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एक अद्वितीय यात्री, आइयो छथि आ रहताह ।

:::::: अशोक झा :::::

मैथिली मे यात्री हिन्दी मे नागार्जुन आ बंगला मे बाबा केर नाम छलनि बैद्यनाथ मिश्र यात्री मुदा चर्चित भेलाह नागार्जुन केर नाम सँ। मैथिली हुनकर आशा आ आकंक्षा केँ पूर नहि क सकल। सत्यक सत्यता यैह अछि। मैथिली साहित्य जगतक नक्षत्र केँ आइ धरि चर्चा तँ हमरा लोकनि करैत छी मुदा वास्तविकता किछु आओर अछि। हिन्दी साहित्य जगत नागार्जुन नाम पर हल्ला मचयलक मुदा हुनका सम्मान मैथिली देलक। हिन्दी राष्ट्रभाषा अछि । हिन्दी के व्यापक क्षेत्र अछि । हिन्दी साहित्य बाबा केँ पेट भरबाक संग ख्याति त देलक मुदा हिन्दी विभाग एक अद्वितीय प्रतिबद्ध जनकवि केँ साहित्य अकादेमी पुरस्कार सँ सम्मानित नहि कयलक । यात्री-नागार्जुन बाबाक नाम सँ जानल गेल, एहि साहित्यिक व्यक्तित्वक मुल्यांकन यात्री जीक ऐतिहासिक मैथिली रचना “पत्रहीन नग्न गाछ”  पुस्तकक साहित्य अकादेमी पुरस्कार सँ पुरष्कृत क मैथिली कयलक । हिन्दी साहित्य जगतक समुद्र मे नागार्जुन, नागार्जुन तँ भेलाह । हुनकर रचनाक  व्यवसाय तँ भेल मुदा वास्तव मे हुनकर मुर्ति जँ केओ बैसयलक तँ फेर मैथिली संस्था मिथिला विकास परिषद कोलकाताक ऐतिहासिक निर्णयक प्रतिफल सँ सपना साकार भेल । यात्री जीक कोलकाता सँ काफी लगाव छलनि । मासो कोलकाताक चौरंगी रोड स्थित जनसंसारक कार्यालय मे यात्री रहैत छलाह । कहबाक लेल वा लिखबाक लेल हिन्दी वा मैथिली साहित्यक गण सब जे बाजथि जे लिखथि मुदा यात्री जीक एहि पांती केँ जाहि पांतीक मादे यात्रीजी लिखने छलाह, नवतुरिया आगू आबथि... एहि पांतीक भावनात्मक अर्थ केँ मूर्ति देलक कोलकाताक युवा संस्था मिथिला विकास परिषद । यात्रीक कोलकाता ख्याति प्राप्त तारा सुन्दरी पार्क मे बाबा यात्री-नागार्जुन जीक मुर्ति स्थापित कयलक । विदित हो जे परिषदक द्वारा यात्रीक मुर्ति स्थापना सँ पहिने भारतवर्ष मे मैथिली वा हिन्दी बंगलाक कोनो संस्था द्वारा नहि बैसाओल गेल छल । यात्री जीक गाम मे सेहो कोलकाताक मूर्ति स्थापनाक पश्चाते हुनक मुर्ति स्थापित भेल, सेहो कोलकाताक मुर्ति स्थापनाक तीन वर्षक बाद । वस्तुत: यात्री जनकवि छलाह । प्रतिबद्धताक पुजारी छलाह । सामान्य लोकक प्रति यात्री-नागार्जुन जीक रचनाक बांहि केँ मैथिली-हिन्दीक कोनो साहित्यकार आइ धरि नहि पकड़ि सकलाह । जाहि युग मे यात्री कलम उठौलनि ओहि समय देश तँ स्वतंत्र छल । मुदा पुंजीवाद द्वारा शोषण आ विषमताक नायक बनल छल । कविताक क्षेत्र मे यात्री-नागार्जुन जीक प्रवेश संघर्षक दौर मे भेल छलनि । यात्री जीक कविताक क्रम केँ जँ डूमिकय देखल जाय तँ स्वातंत्र्योत्तर भारतक राजनीतिक इतिहास यात्री जी सँ इतिहासक आधार पैंच लेबय पड़तनि । भुले स्वाद बेर केँ कविता मे नागार्जुन बखूबी लिखने छथि जे-सीता हुई भुमिगत सखी बनी सुपनखा । यात्री मे मिथिलाक विद्यापति टा ब्याप्त नहि छथि, हुनका मे तँ जनवाणीक छंद आ गढ़ पोखरिक जल सेहो ब्याप्त अछि । एहन सरल व्यक्तित्व कमे देखबा मे अबैत अछि । हिन्दी साहित्यक लेल नागार्जुन बड तपस्या कयलनि । यात्री-नागार्जुन गेलाह नहि, हमरा सभक बीच छथि । आम लोकक बीच ओ आइयो छथि आ रहताह।।


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