कविता - मिथिला दैनिक

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गुरुवार, 5 नवंबर 2015

कविता

राति कारी बीत चुकल, भेल जगतमे उज्जर बिहान।
सूतबै कतेक काल धरि, आब जागि जाउ अहाँ श्रीमान।
चिड़ै चुनमुन नीड़सँ निकसल, गाबि रहल अछि मंगलगान।
लागि रहल अछि सगरो जगतमे आबि गेल जेना नब प्राण।
रंग रंग केर फूल फुलाएल, बढ़ि गेल फुलवारीक शान।
नब प्रकाशसँ दमकै धरनी, सब दिस इजोतक छै गुणगान।
चलू उठू आइ करू प्रतिज्ञा राखब हम मिथिलाक मान।
देशक विकासक संग चलब हम, भारतक माथक छी हम चान।