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जीवन सपना
- बृषेश चन्द्र लाल

किछु सपना एहन होइत अछि
ने छोडैत अछि ने जोडैत अछि ।
निन्नमे आबि मुदा देखू
नव आश जीवनमे कोरैत अछि ।।

जौं टुटि जाइछ जीवनधारा
सपने जीवनकेँ ढोइत अछि ।
कहुँ लोरीसँ कहुँ होरीसँ
जीवनकेँ सपना धोइत अछि ।।

मगन प्रेममे सपनामे
कहुँ खिलखिल क' मुस्काइत छी ।
कहुँ डरसँ थरथर कनैत–कनैत
कहुँ तपमे खूब भफाइत छी ।।

सपना जीवन की जीवन सपना
ई भेद बड अछि भेदी भैया ।
ने एतए नाओ मझधार विकट
ने ओतए केओ अछि खेवैया ।।

चलू सपनामे जीबू मनसँ
जीवन सपनेसन भ' जाओ ।
ई सुख दर्दकेर सागरमे
दुनू अपनेसन भ' जाओ ।।

ने भेद रहए सपनासँ जौँ
जीवन अनन्त भ' जाइत अछि ।
ने रहैछ तखन सीमा बन्धन ।
ई 'हम' दिगन्त बनि जाइत अछि ।।

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