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राजनीती के टहल टिकोरा ,
सोषित पिरित जनता !
लाल चौक पर परसु देखल ,
बिजित युद्ध के झगरा !

कानी रहल अछी मात्रभूमि ,
आहित बित्ता बित्ता!
देशक रक्चक भक्चक भेला ,
हाक परु आब ककरा ??

आइए रहीम तुलसी में झगरा ,
सबहक सबरंग जत्था !
डेढ़ चाउरकेर सिक्ख्क खिचरी ,
केने देसक टुकरा टुकरा !

लोसित भेल नैतिकताक डोरी ,
सगर कलंकित सत्ता ,
हम सब तैयो चुप्पी साधल ,
तारीत कतरा कतरा

जागु यौ नबतुरिया भारत
नबका भारत ठार करू!
अहिसौं जौं पालरा झारब,
करब की ??
आ कहब केकरा ???

स -स्नेह
विकाश झा

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