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मौलाइल गाछक फूल
(समीक्षा)
कोनो भाषा साहि‍त्‍यक वि‍कासमे उपन्‍यासक एकटा अलग महत्‍व होइत अछि‍। औपन्‍यासि‍क कृति‍केँ जौं साहि‍त्‍यक चक्षु द्वय कहल जाए तँ कोनो अति‍शयोक्‍ति‍ नहि‍ होएत। मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे उपन्‍यास सभक भंडार बड़ वि‍स्‍तृत अछि‍। एहि‍ प्रांजल साहि‍त्‍यि‍क कृति‍मे कि‍छु कोसक पाथर सन रचना भेल जे आर्यावर्त्तक भाषाक गुच्‍छमे मैथि‍लीक स्‍थानकेँ सुवासि‍त कऽ रहल अछि‍। सर्वकालीन मैथि‍ली साहि‍त्‍यक इति‍हासमे सम्‍मि‍लि‍त ओ सभ उपन्‍यास अछि‍- पंडि‍त जन सीदन कृत शशि‍कला, प्रो. हरि‍मोहन झा रचि‍त कन्‍यादान ओ द्वि‍रागमन, योगानन्‍द झा रचि‍त भलमानुष, श्री यात्री कृत पारो, डॉ. मणि‍पद्म कृति‍ नैका वनि‍जारा, श्री सोमदेव कृत चानोदाइ, श्री सुधांशु शेखर चौधरी कृत दरि‍द्र छि‍म्मड़ि‍, श्रीमती लीलीरे कृत पटाक्षेप, श्री रमानंद रेणु कृत दूध-फूल, डाॅ. शेफालि‍का वर्मा कृत नागफांस, श्री साकेतानंद कृत सर्वस्‍वांत, श्री ललि‍त कृत पृथ्‍वीपुत्र, श्रीमती गौरी मि‍श्र कृत चि‍नगी, श्री केदारनाथ चौधरी कृत माहूर आ श्री गजेन्‍द्र ठाकुर कृत सहस्‍त्रवाढ़नि‍।
नि‍श्‍चि‍त रूपें एहि‍ सभ उपन्‍याससँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ नव दशा ओ दि‍शा भेटल, परंच एकर अति‍रि‍क्‍त सेहो किछु कृति‍ अछि‍ जकर चर्च करव वि‍ना मैथि‍ली उपन्‍यास वि‍धाकेँ अपूर्ण मानल जाएत। ओहि‍ कृति‍मे सँ एक अछि‍ श्री जगदीश प्रसाद मंडल द्वारा लि‍खि‍त उपन्‍यास- मौलाइल गाछक फूल
शीर्षकसँ बुझना गेल जे प्रकृति‍ वर्णनपर आधारि‍त उपन्‍यास अछि‍, मुदा अध्‍ययनक पश्‍चात् समाजक मौलाइल स्‍वरूपक वर्णन आ पुनरूत्‍थानक सकारात्‍मक स्‍वरूपक आधारपर एहि‍ उपन्‍यासक रचना भेल अछि‍। जौं मालीमे चेतना ओ अनुशीलन हो तँ मौलाइल गाछमे सेहो पुष्‍प खि‍लाओल जा सकैत अछि‍, ठीक ओहि‍ना समाजमे एकरूपता, सामंजस्‍य ओ अनुग्रह हो तँ वि‍गलि‍त मि‍थि‍लाक स्‍वरूपमे हरि‍यरी आबि‍ सकैत अछि‍।
मैथि‍ल समाजक पहि‍ल लोकसँ लऽ कऽ अंति‍म लोकक व्‍यथा वा सुखद अनुभूति‍केँ रेखांकि‍त कऽ रहल अछि‍- मौलाइल गाछक फूल‍ एहि‍ उपन्‍यासकेँ सम्‍पूर्ण उपन्‍यास एहि‍ दुआरे मानल जा सकैत अछि‍ जे एहि‍मे समाजक नकारात्‍मक स्‍वरूपपर सकारात्‍मक सि‍द्धान्‍तक वि‍जय देखाओल गेल अछि‍।
