गजल-६१@प्रभात राय भट्ट



गजल-६१
आजुक दुनियाँ में मोल नै रहिगेलै इन्सान के
देखू जग में रावनराज आबिगेलै सैतान के

जीवन कष्टकर भगेल छै जग में इन्सान के
सता शाशन कुर्सी हाथ चलीगेलै सैतान के

बाहुबली सभ निर्बल के सोनितपान करै छै
गाम शहर सगरो दम्भ मचीगेलै सैतान के

रक्तरंजीत भेल छै माए बहिन केर आँचर
इन्सान केर खून सं हाथ रंगीगेलै सैतान के

चौक चौराहा गली गली में जुवा भठ्ठी केर अड़ा
चौक चौक बार रेस्टुरेंट फूजीगेलै सैतान के

चरस गाँजा हफिमक बाजार सेहो गरम छै
बाल किशोर सभ शिकार बनिगेलै सैतान के

वर्ण-१८
रचनाकार-प्रभात राय भट्ट

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