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विद्यापतिक शिवसिंह



अपन अनुपम कृति कीतिलताक प्रस्तावनामे विद्यापति कहने छथि जे



तिहुअन खेत्तहिं काञि तसु कित्ति-वल्लि पसरेइ।

अक्खर खम्हराम्भ जइ मञ्चा-बन्धि न देइ।।



आशय स्पष्ट अछि। संस्कृतमे कहबी छैक जे "कीर्त्तिरक्षरसम्बद्धा"। ताहिमे कीर्त्तिमे
वल्लीक आरोप कए कवि साज़् रूपकक विच्छित्ति दए अपन उक्तिकें कविताक स्वरूप देल

अछि। एहिमे सन्देह नहि जे काव्यप्रतिभा जन्मजात होइत अछि ओ कविक ह्यदयक उमड़ैत भाव
स्वतः भावानुकूल वाणी द्वारा कवितारूपें निःसृत होइत अछि। भवभूति कहने छथि जे "पूरोत्पीड़े
तड़ागस्य परीवाहः प्रतिक्रिया" ओ शोक एवं क्षोभमे भलहिं प्रलापहिं ह्यदय धैर्य प्राप्त करओ परन्तु
कविता-रूप परीवाह अनायास ओहि ह्यदयक हेतु होइत छैक जे आनन्दक भावसँ उमड़ल रहैत
अछि। बहुजनसुखाय बहुजनहिताय अवश्ये कविताक रचना होइत अछि मुदा ई मानए पड़त जे
ओकर प्रथम लक्ष्य रहैत अछि स्वान्तः-सुखाय। तें ई मानबामे कोनो विप्रतिपत्ति नहि जे विद्यापति
अपन बहुविध कविताक रचना अपनहि आनन्दक अतिरेकमे कएल। तथापि ओहि स्वान्तःसुखाय
लाभक सज़् सज़् अपन आश्रय, अपन मित्र, अथवा अपन हितैषीकें अमरत्व प्रदान करब सेहो
हुनका उद्देश्य अवश्य छलैन्हि, नहि तँ अपन गीतक भनितामे एतेक व्यक्तिक नाम दए दए ओहि
सबहुँ व्यक्तिक कीर्त्तिवल्लीकें पसरबाक हेतु ओ अक्षरक खाम्ह बनाए मचान नहि बान्हि जैतथि।



मिथिलाक इतिहासमे शिवसिंह ओ विद्यापतिक साहचर्य बड़ मधुर प्रसज़् अछि। शिवसिंह
जँ राजकुलमे

उत्पन्न भेल छलाह तँ विद्यापति राजमन्त्रीक कुलमे, ओ सए वर्षसँ अधिक दिन धरि मिथिला-
राज्यक शासनसूत्र ओ मैथिल समाजक नेतृत्व हिनकहि घरमे छलैन्हि। महाराज शिवसिंहक ओ
बालसखा छलाह, अन्तरज़् मित्र छलाह, वि•ास्त सचिव छलाह,महाराज-पण्डित छलाह,
राजकवि छलाह। शिवसिंह बड़ प्रतापी राजा भेलाह। मिथिलामे कहबी छैक जे



पोखरी रजोखरि आ'र सब पोखरा।

राजा शिवैसिंह आ'र सब छोकरा।।



परन्तु शिवसिंहक सभटा प्रताप विस्मृतिक गर्तमे गड़ि गेल रहैत ओ ई फकड़ा मात्र
हुनक प्रतापक गौरवकें ख्यापित करैत हुनक नामकें मन पाड़ैत रहैत यदि विद्यापति अपन
अनेकानेक रचनामे हुनका अमर नहि कए गेल रहितथि। पुरुष-परीक्षाक अवसन्न-बिद्य-कथामे
विद्यापति राजा ओ कविक सम्बन्धक प्रसज़्मे कहैत छथि जे सृष्टिक आदिकालहिसँ जे राजा
लोकनि वाक्कलागौरवक हेतु कवि लोकनिकें आराधि आराधि गैल छथि



तेषां नाम सरस्वती-परिणतावद्यापि संगीयते।

जाताः के न मृता न के तदितरे ज्ञाता न गेहाद् बहिः।।



वस्तुतः "यशसां स्थापनस्थानं कविभाषितं" ई कथा जतेक शिवसिंह-विद्यापतिक प्रसज़्मे
चरितार्थ भेल अछि ततेक आओर कहाँ देखैत छी?



