0

पूष मास, जाड़ अपन चरम सीमापर । लगातार पन्द्रह दिनसँ शितलहरी । गामक एकटा टूटल- फूटल खोपड़ीक असोरा । जाड़सँ बचैक हेतु असोराकेँ बाँकी दुनूकात बोड़ाक ओहाड़ । एकटा पुरान टूटल-फूटल चौकीपर पुआरक ओछैन, ओहिपर करीब सत्तैर बरखक बेमार असहाय कमलू  । माए-बाबू बड्ड सिनेहसँ ओकर नाम कमल रखने रहथि, मुदा अभाब आ गरीबीसँ संघर्ष करैत -करैत कमलसँ कमलूमे बदैल गेल ।
गरीबी आ बुढ़ापा ओहिपर बीमारीसँ सताएल जीर्ण-शीर्ण शरीर, अभाबक कारण अप्पन बएससँ दस बरखक बेसीएक लगैत । उपरसँ जाड़क एहन हाल । जाड़सँ कपैत लगातार खोंखी करैत । खाँसैत-खाँसैत कखनो बिचमे राहत भेटै छै तँ मुहसँ, कहु तँ करेजासँ दर्दक थकान संगे दुख मिलल आह ओकर मुहसँ निकलैत । ओहि आहसँ किन्चीत एक बेर पाथरो पिघैल जाए, मुदा कमलूक आह सुनै बला ओकर दर्दकेँ बुझै बला ओहिठाम कियोक नहि । नै कियो देखभाल करै बला आ नै कियो पुछै बला । मुदा कमलूक आह आ खोंखीकेँ शाइद एहि बातक ज्ञान नहि, तैँ तँ ओ रुकैक नाम नहि लए रहल छलै । खोंखी आओर बेसी असहनीय आ विभत्स्यए भेलजा रहल छलै ।।
खोंखीक बेगकेँ सम्हारैमे असमर्थ, कमलू एकाएक अपन सम्पूर्ण बलकेँ एकठ्ठा करैत अपन दुनू हाथसँ छातीकेँ कैस कए दबाबैत बैस रहल, कि तहने ओकरा पानिक तलब महसुश भेलै । आ ओकर मुहसँ अनायास निकैल परलै -"पानि -पानि "
मुदा ! अभागा कमलू ! असहाय कमलू ! ओहिठाम ओकर बास्ते एक घूँट पानि दै बला कियोक नहि । ई  बिचार कमलूकेँ मोनमे अबैत देरी ओकर मुँहपर दर्द भरल व्यंगक एकटा मुस्की चमैक गेलैक । जेना ओ अपन वाक्यपर पचता रहल हुए । अपन दर्दकेँ ठोरपर अनि दाँतसँ कटैत, लाठीक सहारा लैत चौकीक निच्चा राखाल पानिक लोटा लेबक लेल झुकल । बहुत संघर्सकेँ बाद लोटा उठाबैत जल्दी-जल्दी दू घोंट पानि अपन हलकमे उतारि लेलक । परञ्च पानि पीबैक बाद ओकरा लग एतेक बल नहि रहलै जे ओ लोटाकेँ फेरसँ नीँचा राखि सकै । लोटा ओकर हाथसँ छूति कए गुरैक गेलैक । लोटाक बचल पानि चारू कात नीच्चाँ बहि कए मानु कमलूक तकदीर आ एकाकीपर ठहाका लगाकए हँसैत होए ।

कमलु सेहो अपने खाली लोटा जकाँ चौकीपर पसैर जाइत अछि । परला बाद ओकर दहिना हाथ ओकर दुनू आँखिकेँ झैंप दै छैक । जेना अपन आँखिकेँ झाँपिक नोर नुकाबैक प्रयास कए रहल हुए । मुदा निर्लज्य नोर छैक की रुकैक केँ नामे नहि लए रहल छैक । आ ई नोर छैक, ओकर बुढ़ाड़ीकेँ ?
ओकर बीमारीकेँ ?
ओकर भूख-प्यासकेँ ?
नहि नहि नहि ।
तँ ई नोर किएक ?
केकरा लेल ?
ई नोर छैक ओकर मनोरथक हत्याकेँ । ई नोर छैक ओकर छिरयाइत सपनाकेँ, जेकरा की ओ अपन सोनीतसँ पटेने रहए ।

