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भारतमें मिथिला राज्यक आन्दोलन तेज



स्पष्ट अछि जे भारतीय गणराज्यमें मिथिलाकेँ राज्यक दर्जा देबाक माँग स्वतंत्रता वर्ष यानि १९४७ ई. सँ पूर्वहिसँ कैल जा रहल अछि। पूर्वमें बौद्धिक आन्दोलन शान्तिपूर्ण प्रकृतिक आ दस्तावेजीरूप में बेसी भेल अछि। आन्दोलनमें उग्रताक नाम पर मिथिलाकेँ दू भागमें बँटल रहबाक नैतिक विरोध करैत कोनो समय नेपाल-भारत सीमा पाया तोडूबाक आन्दोलन कैल गेल, तहिना प्रधानमंत्री नेहरुकेँ घेरावके उद्देश्यसँ दर्जनों कार्यकर्ता कलकत्ता मार्च करबाक क्रममें आसनसोलमें गिरफ्तार सेहो कैल गेल। तथापि अलग राज्य के मुद्दापर उग्र आ आमजन समर्थित आन्दोलनक कोनो पूर्व प्रकरण नहि भेटैत अछि।

भारतमें राज्य निर्माणक अवधारणा:
अंग्रेजी उपनिवेशी भारतमें सक्रिय एकमात्र राजनीतिक दल भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस १९२० में निर्णय केने छल जे राज्यक संरचना भाषायी आधारपर होयत। तर्क छलैक - सहज प्रशासन आ जाति तथा धर्मके आधार पर बढि रहल पहिचानक विवादमें न्युनता लेल भाषिक पहिचान उचित होयत। यैह राजनीतिक लक्ष्यके संग राजनीतिक दल आगू बढल छल। एहि दलक प्रान्तीय समितिक गठन सेहो १९२० सँ यैह आधार पर कैल गेल। १९२७ में काँग्रेस पुन: अपन प्रतिबद्धताकेँ घोषणा भाषायी आधारपर राज्यक गठन करबाक बात कतेको बेर दोहरेलक। यैह पुनरावृत्ति १९४५-४६ के चुनावी घोषणा-पत्रमें सेहो देल गेल। लेकिन स्वतंत्रताक तुरन्त बाद काँग्रेस दुविधामें पडि गेल जे मात्र भाषाक आधारपर राज्यक गठन देशमें राष्ट्रीय एकताक हितमें नहि होयत। १७ जुन, १९४८ केँ संविधान सभाध्यक्ष डा. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा गठित भाषायी प्रान्तीय आयोग अर्थात् डार आयोग (Linguistic Provinces Commission - aka - Dar Commission) द्वारा देल रिपोर्ट अनुरूप "the formation of provinces on exclusively or even mainly linguistic considerations is not in the larger interests of the Indian nation". कहि भाषायी आधार पर राज्यक गठनकेँ भारत राष्ट्रकेँ हितमें नहि कहि नकारल गेल। भौगोलिक अखण्डता, आर्थिक आत्म-निर्भरता आ प्रशासन संचालनक सहजताके आधार पर राज्यक गठन लेल मद्रास, बम्बइ, केन्द्रीय प्रान्त आ बरार केँ मुख्यरूपमें बनाओल जयबाक सिफारिश कैल गेल। एहि सिफारिश पर अध्ययन लेल 'जेवीपी समिति' (जवाहरलाल नेहरु, सरदार वल्लभभाई पटेल व तत्कालीन काँग्रेस अध्यक्ष पट्टाभी सितारमय्या के संयुक्त समिति) जयपुरक काँग्रेस अधिवेशन द्वारा बनल। १ अप्रील, १९४९ केँ एहि समिति द्वारा ओहि परिस्थितिमें नव प्रान्तक गठन लेल अनुकूलता नहि रहबाक निर्णय देल गेल, लकिन संगहि जनभावना यदि एहि तरहक माँग राखत तऽ प्रजातंत्र के रक्षा हेतु किछु निश्चित सीमामें रहैत भारत लेल समग्र हितकेँ ध्यान में रखैत नव राज्य गठन करबाक बात मानय जायत सेहो कहल गेल।

