गजल (बहरे मुतकारिब) - मिथिला दैनिक

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मंगलवार, 29 मार्च 2011

गजल (बहरे मुतकारिब)

अहाँ बूझि लै छी जुआरी अनेरे
जिबै कोन बैबे नियारी अनेरे

हहारो उठेलौं नचारी गबेलौं
सिहाबै किए छी मदारी अनेरे

जतेको नबारी छबारी बुरैए
घुरेबै कियो नै सुतारी अनेरे

घरोमे उपासे बहारो निरासे
दहारे अकाले हियासी अनेरे

चलै छी खटोली उठा ऐ भरोसे
भसाठी अबैए डरै छी अनेरे