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नभमंडल के असंख्य ताराक मध्य चमकैत चान समान,
सब सॅ सुन्दर अछि जगत में हमर मिथिलाधाम ।

जकरा उत्‍तर गिरिराज हिमालय छथि स्वयं विराजै
कमला-कोशीक निर्मल धारा जकर चरण पखारै ।
जत$ भेटए मुख पानक लाली संग मधुर मुस्कान
सब सॅ सुन्दर अछि जगत में हमर मिथिलाधाम ।

छप्पन व्‍यंजन मध्य जतए सर्वोपरि अछि तिलकोर
स्वर्गो में नहि भेटए अपन मिथिलाक “माछक झोर” ।
स्वागत में प्रस्तुत होइछ जतए जोड़ा खिल्ली पान
सब सॅ सुन्दर अछि जगत में हमर मिथिलाधाम ।

सरस भूमि आ लोक सरस, भोजन दही-चूड़ा
इ भोजन नै भेटए स्वर्गो में, नै भेटए माछक मूड़ा ।
जतए अछि वाचस्पति, विद्यापति आ विदेह केर गाम,
सब सॅ सुन्दर अछि जगत में हमर मिथिलाधाम ।

भाषा मधुर, भोजन मधुर, मधुर अछि विधि-व्यवहार
चौठचन्‍द्र, मधुश्रावणी, कोजागरा सन अछि पाबनि-तिहार ।
डेग-डेग पर पोखरि भेटए, भेटए माछ-मखान
सब सॅ सुन्दर अछि जगत में हमर मिथिलाधाम ।

जखन कोजागरा में अबैत अछि पान-मखानक भार
पूर्ण इजोरिया में पुरैछ लोक सौसे गाम हकार ।
इ संसार जनैत अछि हमरा, हम छी कौटिल्यक संतान
सब सॅ सुन्दर अछि जगत में हमर मिथिलाधाम ।

विद्वानक इ धरती से के नै बुझैत अछि
प्रतिभाक कमी नै से दुनियॉं जनैत अछि ।
मंडनक विद्वता सुनि एला “शंकर” सन विप्र सुजान
सब सॅ सुन्दर अछि जगत में हमर मिथिलाधाम ।

सीता, अहिल्या बहिन छथि हम्मर
पतंजलि जनमला एही धरती पर ।
सौन्दर्य, सौम्‍यता देखि जतुका लोभेला स्वयं श्रीराम
सब सॅ सुन्दर अछि जगत में हमर मिथिलाधाम ।

मॉ मिथिला के कोरा में सरिपहुँ हम अतिशय सुख पाबी
मॉं मिथिला के चरण वंदना हम अहर्निश गाबी ।
पुनि-पुनि जनमी एही धरती पर, इएह विनती हे घनश्‍याम
सब सॅ सुन्दर अछि जगत में हमर मिथिलाधाम ।

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