सत्‍यक वि‍जय तँ वेस ठॉ होइत अछि‍, मुदा एहि‍मे असत्‍यक हृदय परि‍वर्त्तनक भऽ कऽ सत्‍यक जन्‍म होइत अछि‍। समाजक सभसँ अंति‍म व्‍यक्‍ति‍क दशा ओकरे शब्‍दमे लि‍खल गेल, भाषा सम्‍पादन आ परि‍मार्जनक आड़ि‍मे कोनो परि‍वर्तन नहि‍। सम्‍पूर्ण जीवन दर्शनमे नायकत्‍व, कि‍ओ खलनायक नहि‍। वास्‍तवि‍क रूपे की एना संभव अछि‍? अवश्‍य भऽ सकैछ, जौं हम सभ स्‍वयंमे सम्‍यक सोच आ दृष्‍टि‍कोणकेँ स्‍थापि‍त करी।
कथाक वि‍षय वस्‍तु कोनो एकटा कथापर केन्‍द्रि‍त नहि‍ भऽ कऽ बहुत रास उपकथाकेँ सहेजि‍ कऽ बनाओल गेल अछि‍। कथाक प्रारंभ अकालक परि‍णामसँ होइत अछि‍। गरीव मजूर अनुपक पुत्र बौएलाल भुक्‍खक कारण मृत्‍युक अवाहन कऽ रहल अछि‍। माए रधि‍या अपन लोटा बेचि‍ कऽ ओकर तृप्‍ति‍ लेल चि‍क्‍कस कीनि‍ कऽ अनैत अछि‍। तीनटा रोटी बनल, मुदा बौएलालक भाग्‍यमे मात्र एकटा रोटी आ दू लोटा पानि‍। श्रमजीवीक मार्मि‍क दशापर लि‍खल पहि‍ल भागमे संवभत: रधि‍या अर्न्‍तमनसँ अनूपसँ कहैत छथि‍-
की बुझवें ककरा कहै छै गरीवी,
सपनहुँमे सुख नहि‍ जतऽ श्रमजीवी,
सूर्यास्‍तक पश्‍चात दू क्षणक लेल कुहेस अबैत अछि‍, फेर उषाक दर्शन अवश्‍यंभावी, यएह तँ प्रकृति‍क लीला अछि‍। नथुआ अनूपक अन्‍हार कूपमे इजोतक सूक्ष्‍म बाती लऽ कऽ अबैत अछि‍। रमाकान्‍त बाबू पोखरि‍ खुनौता तेँ मजूरक आवश्‍यकता अि‍छ। अनूपकेँ सपरि‍वार काज भेट गेलनि‍। मेट मूसनाक वरदहस्‍त जे छल। मालि‍कक मुंशीकेँ मेट कहल जाइत अछि‍। मूल रूपसँ दलालक प्रवृति‍बला मूसन अनुपक लेल प्राणदायक अछि‍। कि‍एक तँ दुनू परानीक संग-संग बारह बर्खक बौएलालकेँ सेहो काज दऽ देलक। बौएलाल सेहो पूर्ण तन्‍मय भऽ कऽ कएलक, तकर परि‍णाम भेल जे रमाकान्‍त बाबू आन जोनसँ बेसी मजदूरी बौएलालकेँ देलनि‍। कर्मक गति‍ वि‍चि‍त्र होइत अछि‍। उपन्‍यासकार बाल श्रमि‍ककेँ महि‍मा मंडि‍त कऽ रहल छथि‍। हमरा सबहक संवि‍धानमे 14 वर्खसँ कम उमेरक व्‍यक्‍ति‍केँ वाल कहल जाइत अछि‍- मजदूरी प्रति‍वंधि‍त। मुदा ओ भुक्‍खे मरि‍ जाए एकर कोनो परि‍वाहि‍ नहि‍। टेलि‍भीजनमे नाच पाँच बर्खक बच्‍चा