चाह पीबू। (हास्य कविता) - मिथिला दैनिक

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बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

चाह पीबू। (हास्य कविता)




     चाह पीबू।
        (हास्य कविता)

हरबड़ी मे जुनि ठोर पकाउ यौ नेता जी
दिल्लीक कुर्सी भेटल सूखचेन स अहाँ बैसू
आउ हम बेना डोला दैत छी
फूकी फूकी अहाँ गरम-गरम चाह पीबू।।

भूखे मरि रहल अछि जनता मरअ दियौअ ओकरा
नहि कोनो चिन्ता अहाँ के कोन अछि बेगरता
संसद के कुर्सी पर बैसल अराम अहाँ करू
करिक्का रूपैया स बैंक बैलेंस अहाँ भरू।।

मूर्ती बनबै स रथ यात्रा करै लेल पाई अछि
मुदा रोटी रोजगार हेतू एक्को टा पाई नहि अछि
फुसयाँहीक चुनावी घोषणा पर घोषणा टा करू
कुर्सी भेटल त घोटाला पर महाघोटाला टा करू।।

बाजि गेल चुनावी पीपही
राजनैतिक गठजोड़ जल्दी अहाँ करू
जुनि पछुआउ सियासी कुर्सी अहाँ ताकू
फेर पाँच साल जनता के बेकूफ बनाएल करू।।

दुनियाक सभ स नमहर लोकतंत्र
बनि गेल वोट बैंकक भेड़तंत्र
सम्प्रदायिकता के आगि मे जनता के झरकाउ
कुर्सी हथियाबै लेल रचू कोनो नबका षड्यंत्र।।

पहिने कुर्सी फेर मंत्रालय कोना भेटत
सभटा छल प्रपंच अखने अहाँ करू
हे यौ लोकप्रिय भलमानुष जनप्रतिनिधी
संसदो मे अहाँ खूम मुक्कम मुक्की करू।।

कुर्सीक खातिर देशक संसाधन बेचलहुँ
बाँचल खूचल सेहो एक दिन अहाँ बेचू
जनता भूखे मरि गेल ओ बिलैटि गेल
मुदा साले साल राजनैतिक रोटी अहाँ सेकू।।

मँहगाइ भूखमरी कोनो समाधान ने कराउ
कृषि मंत्रालय मे राखल अन्न अहाँ सड़ाउ
संसद के कैंटीन में सरकारी सब्सिडी लगाउ
चिकन कोरमा शाही पनीर भरिपेट अहाँ खाउ।।

घोटाला पर महाघोटाल सभ केलहुँ
तइयो ने पेट अहाँ के भरल
मिठ बोली बाजि जनता के ठकलहुँ
एक्को दिन भूखले पेट होएत अहाँ के रहल

कतेको लोक भूखले मरि गेल बेकार भेल अछि किएक
संसद भवन स एक दिन बाहर निकलि अहाँ त देखू
की भा परैत छैक एक्के दिन मे बुझिए जेबैए
बिना किछ खेन्ने एक दिन भूखले रहि के अहाँ देखू।।

मुदा कोनो चिन्ता नहि आब कुर्सी भेटिए गेल
संसद भवन मे सूखचेन स अहाँ बैसू
कारीगर बेना डोला दैत अछि
फूकी फूकी  अहाँ गरम-गरम चाह पीबू।।


 लेखक:- किशन कारीगर