकल छथि ।

धनकटनी प्रारंभ भऽ गेल । मजदूर लोकैन तन्मयतापूर्वक कतारबद्ध भऽ एक-दोसराक संग हास-परिहास करैत अपना धुन मे व्यस्त भऽ धान काटि रहल छथि । शिवशंकर बाबू काटल धानक झट्टा पर गमछा बिछाय बैसल छथि एवं धनकटनीक मनोरम दृश्यक दृष्टावलोकन करैत आनंदित भऽ रहल छथि । एतबहिं मे रामसेबक (धानकटनिहार) शिवशंकर बाबू के आवाज दैत बजला - "मालिक ! तमाकूल खेबैक की ?" शिवशंकर झट सँ बाजि उठला - "हँ-हँ किएक नञि ।" तमाकूल खेलाक उपरांत शिवशंकर बाजि उठला - "की बात छैक अखनधरि रामअवतार (खेते-खेत मुरही-लाय-कचौड़ी बेचनिहार) नञि एला अछि ।" रामसेबक बाजल - "ओ एबे करत । दोसर खेत मे हयत । अहाँ निश्चिंत रहूँ ओ एबे करत ।" शिवशंकर बाबू पुनः धनकटनीक दृश्य अवलोकित करैत मग्न भऽ जाइत छथि ।

किछु कालक उपरांत माथा पर छिट्टा लयने रामअवतारक प्रवेश होइत अछि । समाचारक आदान-प्रदानक उपरांत स्नेहमयी स्वर सँ रामअवतार बाजि उठला - "पान खेबैक ने शिवशंकर बाबू ?" हँ-हँ पान खेबैक आ शिवशंकर बाबू आग्रहपूर्वक लगाओल गेल पान खेबाक लेल तत्पर भऽ गेला । पान खेलाक उपरांत रामअवतार कें छोप्पल धानक आंटी दय शिवशंकर परम संतोषक अनुभव करैत छथि आ रामअवतार दोसर खेत जेबाक लेल प्रस्थान कऽ चुकल अछि । एहि प्रकारक दृश्य कल्पनाक दृश्य नञि अपितु घटित घटनाक दृश्यक वास्तविक चित्रण थिक ।

खेतक धान कटि चुकल अछि । पूबरिया कोलाक कोन मे थोड़ेक धान यथावत् "रखबारक" हिस्सा के छोड़ि सम्पूर्ण खेतक धान कटि चुकल अछि । धानक छोपाई सेहो भऽ गेल । कांच करची एवं केराक पत्ताक डांटक जुन्ना सँ धानक बोझ बन्नहा गेल अछि । मजदूर-वर्गक धिया-पूता एवं स्वयं मजदूर लोकैन छोप्पल धानक झट्टा सँ धानक शीशक लोरहा लोढ़ि चुकल अछि तथा ओहि लोरहा कें आंटी बनाय मालिकक दरबज्जा पर प्रस्थान करबाक लेल तैयार अछि ।

एक-दोसराक सहायता सँ धानक बोझ माथा पर उठाय मजदूर लोकैन झटपट-झटपट गाम परहक लेल बिदा भऽ चुकल छथि आ शिवशंकर बाबू सेहो व्यग्रता सँ गाम पर बोइन देबाक लेल झटकल-झटकल जा रहल छथि । मजदूर लोकनिक झुण्डमय टोलीक दृश्य अति मनभावक व मनोरम अछि । सूर्यास्तक समयक बेलामे माथा पर उठायल धानक बोझ अद्भुत आनंदक दृश्य मे परिवर्तित भऽ चुकल अछि । शिवशंकर बाबू दलान पर पहूँच चुकल छथि । धनकटनीक उपरांत अंतिम प्रक्रिया 'बोइन' देबाक विधान आ 'बोइन' भेटलाक उपरांत मजदूर लोकनिक संतुष्टिक भाव-भंगिमा अत्यधिक विलक्षण अछि । काल्हि पुनः धनकटनी हेतैक । आजुक दृश्य पुनः काल्हिक दृश्य बनत ।

एहि बात के सोचैत मऽन सतत् उदास भऽ उठैत अछि जे उपर्युक्त दृश्यक दृष्टावलोकन किंचित पुनः देखल जा सकैत अछि की ? हम अनुभव करैत छी - "जे हमर गाम हेरा गेल अछि आ हमहूँ गाम सँ हेरा गेल छी ।" जय श्री हरि ।

__राजकुमार झा

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