ओकर नोर छैक की रुकैक नाम नहि लए रहल छैक । मुदा मोन स्वप्नील दुनियाँक इन्द्रधनुषी अतीतमे हिलकोर मारै लगलै ।
जखन ओ उनैस बीस बरखक जबान सुन्नर युबक रहए । माए बड्ड मनोरथसँ ओकर ब्याह रचेने रहथिन । बाबू तँ कखन एहि दुनियाँसँ गेलखिन ओकरा मोनो नहि । बाबूक सभटा भार माए उठेलखिन । केखनो ओकरा बाबूक कमी नहि होबए देलखिन । ब्याह भेलै । घरमे एकता सुधड़ कनियाँ एलखिन । समय खुशी-खुशी बीतै लगलै । मुदा ब्याहक पाँच बर्ख बादो ओकर घर नेनाक जन्म नहि भेलै । कमलू दुनू व्यक्तिक तँ जे हाल, ओकर माएकेँ तँ नेनाक अभाबमे दिन काटब मुश्किल भए गेलनि । फेर शुरू भेल कोबला-पातिरक दौड़ । माँ भगवतीक मंदिरमे पातैर राखल गेल । भगवान सत्यनारायणक कथाक कोबला राखल गेल । भगवतीक इच्छासँ ओहो दिन आएल । कमलूक कनियाँ गर्भवती भेली आ नियत समयपर एकटा सुन्नर बालकक जन्म भेलै । सून घरमे बसन्तक आगमन भए गेलै । कमलु माएक तँ खुशीक मारे धरतीपर पएर नहि टिकैत छलनि । छठिहार दिन समूचा गाम माछ भात खूएल गेल । सत्यनारायण भगवानक कथा कराएल गेल । माँ भगवती घरमे पातैर देल गेल । बच्चाक नाम राखल गेल, राज ! राज कमल । सम्पूर्ण वातावरण खुशीसँ गमकए लागल । जे आबए कमलूकेँ बधाइ दइत । आखिर दे किएक नहि ? सात बर्खक बाद जे बाप बनल रहए ।

