विभारानीक नाटक - मिथिला दैनिक

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गुरुवार, 18 नवंबर 2010

विभारानीक नाटक

समीक्षा- विभारानीक नाटक बलचन्‍दा
श्रीमती वि‍भा रानी मैथि‍ली साहि‍त्‍यक चर्चित लेखि‍का छथि‍। श्रुति‍ प्रकाशनसँ प्रकाशि‍त हुनक नाटक द्वय भाग रौ आ बलचन्‍दा पढ़लहुँ। भाग रौ बड़ नीक लागल, परंच बलचन्‍दा पढ़ि‍ते हृदयमे नव वेदना पसरि‍ गेल आ समीक्षा लि‍खवाक दु:साहस कऽ देलहुँ।
वास्‍तवमे वलचन्‍दा नाट्क नहि‍, छोट पोथीमे मात्र 20 पृष्‍ठक एकांकी थि‍क। सभसँ पैघ गप्‍प जे वि‍भा जी वर्तमान सामाजि‍क जीवनक सभसँ पैघ समस्‍याकेँ अपन लेखनीक वि‍षय बनौलन्‍हि‍। कन्‍या भ्रुण हत्‍या बर्तमान समाजमे वि‍कट रूप लऽ रहल अछि‍। प्राय: नाटकमे पुरूष प्रधान पात्रकेँ नायक कहल जाइत अछि‍ परंच एहि‍ ठॉ रोहि‍तक भूमि‍का खलनायकक अछि‍। वि‍जातीय समाजक एक शि‍क्षि‍तसँ क्षणक आवेगमे प्रेम कएलनि‍। वि‍वाह सेहो भऽ गेल। मुदा ओहि‍ स्‍त्रीकेँ की भेटल? अभि‍यन्‍ताक शि‍क्षा ग्रहण कएलाक पश्‍चात् गृहि‍णी वनि‍ कऽ रहि‍ गेली। पुरूष प्रधान समाज तैयो पाछॉं नहि‍ छोड़लक। प्रथम संतान बालक होएवाक चाही। आश्‍चर्यक गप्‍प ई जे एहि‍ प्रकारक आदेश सासु द्वारा देल गेल। एक नारी द्वारा दोसर नारीसँ आबएबला नारीक नाश करबाक कुटि‍ल आज्ञा एहि‍ एकांकीक मूल वि‍षए-वस्‍तु अछि‍। खलनायक चुप्‍प छथि‍, कि‍एक तँ ओ मातृभक्‍त। तखन दोसर माएकेँ संतति‍ हंता कि‍ए बनाबए चाहैत छथि‍। जीवन भरि‍ संग देवाक शपथकेँ की भेल? जखन नि‍र्वाह करबाक सामर्थ्‍य नहि‍ छल तँ आन जाति‍क कन्‍याकेँ संगि‍नी कि‍ए बनौलन्‍हि‍। रोहि‍तक प्रेम-सि‍नेह नहि‍ वरन् वासना मात्र छल।
स्‍त्रीकेँ भोग्‍या बना कऽ राखब ओहि‍ परिवारक मूल संकल्‍प। ओहि‍ लोकनि‍केँ सोचवाक चाही जे आव ओ दि‍न बीति‍ गेल, नारी लक्ष्‍मी तँ चंडी सेहो छथि‍। रोहि‍तक स्‍त्री गर्भपातक प्रवल वि‍रोध कएलनि‍। प्रति‍ज्ञा कए लेली जे अबैबला तनयाक पति‍पाल स्‍वयं करब।
एहि‍ एकांकीक भाषा सरल आ सुन्‍दर अछि‍। वि‍षए-वस्‍तुक सम्‍पादन सुन्‍दर आ आकर्षक। मैथि‍ल संस्‍कृति‍क व्‍यापक प्रदर्शन। जय-जय भैरवि‍सँ प्रारंभ आ समदाओनसँ इति‍ श्री। नारी व्‍यथाक मर्मस्‍पर्शी चि‍त्रणक संग जाति‍ व्‍यवस्‍थापर मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल ई नाट्क नहि‍ एकटा आन्‍दोलन कहल जा सकैत अछि‍। संस्‍कृति‍क रक्षाक लेल आ सामाजि‍क संतुलन हेतु साहि‍त्‍यि‍क आन्‍दोलन वि‍भा जीकेँ नमन........ धन्‍यवाद।
पोथि‍क नाम- भाग रौ आ बलचन्‍दा
लेखि‍का- वि‍भा रानी