कविता - मिथिला दैनिक

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शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

कविता

प्राप्ति -
किया रहितो सब किछ,
कुछी के कमी खलैया जिनगी में!
कुछी के पूरा भेला पर
तैयो रैहजैया कुछी कमी जिनगी में!
समटैत आगू, राखैत पाछू,
सबटा छुइट गेल पाछु जिनगी में!
नै कुछी बांचल पाछू तैयो
कियो पाछू छोरलक नै जिनगी में!
आब हमहूँ पाछू -2 घूमी
किनकर घूमी सोचैत छि जिनगी में!
ठईन लई छि जकरे पाछू
कैलह बदनाम भ जाइय जिनगी में!
अपने सोच के पाछू फेर
पुछई छि सभक सहमती जिनगी में!
नीक-बेजाय कुछी कहैया
कुछी खीचैया टांग पाछू जिनगी में!
ककरा की कहियो सब त
अछि अपने चिन्हार पाछू जिनगी में!
सभक दोष अपने शिर ल
कह्बेलहूँ दोषी बरका आए जिनगी में!