ओना तँ विद्यापति अपन प्रभु शिवसिंहक कीर्तिकपताका सएह फहराए गेल छथि परन्तु
कीर्त्तिपताका नष्ट भए गेल लुप्तप्राय अछि। कीर्त्तिपताका कहि जे ग्रन्थ प्रकाशित भेल अछि
तकर प्रस्तावनामे "जगतसिंह"क कीर्तन अछि! परन्तु जतबओ विद्यापतिक रचना उपलब्ध अछि,
निश्चित रूपसँ विद्यापतिक रचना प्रमाणित होइत अछि, ततबहुसँ शिवसिंहक सम्बन्धमे बहुतो
ज्ञातव्य विषय ज्ञात भए जाइत अछि। आश्चर्य होइत अछि जे शिवसिंह जे किछु विद्यापतिक हेतु

कएने होइथिन्ह ताहिसँ ओ बुझने होएताह जे ओ अपन बाल-सखाकें उपकृत करैत छथि, कवि
अपनहु एकरा उपकारे मानने होएताह, ओ सबसँ बेसी तँ ओहि समयक लोक सब--कतोक तँ
ईष्र्यालु समेत भए--इएह कहने होएताह जे महाराज अपन बालसङ्गीतकें धन ओ सम्मान सब
कथूसँ परिपूरित कए देल। परन्तु आइ जखन दुहू महापुरुषक परस्पर सम्बन्धक दिशि दृष्टिपात
करैत छी तँ स्पष्ट प्रतीत होइत अछि जे उपकार तँ विद्यापति कएलथिन्ह शिवसिंहक जे हुनका
अमर कए गेलथिन्ह। राजा जे किछु देलथिन्ह से अनित्य छल, नष्ट भए गेल, लोक बिसरि
गेल, परन्तु कवि जे किछु हुनका दए गेलथिन्ह से नित्य अछि, एखन पर्यन्त ओ ओहिना अछि
वा ई कहू जे जँ जँ लोककें ओहि समयक स्मृति क्षीण भेल जाइत छैक तँ तँ अन्धकारक प्रकाश
जकाँ महाकविक वाणीमे उपनिबद्ध शिवसिंहक कीर्त्ति आओर तीक्षणतासँ आलोकित भए रहल
अछि।



विद्यापतिक रचनामे शिवसिंहक प्रसज़् यावतो वर्णनक संग्रह कए ओकर क्रमबद्ध अध्ययन
एक गोट बड़े रोचक ओ उपादेय विषय होइत परन्तु ताहि हेतु एक गोट क्षीणकाय निबन्ध
पर्याप्त नहि होएत। पुरुष-परीक्षामे अनेक ठाम शिवसिंहक प्रशंसा अछि, स्तुति अछि। कमसँ कम
दू गोट गीत केवल शिवसिंहक वर्णनमे उपलब्ध अछि। परन्तु सबसँ चमत्कारक अछि
विद्यापतिक ओ गीत सब जाहिमे भनितामे शिवसिंहक नामतः उल्लेख अछि। विद्यापतिक भनिता
केवल विधि-रक्षार्थ टा नहि अछि, कवि ओहिमे केवल अपन नाम वा उपाधि अथवा अपन आश्रय
किंवा जनिक प्रमोदार्थ ओहि गीतक रचना भेल तनिक नामक कीर्तन मात्रे कएकें नहि छोड़ि देने

