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         मिथिला - पहिने आ आब: एक छोट समीक्षा


       पहिने मिथिलामे नदी सब बान्हल नहि रहैक, एकर पाइन नव-नव पाँक-माइट आ नव अनाज-उत्पत्तिक जोगार संग बेसी रास खेत मे पहुँचि जाय, तहिना सैकडों तरहक मत्स्य (माछ), घोंघा, सितुआ, सिगहार, सेमार, काउछ आ तरह-तरहकेर नव जीवन-आधारक प्रवेशसँ समूचा मिथिलाक पोखैर, डबरा, चभच्चा आदिकेँ भरने रहैत छलैक। लोक गद्दर चाउर सँ लैत बिरनफूल-बासमतीतककेर उत्पादन करैत माछ-काउछ-घोंघीझोर सँ सेहो सन्तुष्टि पबैत छल। सवा कट्ठा एक परिवारक भरण-पोषण लेल काफी होइक। आब ओहि पाइनकेँ बान्हसँ बान्हि सीधा गंगाजी आ फेर सीधा गंगासागर समुद्रमे खसायल जाइछ। पाइनसँ संस्कार बनैत छैक। ई कहबी सुनैत रही - ओ सच भऽ गेलैक अछि। आब सगरो बाहरी कमाईसँ जीवन-निर्वाहक हवा चलि रहल छैक। गाममे रहनिहार बेवकूफ कहाय लागल छैक। आब आध्यात्मिकताक ठामपर भौतिकता सवारी कसैत छैक। आधुनिक मिथिलाक निर्माणमे गंभीर शोध आ बड पैघ परिवर्तनक जरुरत छैक। 
  
      मिथिलामे नदी ऊपर बाँध बनाबय के योजना कोना बनल? उपलब्ध जानकारी आ शोधपत्र सँ ज्ञात होइत अछि जे ब्रिटिश ईन्डिया सरकार मिथिला क्षेत्रकेँ जलमग्न आ बाढिग्रस्त मानैत एक मेगा प्रोजेक्ट तैयार केलक जेकरा लोक 'वैभेल प्रोजेक्ट' केर नामसँ जानैत अछि। लेकिन जाबत एहि परियोजनापर काज शुरु होइत ताबत भारत स्वतंत्र भेल आ भारतीय नेतृत्व स्वराज्य पबैत तात्कालीन राजनीतिक उग्रपाँति (यानि पंजाब ओ बंगाल) सबकेँ तुष्टीकरणमे हत्त-पत्त वैह वैभेल प्रोजेक्ट लेल छूटायल बजेट बिहार मे खर्चा नहि कय भाखडा नांगल ओ दामोदर घाटी परियोजनाकेँ स्वीकृति दैत उपेक्षाक सबसँ पहिल डाँग हमरा लोकनिपर बरसेलक। अफसोस जे एहि तरहक डाँगक प्रतिकार पर्यन्त मिथिलावासी या बिहारवासी नेतृत्त्व पाँति कोनो खास नहि केलनि। जरुर बिहारक पहिल मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण बाबु एहि लेल बिहारक प्रभावशाली नेता डा. राजेन्द्र प्रसादकेँ पत्र लिखलनि, मुदा ताहि समय धरि राजेन्द्र बाबु आर एकटा विशिष्ट समूह सरदार बल्लभभाई पटेलकेर पक्षमे रहबाक चलते संस्थापन पक्ष यानि नेहरुजी सँ दूर रहबाक चलते मात्र अफसोस प्रकट करैत एहि लेल सीधा प्रधानमंत्री नेहरुसँ पत्राचार करबाक अनुरोध करैत बात अन्ठा देलनि। 
  
      लेकिन बात धीरे-धीरे चर्चाक विषय बनल आ ओहि वैभेल परियोजनाक नामपर वगैर कोनो तरहक विशेष शोध या विचार केने भारत सरकार कोसी बाँध परियोजना अनैत लगभग वैह तर्ज सँ आ कोसी प्रोजेक्टकेर स्थापना करैत सब नदीपर बाँध बान्हि लोककेँ फुसलाबैत-बहलाबैत मिथिलाक बर्बादीक एक पटकथा तैयार करैत काज शुरु करौलनि। एम्हर बाँध परियोजनासँ एक सऽ एक ठीकेदार - जमींदार सब अठन्नी अपना लेल अठन्नी काज लेल सूत्रपर ब्रह्मलूट मचौलक आ अन्ततोगत्वा मिथिलाक भविष्य ५६ फाटकवला कोसी बराजक स्वीचपर लटका देल गेल। जँ समीक्षा कैल जाय आ खर्चाक शुरुसँ अन्त धरि जोडल जाय तऽ ई बात स्पष्ट होयत जे आम जनमानसकेर कल्याण मात्र कागज मे आ राजनीति करबा लेल ब्रह्मलूटक एक नीक साधन एहि बाँध परियोजनामे रहल। हम एकर विस्तृत प्रभाव मिथिलाक शनै:-शनै: मृत्युक दिशामे गमनरूपमे सेहो देखैत छी। नहिये पनबिजली, नहिये सिंचाई लेल उपयुक्त नहर, नहिये पोखैर व छोट-छोट नदीकेँ निरन्तर पाइन भेटबाक जोगार, नहिये मत्स्य-मखानक विस्तृत कृषि आ नहिये मिथिलावासीक लेल मिथिलामे कोनो तरहक स्वरोजगारक नव बाट - एतय तक जे पहिले रहल सेहो बर्बाद होइत लोक पलायन करय लेल मजबूर आ आन राज्यमे जाय सस्ता मजदूरी करैत अपन बाल-बच्चाकेँ पोसय लेल मजबूर निरीह मैथिल बिहारी बनि आसाम, पंजाब, बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात आदि राज्यमे माइर-गाइर खाइतो जीवन चलबैत अछि। 

पहिले पलायनक मात्रा न्यून छल, लेकिन जेना-जेना बिहारक सूरज जातिवादिताक भुमडीमे फँसैत गेल, तहिना-तहिना सक्षम व समृद्धवर्ग सेहो गाम छोडि अपन पूँजी समेत मिथिलासँ पलायन करबाक बाट निकालय लगलाह। गाम आरो विपन्न बनि गेल। लोक बोनि-मजदूरी करय लेल पर्यन्त लजाय लागल। खेत - खरिहान सब मशानमे परिणति पाबय लागल। पतझड केर मौसम मिथिलामे अपन कहर बिहारी राजनीतिक कूचाइलसँ चारू कात कनकन शीतलता पसारय लागल। यैह कारण छैक जे २०१३ मे आब मिथिलाक युवा तुरिया सेहो अपन सोराज बिना किछु संभव नहि अछि से सोचि मिथिला राज्य आन्दोलन तीव्र केलक।

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