कऽ सकैत छथि‍, एकरा प्रति‍भाक प्रदर्शन मानल जाइत अछि‍ मुदा 12 वर्खक बौएलाल मात्र मौलाइल गाछक मजदूर थि‍क, वास्‍तवि‍क जीवनमे पकड़ल जाएत तँ दीन हीन पि‍ताकेँ जेहल भेटल। समरथकेँ नहि‍ दोष गोसाईं। रमाकान्‍त बाबूक प्रतापसँ अपन कर्मक प्रकृति‍सँ अनूपक गरीवी समाप्‍त भऽ गेल। बौएलाल काजक संग-संग शि‍क्षा सेहो ग्रहण करए लागल। बौएलालक जीवनमे वि‍हान जे आएल ओ उपन्‍यासक अंत धरि‍ जगमगाइते रहल। अंतमे रमाकान्‍त बाबूक जेठ वालक डॉ. महेन्‍द्रक सहकर्मी भऽ गेला बौएलाल। बौएलालसँ डॉ. बौएलाल- सभटा कर्मक प्रभाव। हि‍न्‍दी साहि‍त्‍यक एकटा कवि‍क उक्‍ति‍ पूर्णत: सत्‍य प्रतीत होइत अछि‍-
प्राणों की वर्तिका बनाकर,
ओढ़ ति‍मि‍र की काली चादर
जलने वाला दीपक ही तो जग का ति‍मि‍र मि‍टा पाता है रोने वाला ही गाता है।
कथाक दोसर मोड़पर शशि‍शेखरक जीवन वि‍हानसँ ति‍मि‍रमे प्रवेश करैत अछि‍। कृषि‍ वैज्ञानि‍क बनावाक बाटेपर सभटा समाप्‍त भऽ गेल। माता-पि‍ताक बि‍मारीमे सभटा चौपट्ट भऽ गेलनि‍। अधखरू शि‍क्षा बड़ कष्‍टदायी होइत अछि‍। आत्‍मगलानि‍क शि‍कार शशि‍शेखरक भाग्‍य सेहो फूजल। एकटा वि‍धवा अपन जमीनसँ वि‍द्यालय खोलवाक योजना बनायलि‍। गामक संभ्रान्‍तसँ लऽ कऽ गरीव गुरबाक समर्थन। शशि‍शेखर शि‍क्षक भऽ गेलाह।
उपन्‍यासक तेसर खण्‍डमे सुगि‍याक शारीरि‍क व्‍यथाक आरंम्‍भक संग-संग पति‍ सोने लालक समर्थन हृदयकेँ झकझोरि‍ दैत अछि‍। येन-केन प्रकारेण सोनेलाल सुगि‍याक इलाज करा कऽ गाम घुरलाह। सुगि‍या स्‍वस्‍थ भेली, चि‍कि‍त्‍साक प्रभावसँ मुदा कबुलाक प्रभाव मानि‍ सोनेलाल कीर्त्तनक संग-संग भंडारक आयोजन कएलनि‍। हमरा सबहक समाजमे अंध वि‍श्‍वासक चमौकनि‍ अपन जालसँ सोचकेँ घेर नेने अछि‍। कीर्त्तनक दू दल आगाँक जाति‍क रमापति‍क दल आ वेस पछाथि‍क संग-संग कि‍छु सवर्ण साधुक मि‍श्रि‍त दल- गंगादासक दल। उधेश्‍य एक, मुदा दृष्‍टि‍कोण अलग-अलग। रमापति‍क दल गरीब सोनेलालसँ दक्षि‍णा लेलनि‍, दयाक कोनो संभावना नहि‍। गंगादासक दल दक्षि‍णा तँ लेलनि‍ मुदा मात्र सि‍द्धान्‍तक रूपमे। वास्‍तवमे लऽ कऽ घुरा देलनि‍। आत्‍म सम्‍मानक भावक संग-संग गंगादासमे दया-भाव सेहो अछि‍। आब स्‍वत: बूझल जा सकैत अछि‍ जे सवर्ण ककरा कही?