छथि, अपितु ओहिमे बहुधा ओ अपन उक्ति बड़े मार्मिक रूपसँ अभिव्यक्त कएने छथि।
गोविन्ददासहुक रचनामे भनिता एहिना सार्थक अछि, साभिप्राय अछि। हुनक परवर्ती कवि
लोकनि भनिताकें केवल व्यवहार बनाए लेल। ताही कारणें विद्यापति वा गोविन्ददासहुक
भनिताक महत्त्व साधारणतया लोककें आकृष्ट नहि कए सकलक ओ विद्यापतिक भनिताक
स्वतन्त्र रूपसँ अध्ययन एकन पर्यन्त नहि भेल अछि। केवल श्रद्धेय डाक्टर श्रीविमानविहारी
मजुमदार साहेब एकर महत्त्वकें बुझलैन्हि अछि। हुनक एक गोट लेख एहि प्रसज़् बिहार रिसर्च
सोसाइटीक जर्नलमे 1942 मे प्रकाशित भेल छल तथा विद्यापतिक गीतक जे संग्रह ओ
सम्पादित कएल अछि ताहिमे भनिताक क्रमसँ गीतक वर्गीकरण कए एक भनिताक सबटा गीत
ओ एकत्र संगृहीत कए देल अछि तथा ओकर विस्तृत भूमिकामे एहि भनिता सबहिक विचार
सेहो ओ बड़े वैज्ञानिक रीतिसँ कएल अछि। यद्यपि ओ विचार सर्वाशें पूर्ण नहि अछि, केवल
भनिताक विचारक दिग्दर्शन मात्र कराए देल गेल अछि, मुदा एहिमे कोनो सन्देह नहि जे
श्रीमजुमदार साहेब जे काज कएल अछि ताहिसँ विद्यापतिक भनिताक स्वतन्त्र रूपसँ अध्ययन
करबाक केवल सामग्री मात्रे संकलित नहि भेल अछि, अपितु ओकर अध्ययन ओ अनुशीलनक
प्रकार सेहो प्रदर्शित भेल अछि।



ई कथा आब सर्वविदित अछि जे राधाकृष्ण विषयमे सख्यभाव मानि महाप्रभु चैतन्यदेव
विद्यापतिक श्रृङ्गारक गीतकें भक्तिक भावसँ देखथि। महामना ग्रिअरसन साहेबकें एहि गीत
सबमे जतए कतहु माधवक नाम नहिओ अछि तथापि केवल नायकहुसँ परमात्मा एवं राधा किंवा
नायिकासँ जीवात्मा प्रतिभासित होइन्ह। एही देखाउसिमे आब अन्यान्यो कतेक जन विद्यापतिक
श्रृङ्गारक गीतमे मधुर रसक परिपाक मानए लगलाह अछि। परन्तु श्रीमजुमदार साहेब एहि
गीत-सबहिमे भनिताक सज़् शेष पदक समन्वय कए ई देखाओल अछि जे शिवसिंह-नामबला

गीत सबमे जतहु माधव ओ राधाक नाम अछि ततहु कवि हुनका नायक ओ नायिकाक च्र्न्र्द्रड्ढ
क रूपमे, आदर्श जकाँ, देखैत छथि, भक्तिभावसँ नहि। गीत-संख्या 164मे नायिका विलाप करैत
छथि जे "सखि हे कतहु न देखिअ मधाई" ओ भनितामे विद्यापति हुनका आ•ाासन दैत छथिन्ह
जे "लखिमा-देविपति पुरहि मनोरथ आबहि शिवसिंह राजा"। गीतसंख्या 175 मे विरहिणी
नायिकाक मनोरथ जे जखन आओब हरि रहब चरन गहि चान्दे पुजब अरविन्दा। कुसुम सेज
भलि करब सुरत केलि दुहु मन होएत सानन्दा। इत्यादिक अन्तमे ओकरा आ•ाासन दैत कविक
उक्ति भनितामे द्रष्टव्य थिक जे



भनहि विद्यापति सुन वर जउवति अछ तोकें जिवन अधारे।

राजा शिवसिंह रूपनराएन एकादस - अवतारे।।

गीतसंख्या 177 मे

"माधव कठिन - ह्यदय परवासी

तुअ पेयसि मोयँ देखलि वियोगिनि" इत्यादि

सखी नायकसँ नायिकाक विरहावस्थाक करुण वर्णन कए अन्तमे कहैत अछि जे

"राजा शिवसिंह रूपनराएन करथु विरह उपचारे"।।

एहि गीत सबमे मधाइ, हरि वा माधवसँ परमात्मा तँ नहिए अभिप्रेत छथि, साधारण
नायकक द्यन्र्द्रड्ढ "प्रतिनिधि" सेहो नहि, प्रत्युत अभिप्रेत छथि स्पष्टतः राजा शिवसिंह जनिका हेतु
"एकादश अवतारा" विशेषतः विचारणीय थिक। अतएव श्रीमजुमदार साहेब एहि विषयक विचार
तँ कएल निष्पक्ष भावसँ, वैज्ञानिक रीतिसँ, परन्तु निष्कर्ष हुनक आंशिके सत्य प्रकट भेल, पूर्ण
सत्य धरि की तँ ओ नहि गेलाह अथवा वैष्णव सिद्धान्तक संस्कारक प्रभावसँ से कण्ठतः
स्वीकार नहि कएलैन्हि।



