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शेफालिका वर्मा मैथिलीक अप्रतिम हस्ताक्षर छथि। ओ मैथिली आ हिंदी मे समान रूपें सक्रिय रहल छथि। एतेक धरि जे विदेश मे हुनकर अंग्रेजियो कविता पढ़ाओल जाइत छन्हि। संस्मरण, कथा-संग्रह, गद्यगीत, यात्रा-वृतांत, उपन्यास आ कविता-संग्रहक अतिरिक्त, अनूदित पोथी सेहो प्रकाशित छन्हि। साहित्यिक अवदानक कारणें,हुनका मैथिलीक महादेवी वर्मा कहल जाइत छन्हि। परञ्च,विनम्रता एतेक जे आलोच्य पोथी मे,एक स्थान पर अपना कें “किछु नहि” आ एक आन ठाम ”अनाड़ी” धरि कहि सम्बोधित कएने छथि।


किस्त-किस्त जीवन मे शेफालिकाजीक बाल्यावस्था सं ल' कए प्रौढावस्था धरिक वर्णन अछि। ई कथा छैक एक संस्कारित परिवारक बेटी कें जकर विवाह अत्यन्त धनाढ्य परिवार मे होइत छैक। मुदा पति पुरखाक अरजल पर राज नहि कए, वकालत सन संघर्षमय रस्ता चुनलनि। पति सं प्रोत्साहन पाबि अपनो व्याख्याता पद धरि पहुंचलीह मुदा नौकरी कहियो हुनक प्राथमिकता नहि रहलनि। पति आ परिवार- आ ओहि सं जं थोड़-बहुत समय बांचि जाए,तं साहित्यिक कार्य लेल अवकाश निकालब हुनकर प्राथमिकता मे छलनि। पति देह धुनि कए लागल छलथि काज मे मुदा एहि क्रम मे देहक भीतर जे घटैत छल,से बाद मे प्राणघातक हार्ट अटैक कें रूप मे आगां आयल। आब,वैधव्यक पीड़ा हुनका लेल मर्मांतक छन्हि। कारण,ओ मानैत छलीह जे "जखन अनंत काल धरि कोनो यात्रा पर दुनू गोटे संग रहैछ,तं एक दोसराक गुण सं प्रेरणा ग्रहण करैत आगू बढ़ैत अछि।" 



एहि मूल कथाक मध्य कतेको अनुषंगी प्रसंग सभ छैक जे किस्त-किस्त जीवन कें पठनीय बनेबा मे आ शेफालिकाजीक व्यक्तित्व सं परिचय करएबा मे सहायक छैक। युवतीक रूप मे,विवाह-पूर्वक मनोभाव,अनचिन्हार युवकक प्रतिएं हुनक प्रतिक्रिया,राजनेता लोकनि सं घनिष्ठ सम्पर्क रहितो राजनीति केर नओ-छओ सं स्वयं कें फराक राखब,बेर-कुबेर मे लोक सभहक व्यवहार,शकुन-अपशकुन केर सुयोग-कुयोग,विवाह-दान आ पाबनि-तिहारक रूप-रंग आदि एहन प्रसंग सभ अछि जाहि मे पाठकलोकनि स्वयं एक पात्र बनि रमण करताह। अप्रिय प्रकरण सभहक सेहो क्षेपक रूप मे उल्लेख छैक,जेना-व्यक्तिगत पत्र कें मिथिला मिहिर द्वारा सार्वजनिक करब,जमीनक बांट-बखरा मे उचित अंश नहि भेटब आदि। मुदा, अहू सभहक प्रतिएं हुनका भीतर जे उद्वेग छन्हि,सेहो शिकायतक रूप मे नहि,अपितु आहत भाव प्रकट करबाक प्रयोजन मात्र सं। उनटे,कहैत छथि, “किछु हेरयलौं कहां,खाली भेटबे कएल।” 



