अभिमानी नहि स्वाभिमानी बनी. - मिथिला दैनिक

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सोमवार, 18 जुलाई 2016

अभिमानी नहि स्वाभिमानी बनी.

"अभिमानी नहि स्वाभिमानी बनी"
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स्वयं कें बुद्धिमान बुझअ वाला व्यक्ति एवं सभ प्रकारक प्रतिभा सँ सम्पन्न हेबाक अभिमान, व्यक्ति कें अहंकारी आ अभिमानी बनवैत अछि । अभिमान एवं अहंकारयुक्त चिंतन घृणित एवं निकृष्ट होइत अछि । जीवनक सीमित अवधि कें व्यर्थ व्यतीत करब एहि धारणा कें निरुपित करैत अछि जे समयक उपयोग कें महत्व नहि देनिहार व्यक्ति, सदैव कष्टमय जीवन व्यतीत करबाक लेल विवश होइत छथि । अर्थक (सम्पत्ति) सम्पन्नता जँ विवेकयुक्त नहि हो, ओहि अर्थ केर महत्व शून्यवत् होइत अछि ।अनैतिक अर्थ संचयन व्यक्तिक बुद्धि आ विवेक कें मंद करैत अछि एवं बुद्धि आ विवेक मंद भेला सँ श्रेष्ठ चिंतनक स्वरुप सर्वथा दुखदायी होइत अछि ।
अनुभवक माध्यम सँ एहि बात कें देखल गेल अछि जे किछु व्यक्ति स्वयं केर समस्या सँ ओतेक दुखी नहिं होइत छथि, जतेक कष्टक अनुभव अन्य व्यक्तिक सम्पन्नता के देखि होइत छनि ।एहि प्रकारक प्रवृति घातक होइत अछि । हमरा समस्याक समाधानक निदान कोन प्रकार सँ हो, एहि बातक चिंतन नहि कय, दोसर व्यक्ति आनंदमय जीवन किएक व्यतीत क' रहल छथि एहि वेदना सँ ग्रसित भ' एवं तनावयुक्त भ' निरर्थक कष्ट मे समय व्यतीत करैत छथि । उपर्युक्त नकारात्मक आचरण सँ मुक्त भ' चिंतनक स्वरुप कें सार्वभौमिक बनावी । जीवनक बहुमूल्य समय कें स्वयं एवं परिवारक श्रेष्ठ संबर्धनक हेतु मर्यादाक आश्रय सँ संकल्पित भ' परिश्रम करबाक कोशीश कयल जेबाक चाही । परिणाम स्वतः आनंददायक एवं चित्त आ चेतना कें प्रासादिक अतिरेक सँ संबर्द्धित करत । महत्वाकांक्षा जँ सदाचारयुक्त हो, आन्तरिक चेतना कें दिव्यता प्रदान करैत अछि । आकांक्षित आनंद आत्म संतुष्टिक आश्रय सँ प्राप्त होइत अछि । मानसिक आनंद शरीर कें आरोग्यता प्रदान करैत अछि । सांसारिक कार्य सम्पादनक हेतु स्वस्थ शरीर वा रोगमुक्त शरीरक हयब नितांत आवश्यक अछि ।
ईश्वर निर्मित मानव तन सर्वश्रेष्ठ सम्पत्ति थिक । एहि दिव्य शरीरक माध्यम सँ मनुष्य लौकिक एवं पारलौकिक कार्य कें निष्ठापूर्वक सम्पादित करैत परमानंद कें प्राप्त करैत छथि । व्यर्थ अमान्य विचार कें तिरस्कृत करैत प्राणी मात्रक कल्याणक कामना वस्तुतः जीवनक सर्वोत्तम संकल्प हेबाक चाही । अनावश्यक तनाव सँ मुक्त हेबाक लेल स्वभाव कें सरल बनावी एवं प्रत्येक प्राणीक प्रति करुणा भाव रखैत जीवन कें सहज बनेवाक यत्न कयल जेबाक चाही । 'अहं' भाव कें त्याग कय, कर्तब्य क पथ कें सूचितापूर्वक सम्पादन कयला सँ आत्म संतुष्टिक भावना प्रबल होइत अछि एवं सदैव आनंदमय जीवनक प्रक्षालन प्रमुदित होइत अछि । तैं विनम्र आचरणक आश्रय सँ सांसारिक श्रेष्ठ कर्तव्यक निर्वहन करैत, सभ प्रकारक अभिमान कें त्याग करैत जीवन कें भव्य बनेवाक कोशीश करी । इत्यलम् । जय श्री हरि । राज कुमार झा ।