गजल - भास्कर झा - मिथिला दैनिक

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गुरुवार, 6 सितंबर 2012

गजल - भास्कर झा


किछु लोक किछुके हरकाबए पर लागल छै
विरोधक आईग में झरकाबए पर लागल छै।

जिनका जे नीक लागय सब बड्ड नीक करैया
जाति-पातिक नामसं भरकाबए पर लागल छै।

नवतुरियाक उमंग देखि मिथिला-मन गवैया
एहन सुन्नर तानके कनाबय पर लागल छै।

गीत-गजलक छंद मुक्तक हायकू काव्यक अंग
सर्जन सुन्नर बारीघर खसाबए पर लागल छै।

अलभ्य लाभके लोभमें पड़ल करय आगू पाछू
भेटल जीनगीके अहिना सड़ाबए पर लागल छै।

------------------भास्कर झा 6 अगस्त 2012