बुद्धि पर भावनाक एही प्रश्रय केर कारणें, किस्त-किस्त जीवन मे हुनक अप्पन जीवन बुझू जेना पृष्ठभूमि मे चलैत हुअए आ बाकी सभकें ओ आगां कएने छथि। सुख आ दुखक संगी-छोट सं छोट जाहि पात्रक नाम ओ गिनओने छथि,ओहि मे सं कतेक गोटे के तं अपनो स्मरण नहि हेतन्हि जे हुनकर योगदानक कोनो मोजरि देल जएतैक,मुदा शेफालिका जी कें सभ मोन छन्हि। जेना सम्यक् दृष्टियुक्त व्यक्ति प्रकृतिक प्रतिएं अहोभाव रखैत अछि,तहिना हुनको जीवन कें निरन्तर प्रेममय बनएबाक लेल प्रयत्नशील आ स्थितिक प्रतिएं सहज स्वीकारक भाव रखैत देखैत छी। किएक,तं “संबंधक निर्वाह अपन अहंकारक त्याग थीक।”



आत्मकथा मे,लेखक केर अप्पन जीवन तं रहिते छैक,तत्कालीन समय केर समाज आ संस्कृतिक दृश्य सेहो भेटैत अछि। किस्त-किस्त जीवन पढ़ैत काल, शिक्षकक क्रूरता कें बाल-मन पर प्रभाव, दहेज, अल्पवयस मे आ बेमेल विवाह, स्त्री-शिक्षा, मैथिल, मिथिला आ मैथिलीक स्थिति, मैथिल समाजक मनोभाव, देयादबादक चक्रचालि, छिन्न-भिन्न होइत समाज आ परिवारक अवधारणा सन-सन कतेको आन प्रसंग मिथिलांचल कें लगभग अपन पूर्णता मे व्यक्त करैत, अंतर्मंथन आ विचार-विमर्शक लेल प्रेरित करैत छैक। हमर सभहक मूल संस्कृति की रहल अछि, बदलैत समयक संग कोन ठाम परिवर्तन अपेक्षित अछि, आ की-की परिवर्तन अपना सभ मे आयल अछि सेहो एहि मे द्रष्टव्य अछि। मुदा एहि क्रम मे,ओ कतहु उपदेशक केर भूमिका मे नहि छथि। बस,एतबे टा आग्रह जे, “जिनगी जीवा लेल आगां बढ़ए पड़ैत छैक मुदा जिनगी कें बुझबा लेल पाछू ताकए पड़ैत छैक।”



आत्मकथा मे, अप्पन मोनक कमज़ोरी आ कमी अनिवार्य रूप सं प्रकट होइत छैक। तें,आत्मकथा लिखबाक परम्परा बहुत सुदृढ़ नहिं छैक। स्त्री आत्मकथा तं आओर दुर्लभ चीज बुझू। जखन हिंदीये मे स्त्री आत्मकथाक अभाव अछि,तं मैथिलीक गप्पे कोन! मैथिली मे,आत्मकथा साते-आठ टा छैक जाहि मे सं हरिमोहन बाबू केर जीवन-यात्रा आ सुमन जी कें मोन पड़ैत अछि बेसी उल्लेखनीय अछि। पछिला बरख गोविंद झा जीक जनम अवधि हम आयल अछि। आखिर,केओ आत्मकथा किएक लिखैत अछि अथवा ककरो आत्मकथा हम किएक पढ़ी? बीतल समय कें तं चाहियो कए घुराओल नहि जा सकैछ,तखन ओकरा शब्दबद्ध करबाक कोन काज? आ जं केओ करबो करथि,तं ओहि सं आन कें की?



