रोजगार बनाम कविता - मिथिला दैनिक

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गुरुवार, 22 मई 2014

रोजगार बनाम कविता


एकटा मित्र कहलनि हमरासँ
अहाँ कोन दुनियाँमे रहैत छी
दुनियाँ दारीकेँ छोरि कए
कवितामे किएक रमल रहैत छी
दिनमे फोफ कटै छी
आओर राति कए कविता करै छी
हम कहलयैन रहए दिअ
नहि खोट निकालू कविमे
दुनियाँ दारीमे की राखल
जे राखल कविता रचएमे
किएक तँ बेरोजगारीकेँ एहि भीड़मे
हम अपनाकेँ नहि कतौ पा सकलहुँ
रोजगार तकैत तकैत
कतेको रोजा राखि चुकलहुँ
आखीर अपनो दिमागमे
आएल एक बिचार
रोजगार छोरि कए
करल जए कोनो बेपार
मुदा हाय हमर किस्मत
कतए ओ हमर हिस्सामे
ओ तँ रहैत अछि
लाल हरियर रुपैयाक थाकमे
मुदा हम तँ छी
कंगाली केर टकसाल
एहनेमे बीत गेल
हमर जीवनक पेंतीस साल
साल तँ आएल गेल
मुदा पाबि गेल एकटा खाट छी  
आब ओहिपर दिनमे फोफ कटै छी
आओर राति कए कविता जड़ै छी
एहि द्वारे हम कहैत छी
नहि ‘मनु’ कविकेँ एना बदनाम करू
अहूँ कवित गुण पाबि कए
कविताक धियान धरू
नहि तँ रोजगारकेँ लाइनमे
रोजा केर इन्तजाम करू।
© जगदानन्द झा ‘मनु’