गजल - मिथिला दैनिक

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मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

गजल


लिखबाक छल गरीबक लचारी गजल
देखू मुदा लिखल हम सुतारी गजल

हम आब बेचि लेलहुँ हँसी ओ खुशी
बाँचत कते समय धरि उधारी गजल

अन्हार आब भगबे करत घरसँ यौ
भगजोगनीक संगे दिबारी गजल

सभ चप उलारकेँ खेलमे मग्न अछि
जनताक टूटि रहलै दिहाड़ी गजल

फरि गेल छै कबइ कवि अपन देशमे
सौंसे सुना रहल बेभिचारी गजल

दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ + ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ + ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ + ह्रस्व-दीर्घ