जीवन बहुत शक्ति आ संभावना नेने रहैत छैक। ओहि सं स्वयं केर आ परिवेशक प्रतिएं एक तरहक समझ पैदा होइत छैक जकर सदुपयोग कए व्यक्तिक जीवन मे आमूल परिवर्तन आबि सकैत छैक। जीवन मे जखन एहन किछु द्रष्टव्य हुअए जे अनुभूति तं व्यक्ति विशेष कें छैक,मुदा ओहि सं समष्टि केर अनुभव व्यक्त होइत हुअए अथवा समष्टि कें कोनो दिशा-निर्देश भेटि सकए,तं ओ अनुभव व्यष्टिगत नहि रहि जाइत छैक। लेखक चाहए,तं अप्पन अनुभव कें गुप्त सेहो राखि सकैत छैक,मुदा ओ ओकरा सार्वजनिक करैत छैक किएक तं ओहि मे एहन बहुत किछु छैक जे आनक लेल कल्याणकारी भ’सकैत छैक। दोसर, पुरुखक आत्मकथा सं स्त्रीक आत्मकथा फराक होइत छैक। स्त्रीक व्यक्तिगत कें ओकर आत्मकथा मात्र सं बूझल जा सकैत छैक। पुरुष आत्मकथा समाधानक खोज करैत छैक,मुदा स्त्री अपन अस्तित्वक खोज आर अपन भाव आ निजता कें व्यक्त करबाक लेल आत्मकथा लिखैत छैक। 



आ शेफालिका जी एकरा व्यक्त कएने छथि प्रेम आ स्नेहक शाश्वत मूल्य सं। एहि लेल ओ जे शैली अपनओने छथि,ओहि सं पाठक आत्मीयता महसूस करै छै। शेफालिका जी स्वयं कहैत छथि जे बौद्धिक स्त्री सं बढि खतरनाक प्राणी केओ नहि होइत अछि। तें, एहि मे,ने तं किछु बतएबाक हड़बड़ी छैक,आ ने पुरुष समाजक प्रतिएं कोनो तरहक भड़ास। अप्पन उपलब्धि सभहक अभिव्यक्ति मे ओ संयत छथि आर ऐकान्तिक क्षणक अभिव्यक्ति मे अत्यन्त संक्षिप्त आ मर्यादित। 


छोटको प्रसंग सभ भीतर पैसिकए मारि करैत छैक आ स्वयं के तकबाक आ आन पर अप्पन प्रभाव कें जनबाक अवसर प्रदान करैत छैक। एहि सं, अपनो भीतर एकटा अंतर्दृष्टि पैदा होइत छैक। नैतिकतापूर्ण जीवन सं केना मानवीय संबंध गरिमामय बनत,बुद्धि आर करूणा केर आदर्श समन्वय की होइत छैक आ आशा-निराशाक मध्य संभावनाक द्वार केना खुजै छै,से किस्त-किस्त जीवन बतबैत छैक। एही सभ तत्वक कारणें अनकरो आत्मकथा अप्पन सन बुझाइत छैक आ तें शेफालिका जीक ई कृति सामान्यो पाठक लेल ओतबे उपयोगी,जतेक साहित्यकार लोकनिक लेल।



किस्त-किस्त जीवन स्त्री-विमर्शक एक एहन अवसर प्रदान करैत अछि जकर केंद्र मे "देह" नहि छैक। एहि मे व्यक्त जीवन-दृष्टि व्यक्तिगत,पारिवारिक आ व्यावसायिक जीवन केर आदर्श समन्वय अछि;सफलता जकर एक पड़ाव मात्र छैक। आइ-काल्हि प्रायः, माए-बाप आ स्वयं बेटियो सभ कें,हकन कनैत देखैत छी जे हमर बेटी एना छल,ओना छल आ कि हम अपने की-की करैत छलहुं कुमारि रहति,मुदा बियाह होइते परिवार मे ओझरा कए रहि गेलहुं,सब खत्तम भ गेल। परञ्च,केना अपन भीतर कें बचा कए राखी आ समय के प्रबंधन करैत अपन योग्यता कें नव दिशा दी,घर-द्वार कें सम्हारैत कोना समाज़ मे सेहो योगदान कएल जाए,से सिखबाक लेल ई आत्मकथा-खासकए महिलालोकनिक वास्ते- एक आंदोलन छैक।

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