गजल - मिथिला दैनिक

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बुधवार, 28 सितंबर 2011

गजल

मनुख जरैए गाम कनैए हमरा की/
चद्दरि तनने फोंफ कटैए हमरा की



बान्हक कातमे घर बनेने बाट जोही/
बाट बिसरि कऽ नै बिलमैए हमरा की



सुन्दर सपना रातुक, देखल बिसरी/
सपना सच नै भेल लगैए, हमरा की


चलू चलै छी नव देशमे घृणा जतऽ नै/
अप्पन देश बिलटि जँ गेलै, हमरा की


गारि देबाले बिर्त देलक हम नै लेलौं/
ऐरावत लेत प्रेम, नै दैए हमरा की