चारि‍म खण्‍डक प्रारंभ रमाकान्‍त बावूक अपन पत्‍नी श्‍यामा आ नोकर जुगेसरक संग मद्रास प्रवाससँ होइत अछि‍। कतऽ गाम आ कतऽ मद्रासक जि‍नगी। एक दि‍स जगमगाइत रोशनी, साफ सड़क आ गगनचुम्‍बी महल तँ दोसर दि‍स दू कुहेसक वाट। मुदा वास्‍तवि‍कता कि‍छु आओर छल। पुतोहू-पुत्र डॉ मुदा भवि‍ष्‍यमे कि‍छु नहि‍ भेटबाक संभावना देखि‍ रमाकान्‍तक हि‍या सुखा रहल छलनि‍। बेटा-पुतोहूसँ तँ खूब सम्‍मान आ सत्‍कार भेटलनि‍ मुदा पाँचटा पोता-पोतीमे सँ केओ चि‍न्‍हवो नहि‍ कएलनि। जे जीवि‍तमे नहि‍ जनैत अछि‍ ओकरासँ जीवनक अंति‍म अवस्‍थामे की आश करी? पलायनवादक पराकाष्‍ठा धरि‍ लऽ जाएव उपन्‍यासकारक सोचसँ नि‍श्‍चि‍त रूपे अजगुत लगैत अछि‍। मि‍थि‍लाक भवि‍ष्‍य कतऽ धरि‍ जाएत जगदीश बावूक संजय सन दृष्‍टि‍ आश्‍चर्यजनक मुदा प्रासंगि‍क अछि‍। छोटकी पुतोहू सुजाताक जीवनक गाथा सुनि‍ रमाकान्‍त बाबू पसि‍झ गेलाह। एकटा धोवि‍नक तनयासँ छोटका बेटाक वि‍वाह भेल दूटा संतान सेहो भऽ गेल, मुदा रमाकान्‍त बावू अपन पुतोहूक इति‍हास नहि‍ जनैत छलाह। साम्‍यवादी सोचक उन्नायक रमाकान्‍त बावूसँ एना संभव तँ मानल जा सकैत अछि‍, मुदा ओ अपन बेटाक वि‍वाहमे शामि‍ल कि‍एक नहि‍ भेलाह। पलायनक एहन फल मैथि‍लक समृद्ध वर्गकेँ कोना भेट सकैत अछि‍? गाममे दू सए बीघा जमीनक मालि‍क रमाकान्‍त बावूक दुनू लाल कि‍एक नहि‍ गामेमे अस्‍पताल खोललनि‍। जखन मद्रासक संभ्रान्‍त मि‍थि‍लामे नहि‍ अबैत छथि‍ तँ हम सभ ि‍कए पलायन करैत छी? वि‍पन्नक पलायन तँ बूझएमे अबैत अछि‍ परंच सम्‍पन्नक पलायन.....?
एहि‍ उपन्‍यासक सभसँ पैघ वि‍शेषता जे उपन्‍यासकार कोनो प्रकारक प्रश्‍नकेँ छोड़ि‍ रचनाक इति‍श्री नहि‍ कएलनि‍। प्रश्‍नक संग-संग वि‍श्‍लेषण आ समाधान पोथीमे अनायास भेट जाएत। कथाक अंतमे पलायनवादक इति‍श्री कहल गेल। डॉ. महेन्‍द्र आ डॉ. सुजाता गामक गरीव गुरबाक इलाजक लेल तत्‍पर भेलीह। कोनो व्‍यक्‍ति‍केँ असाध्‍य रोग यथा कैंसर, एड्स नहि‍। एहि‍सँ प्रमाणि‍त होइत अछि‍ जे गाममे रहनि‍हारक जीवन संतुलि‍त अछि‍। वीमार छथि‍ तकर कारण पोषण संतुलि‍त नहि‍। श्रमजीवी‍ आ श्रमपोषीक मध्‍यक खाधि‍क कारण ई दशा अछि‍। रमाकान्‍त बावू एहि‍ दशासँ तीजि‍-भीजि‍ गेलाह। क्षणहि‍मे अपन सभटा जमीन जाल गरीवक मध्‍य वॉटि‍ देलनि‍। गरीबो आत्‍म सम्‍मानी आ वफादार। खेतसँ उपजल अन्न, तीमन तरकारी प्रथमत: रमाकान्‍त बावूकेँ दैत छथि‍। सम्‍यक समाजक रचना, केओ सवर्ण नहि‍ केओ क्षुद्र नहि‍। सबल मि‍थि‍ला, संवल मैथि‍लाक कल्‍याणकारी सोच मनोरम अछि‍।
