कविता - मोनक व्यथा - मिथिला दैनिक

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मंगलवार, 3 जुलाई 2012

कविता - मोनक व्यथा


किनका कहियौन  पतिएताकेँ
हमर मोनक व्यथा बुझताकेँ 

बंद पिंजराकेँ चीडै जेकाँ
दिन भरि हम फरफराईत छी 
जुनि बुझु हम नारी मिथिलाकेँ 
हम तँ   मकड जालमे ओझरेल छी 

दुनियाँकेँ तँ  बात नहि  पुछू 
कोना की केलक व्यबहार यौ 
जननीकेँ गर्भमे अबिते देखू 
बिधाता मुनलैन्ह केबार यौ 

मए  बाबू हमरे दूखसँ 
पिचा गेला जीवनक पहाड़मे 
नैन्हेंटासँ पैन्ख गेल काटल
उडियो नहि  पएलहुँ  संसारमे 

बाबूकेँ आँगुर छोडियो नहि   पएलहुँ   
पतीकेँ हाथ धराए गएलहुँ 
नहि  किछु बुझलहुँ  रीत  दुनियाँकेँ 
अपन किएक सभ बिसराए गएलहुँ  

नव  घर आँगन नव समाजमे
जल्दी कियो कोना अपनेता
दोख नहि  किछु हुनको छनि लेकिन 
हमरा किएक कियो बुझता 

घरसँ कहियो नहि  बाहर निकललहुँ  
ऊँच -नीचकेँ ज्ञान नहि  पएलहुँ  
अर्जित  छल नहि  बुद्धि-बिद्या किछु 
नैन्हेंटामे सासूर हम एलहुँ  

कोन अपराध जन्मेसँ कएलहुँ  
बाबू अहाँ अपन संग नहि  रखलहुँ  
नहि  पतिएलहुँ  हमरोमे जीवन 
मोटरी बुझि क ' दूर भगएलहुँ