माँ भगवतीक माया जखन नहि देबक रहनि नहि देलखिन । देबए लगलखिन तँ एककेँ बाद एकटा, कमलू चारिटा पुत्रक पिता बनल । घर गृहस्थी खुशी-खुशी चलए लगलै । एहि बीच कमलूक नोकरी सेहो लागि गेलै । आर्थिक चिन्ताक समाधान सेहो भए गेलै । चारू बेटाकेँ यथासामर्थ नीकसँ शिक्षा दिएलक । समयकेँ काल चक्रमे, कमलूक माए अपन जीवनक सम्पूर्ण सुख भोगि स्वर्ग चलि गेली ।
देखतए-देखतए कमलूक चारू पुत्र युवा भेल । ओकरो सभहक घर बसबक समय आबि गेल । नीक लोक-बेद देख कए चारू बेटाक ब्याह केलक । कमलुक घर पोता-पोतीसँ भरि गेल । भरल-पुरल घर देखब शाइद नीयतिकेँ मंजूर नहि । अथबा कमलूक भागमे एहिसँ आगाँक सुख भोगब नहि लिखल रहै । आथिक युग आ परिबारक बोझसँ लदल, कमलूक चारू बेटा एक एक कए रोजी रोजगारक खोजमे ओकरा लगसँ दूर होति गेलै । चारू बेटा अपन-अपन परिबारक संगे शहरमे बसि गेल । रहि गेल कमलू आ ओकर संग देबैक लेल ओकर अर्धांगिनी, पत्नी ओकर चारू पुत्रक माए । जेना-तेना दुनू प्राणीक जीवन चलैत रहए । परञ्च केखन तक ? जेना भोरक बाद साँझ होइत छैक, प्रतेक शुरुआतक अन्त होइत छैक, ओनाहिते प्रतेक जीवनक मृत्यु । कमलूक कनियाँ सेहो जीवनसँ लडैत लडैत कमलुक संग नै दए पेली आ एक दिन कमलूकेँ छोरि स्वर्ग लोक चलि गेली । आब कमलु निदान्त असगर रहि गेल ।
आधा तँ कमलु ओहि दिन मरि गेल । बाँकी जीवन जे शेष रहै ओहिसँ निकैल कए अपन अतीतमे हरा गेल छल । मुदा नै जनि कखन ओ अपन अतीतक दुनियाँसँ नीकैल गेल रहए । अथबा कखन निकालि देल गेल रहए, बिधाताक हाथसँ । नोर सुखा कए ओकर गालपर पपड़ी जैम गेल रहै । दुनू आँखि खुजल । ओहे खुजल आँखिसँ अपन अतीतकेँ निहाईर रहल छल, कमलू । आओर ओहे खुजल आँखि आब शाइद केकरो बाट देख रहल छैक । शाइद अपन बेटा सभक ।
अगिला भोरे, गामक किछु लोक एकटा अर्थीकेँ उठेने जा रहल छलै ।
"राम नाम सत्य छै, सभक इहे गत छै ।"
"राम नाम सत्य छै, सभक इहे गत छै ।"
रस्तामे एककात ठार एकटा शहरी युबक, जेकी अर्थी देख कए रुकि गेल रहए । लग एला बाद ओहिमे सँ केकरोसँ पूछैत छै - "के छथि भाई "
ओकर उत्तरमे गामक एकटा लोक बजैत छथि, जे की ओहि शहरी युबककेँ नहि चिन्हैत छथि - "छथि कतए, कहियौंह छलथि । छलथि हमरे गामक एकता अभागल, चारि-चारिटा बेटाक बाप रहितो, असगर । बेचारा ! अभाब एवं बेमारीसँ असगरे लडैत-लडैत मरि गेला । आब मुखाग्नीयो देबैक हेतु अप्पन कियोक नहि, सभ अपने-अपनेमे व्यस्त । कमलू नाम छलनि हिनकर ।"
"कमलू"
कमलू नाम सुनैत देरी ओ शहरी युबक जोर-जोरसँ दहाड़ि मारि-मारि कए कनए लागल । ओकर कनैक कोनो पार नहि । ओकर करून रुदनमे एतेक दर्द रहै कि ओकरासँ सभकेँ सहानुभूति भए गेलै ।
"किए भाई अपने किएक एतेक कानै लगलौं ।"
"अरे ! हम अभागल नहि कानब तँ आओर के कानत ।" ई कहैत ओ अपन जेबीसँ एकटा टेलीग्राम निकाइल कए देखेलकै जे कोनो ग्रामीण द्वारा कमलूक बेटा राजकमलकेँ कमलूक बीमारीक खबर लेल लिखल गेल रहै ।


*****
जगदानन्द झा 'मनु'

मो० 09212461006



  


मिथिला दैनिक क' समाचार ईमेल द्वारा प्राप्त करि :

Delivered by Mithila Dainik

मिथिला दैनिक (पहिने मैथिल आर मिथिला) टीमकेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, पाठक लोकनि एहि जालवृत्तकेँ मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय आ सर्वग्राह्य जालवृत्तक स्थान पर बैसेने अछि। अहाँ अपन सुझाव संगहि एहि जालवृत्त पर प्रकाशित करबाक लेल अपन रचना ई-पत्र द्वारा mithiladainik@gmail.com पर सेहो पठा सकैत छी।

 
#zbwid-2f8a1035