भीम राव अम्बेदकर एक ज्ञापनपत्र १४ अक्टुबर, १९४८ केँ डार आयोगकेँ देलाह जाहिमें भाषाक आधारपर राज्यक गठन करबाक आ विशेषरूपसँ मराठी-बहुल महराष्ट्र राज्य बम्बइ राजधानी सहित बनेबाक माँग रखलनि। राष्ट्रीय एकता लेल हुनकर सुझाव छलन्हि जे केन्द्र व राज्य दुनू के राजकाजक भाषा एकहि हेबाक चाही। तहिना के इम मुन्शी, गुजराती नेता अम्बेदकरक प्रस्तावकेँ विरोध केलैन - जे एकहि राज्यमें विभिन्न भाषा संग कोनो एकहि भाषाभाषीक राजनीतिक लक्ष्यके पोषणसँ विभेदकारी होयत जेकर समाधान संभव नहि होयत। पुन: १९५२ में तेलगु बाहुल्य क्षेत्रकेँ मद्राससँ पृथक राज्य बनेबाक माँग संग आमरण अनशन केनिहार पोट्टि श्रीरामुलु जिनक मृत्यु १६ दिसम्बर, १९५२ केँ भऽ गेल, परिणामस्वरूप १९५३ में आँध्रा राज्यक स्थापना १९५३ में भेल। आ, एकर प्रभाव-प्रतिक्रिया समस्त राष्ट्रपर भाषायी आधारपर राज्य बनेबाक माँग तेज भऽ गेल। अन्तत: सर्वोच्च अदालतकेर पूर्व जज फजल अली केर अध्यक्षतामें राज्य पुनर्गठन आयोग बनायल गेल। ई आयोग ३० सेप्टेम्बर १९५५ में अपन रिपोर्ट देलक जाहि अनुरूपे “Factors Bearing on Reorganization” अन्तर्गत स्पष्ट कहल गेल जे “it is neither possible nor desirable to reorganise States on the basis of the single test of either language or culture, but that a balanced approach to the whole problem is necessary in the interest of our national unity.“ राष्ट्रीय एकता लेल कोनो एकल भाषा या संस्कृतिक आधारपर राज्यक गठन नहि तऽ संभव अछि नहिये वाँछणीय। यैह आयोगक रिपोर्टके आधार मानि The States Reorganisation Act of 1956 बनाओल गेल, हलाँकि एहिमें आयोगक किछुए सुझाव समेटल जा सकल।

आयोगक अन्य सुझावमें किछु महत्त्वपूर्ण पाँति जे एहि ठाम उल्लेख योग्य बुझैछ:

“We do not regard the linguistic principle as the sole criterion for territorial readjustments, particularly in the areas where the majority commanded by a language group is only marginal”. यैह ओ पाँति मानल जा सकैत अछि जेकर बीज अमैथिल विद्वान् राजनीतिपूर्वक मैथिली विरुद्ध पहिने रोपि चुकल छलाह जेकर खुलाशा डा. अमरनाथ झा द्वारा कैल गेल अछि। मैथिलीकेँ षड्यन्त्रपूर्वक विद्वान् केर भाषा मनबाक, खने हिन्दीक उपभाषा मनबाक, खने मैथिल विद्वान् विद्यापति आ मिथिलाक्षरकेँ बंगालीक रूप मनबाक आदि कतेको षड्यन्त्र कैल गेल।

“We are generally in agreement with this view, but in our opinion, the mere fact that a certain language group has a substantial majority in a certain area should not be the sole deciding factor”. एहि पाँति सँ फेर भारतीयताक विरुद्ध मानू पूर्वाग्रही सोच झलैक रहल अछि, हर क्षेत्रमें एक विशिष्ट भाषा आ संस्कृति रहितो शुरुए सऽ एक परिकल्पना जे मेजरिटी आ माइनारिटी के अलग-अलग भाषारूपी राजनीतिक विभेद जानि-बुझि थोपल गेल बुझैछ।

“It should be mentioned that, owing to my long connection with Bihar, I refrained from taking any part in investigating and deciding the territorial disputes between Bihar and West Bengal, and Bihar and Orissa – S.R.C Chairman, Hon. S. Fazl Ali. एहि पाँति सँ बिहार-बंगाल, बिहार-उडीसा सीमापर टिप्पणी अछि जे आयोग अध्यक्ष अपन अनुभवक आधारकेँ सर्वोपरि मानि अनुसंधानसँ बचबाक बात केने छथि।

मिथिला कतहु सँ एहि चर्चामें नहि पडल अछि। एकर मूल कारण आर जे किछु हो, लेकिन प्रोफेसर अलख निरंजन सिंह आ प्रोफेसर प्रभाकर सिंह द्वारा प्रस्तुत शोध पत्र: Finding Mithila Between India's Centre And Periphery में उद्धृत एक निष्कर्स जे निम्न अछि एहि सँ पूर्ण सहमति आम राय बनैछ:

Sadly Dr. Lakshamn Jha and other leaders of this movement failed to connect the cause of a separate Mithila State with its entire population. Clearly, the language based call for a separate Mithila state did not stand the test of the caste-based pluralism that the region enjoys. Very clearly the Dalit and other communities that have been victim of the age old Hindu orthodoxy and ossified Brahminism distanced themselves from such Maithil identification. But, as discussed in what follows, the failure of the movement did harm the region in some ways. The article connects
Bihar’s present day flood-led destruction and the subsequent migration of people to the industrialised States of the country to the failure of Maithil movement. Thus, instead of seeking to ignite the movement on the urges of Sanskritic-Brahminical elitism, the Maithil leaders should have generated a socialist-linguist movement as the grass-root
level in favour of legitimacy.

उपरोक्त निष्कर्समें स्पष्ट कैल गेल अछि आन्दोलनकेँ आमजनतक पहुँचयसँ रोकल गेल, आन्तरिक वा बाह्य जाहि कारणसँ किऐक नहि हो... मार्गदर्शन सेहो समुचित अछि जे यथार्थक धरातलसँ जोडि जाहि जातीय विविधताक संस्कृति वास्तवमें मिथिला रहल तेकर असलियतकेँ आत्मसात् करैत राज्यक माँग सँ सर्वसाधारणकेँ जोडब आवश्यक अछि। मिथिलामें एखन धरि सामाजिक संगठन, बुद्धिजीवी संगठन या कोनो संघर्ष समिति यथार्थक धरातल सँ एहि मुद्दाकेँ मिथिला क्षेत्रक तथाकथित सीमा धरि नहि जोडि सकल अछि। नहिये एहि दिशामें कोनो राजनीतिक दल द्वारा कहियो कोनो प्रयास भेल - नहिये कोनो एहेन सांस्कृतिक क्षेत्रीय एकता लोक-जुडावकेर द्योतक लोक संस्कृति, पर्व वा परंपरा द्वारा मिथिलाक सांस्कृतिक अखण्डताकेँ कायम राखल जा सकल। सकारात्मक पहल सेहो कोनो तेहेन नहि भऽ सकल जाहि के कारण गंगा उत्तर वा दक्खिन कोनो तरहक आपसी जुडाव के विशालता बनैत।

वर्तमान सुगबुगाहट आ मिथिला राज्यक माँग लेकिन फेर तीव्र भेल जा रहल अछि। एक बेर पूर्वहिके भाँति आँध्र समान तेलंगानाक गठनके बात मिथिला सहित अनेको छोट राज्यक माँगकेँ तीव्रता प्रदान केलक अछि आ फेर दोसर बेर राज्य पुनर्गठन आयोग के स्थापनाक माँग करैत संबोधन करबाक माँग राजनीतिक परिवेशमें उठय लागल अछि। एम्हर पुरान आ नव संस्था सभ आपसी एकता करैतो राज्यक संघर्षकेँ जन-सरोकारक विषय बनाबय लेल व्यग्र देखाइत अछि। सभ सऽ मुख्य दू बात जे परिवर्तन देखय में आयल अछि - मिथिला क्षेत्र के विशालता पर कैल जा रहल अभियानकेँ आम लोक सकारात्मक रूपमें ग्रहण करय लागल अछि आ राज्य केर आवश्यकता उपेक्षा विरुद्ध स्वराज्यक स्थापना थीक सेहो बुझय लागल अछि। संगहि आब संघर्षक क्षेत्रमें नहि केवल विद्वत् बुढ-पुरान लोक टा छथि, वरन् युवा-शक्तिमें अपन संवैधानिक अधिकार प्रति जागृति सेहो प्रसार होवय लागल अछि। लिपि, भाषा, साहित्य, संस्कृति सभ किछु विलोपान्मुख होइत देखि आब राज्यक चिन्ता आम बनब स्वाभाविके छैक। तहिना जाति-पातिमें तोडब आ वोट-बैंक राजनीति टा करब नहि कि असलियतके विकास आनब, एहि सभ सँ पीडा आमजनकेँ होयब सेहो स्पष्ट अछि। स्वराज्य लेल जनयुद्ध तखनहि होइछ जखन ई देखार भऽ जाइछ जे वर्तमान प्रशासन-व्यवस्थापन कथमपि उपेक्षा दूर नहि करत, उलटा विभिन्न तरहक राजनीतिक खेलसँ क्षेत्रीय विशिष्टताके नाश करत। मिथिला राज्यक औचित्य आब जन-सरोकारके रूपमें परिणत भेल जा रहल अछि।
Pravin Narayan Choudhary

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