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मुश्किल स भरल या रस्ता देखु, 
समय स दुश्मनी के अशर देखु
 
हुनका याद में राईत भैर जगलो हम,
सुतल छथि ओ घर में बेखबर देखु
 
दर्द पलक के निचा उभैर रहलैन, 
नदी में उठल कने लहर त देखु
 
के जाने छथि कैल रही या नै रही,
आए छी त कने हम्हरो दिश देखु
 
होश के बात करेत छलो उम्र भरी, 
"मोहन जी" बेहोश छथि एक नैजैर देखु
 

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