हीरानन्‍द सन सम्‍यक सोचबला सवर्ण जौं समाजमे आगाँ बढ़ति‍ तँ मि‍थि‍लाक रूप रेखा बदलि‍ जाएत। हीरानंदक जाति‍क उल्‍लेख तँ नहि‍ कएल गेल अछि‍ मुदा लि‍खवाक कलासँ स्‍पष्‍ट होइत अछि‍ ओ नि‍श्‍चि‍त रूपेँ आगाँक जाति‍क छथि‍। अनुपक घरमे भोजन ग्रहन काल सबरी-रामक सि‍नेहक स्‍पष्‍ट दर्शन। जीवन दर्शनपर आधारि‍त एहि‍ उपन्‍यासमे कतहु जाति‍क उल्‍लेख नहि‍ मुदा लक्षणसँ स्‍पष्‍टीकरण होइत अछि‍। सुबुधि‍क वि‍वेकशीलतामे रचनाकारक दृष्‍टि‍कोण पारदर्शी लागल। बुझना जाइत अछि‍ जे जगदीश बावू सुबुधक रूपेँ उपन्‍यासमे पैसल छथि‍। उपन्‍यासमे एकठॉ वर्ग संधर्षक स्‍थि‍ति‍ देखऽ मे आएल मुदा एकटा अवला अपन चरि‍त्रक रक्षाक लेल पि‍यक्करपर प्रहार कएलनि‍। ई सभ वास्‍तवि‍कता अछि‍ एकरा अनसोहाॅत नहि‍ मानल जा सकैत अछि‍।
वि‍षय-वस्‍तुक मध्‍य झाॅपल दशापर वेवाक प्रस्‍तुति‍। ओना तँ सभटा रचनाकार अपनाकेँ साम्‍यवादी आ समाजवादी मानैत छथि‍। मुदा रचनाक संग-संग सबहक जीवनक दर्शन कएलापर स्‍थि‍ति‍ वि‍परीत भऽ सकैत छथि‍। मैथि‍ली साहि‍त्‍यक सम्‍यक चरि‍त्र, सम्‍यक दृष्‍टि‍ आ सम्‍यक जीवन शैलीमे जीबऽ बला कि‍छुए मात्र साहि‍त्‍यकारक समूहमे जगदीश बावूकेँ सेहो राखल जा सकैत अछि‍। अपन व्‍यक्‍ति‍त्‍वसँ जीवनक नूतन आयामकेँ समाजमे ज्‍योति‍क रूपमे पसारब मात्र रचनामे नहि‍, व्‍यक्‍ति‍गत जीवनोमे अवश्‍ये हएत। भऽ सकैत अछि‍ वर्तमान पि‍रही एहि‍ ग्रन्‍थक तादात्‍मयकेँ पूर्णत: स्‍वीकार नहि‍ करए, परंच हमरा बुझने ई सम्‍पूर्ण पाठकक उपन्‍यास थि‍क। एहि‍मे ककरोसँ कोनो पूर्वाग्रह नहि‍। सम्‍भ्रान्‍त समाजकेँ वि‍गलि‍त आ ओछ समाजसँ जोड़ि‍ सम्‍यक समाजक नि‍र्माण करवाक उद्येश्‍यमे ‘‘सर्वे भवन्‍तु सुखि‍न: सर्वे सन्‍तु नि‍रामया:, सर्वे भद्राणि‍ पश्‍यन्‍तु मा कश्‍चि‍द् दु:खभाग भवेत्क दृष्‍टि‍ परि‍लक्षि‍त होइत अछि‍। कतहु-कतहु शब्‍द आ वाक्‍य सामंजस्‍यमे कि‍छु त्रुटि‍ सेहो देखऽ मे आएल मुदा भाव पवि‍त्र, उद्येश्‍य पवि‍त्र तेँ एकरा नजरअंदाज करव प्रासंगि‍क लागल। नि‍श्‍चि‍त रूपेँ सर्वश्रेष्‍ठ मैथि‍ली उपन्‍यासक सूचीमे एहि‍ उपन्‍यासक नाओ देल सकैत अछि‍।
पोथीक नाम- मौलाइल गाछक फूल
वि‍धा- उपन्‍यास
रचनाकार- जगदीश प्रसाद मंडल

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