मिथिलाक संस्कृति ओ परम्परामे विद्यापतिक श्रृङ्गारक गीत कहिओ भक्ति-भावसँ नहि
देखल गेल। मधुर रसक कल्पनासँ मिथिलाकें कहिओ परिचय नहि। मिथिलामे विद्यापतिक
श्रृङ्गारक गीत विशुद्ध

श्रृङ्गाररसक गीत बुझल जाइत छल ओ एखनहु बुझल जाइत अछि। गीतमे राधा ओ कृष्णक
लीलाक वर्णन अछि तें एकर रसमे कोनो अन्तर नहि बुझल गेल वा मानल गेल। गाथा-सप्तशती
पर्यन्तमे (काव्यमाला 447) "कान्ह"क प्रयोग साधारण नायकक हेतु भेल-अछि ओ मिथिलहिमे
नहि बङ्गालहुमे जे लोकगीत प्रचलित अछि ताहिमे केओ रमणी अपन रसिक स्वामीकें कान्ह,
मधाई प्रभृति शब्दें उल्लेख करैत अछि। एहि परम्परागत संस्कारक पुष्टि हमरा विद्यापतिक
गीतसबसँ, विशेषतः हुनक गीतक भनितासँ होइत रहल अछि, ओ तें अपन सम्पादित पुरुष-
परीक्षाक भूमिकामे हम एहि कथाक प्रतिपादन कएने छी जे विद्यापतिक कुष्ण ओ राधाकें
परमात्मा ओ जीवात्मा तँ नहिए बुझबाक थिक; प्रत्युत हमरा तँ इएह प्रतीत होइत अछि जे
विद्यापति कृष्ण ओ राधाक रूप ओ लीलाक व्याजें शिवसिंह ओ लखिमाक रूप ओ लीलाक
वर्णन कएने छथि, विद्यापतिक कान्ह थिकथिन्ह शिवसिंह ओ राधा थिकथिन्ह लखिमा। हम
बुझैत छी जे एहि प्रसज़् हमर जे दृष्टि अछि से ओएह जे श्रीमजुमदार साहेबक छैन्हि; भेद एतबे
जे हम निस्संकोच पूर्ण सत्यक प्रतिपादन कएल अछि परन्तु श्रीमजुमदार साहेब जेना सशङ्क

रहथि, गेलाह अछि तँ सत्यक दिशामे अवश्य परन्तु पूर्ण सत्य प्रकाश नहि कएल।



परन्तु हमर सम्पादित पुरुषपरीक्षाक भूमिकाक समालोचनामे श्रद्धेय श्रीमजुमदार साहेब
हमर एही कथाक सज़् अपन वैमत्य प्रकट कएल अछि। श्रीमजुमदार साहेब बड़ पैघ विद्वान
छथि, इतिहास विचक्षण छथि ओ विद्यापतिक प्रसज़् हुनक पाण्डित्य देशमे ककरहुसँ न्यून नहि
कहल जाए सकैत अछि, अतएव हमरा अत्यन्त आश्चर्य अछि जे हुनक सदृश निष्पक्ष विचारक
हमर ओहि उक्तिक सज़् अपन वैमत्य प्रकट कएलैन्हि अछि जाहि हेतु हमरा प्रचुर प्रमाण अछि
ततवे नहि, किन्तु जाहि प्रसज़् हमरा सबसँ बेशी बल स्वयं श्रीमजुमदार साहेबक विचारसँ भेटल
छल। तें हम एहि विषयक पुनर्विचारमे प्रवृत्त भेल छी ओ एहिमे हमर विचारसरणि ओएह रहत
जे श्रीमजुमदार साहेबक रहलैन्हि अछि तथा आधार रहत श्रीमजुमदार साहेबहिक संगृहीत ओ
सम्पादित विद्यापतिक गीतावली।



एहि संग्रहमे विद्यापतिक रचित कहि गोट हजारेक गीत अछि जाहिमे प्रायः आधा
भनिता-रहित अछि। नेपालक पोथीक लेखक महोदय तँ भनिताक महत्त्व बुझबे नहि कएलथिन्ह
ओ अन्तमे भनइ विद्यापतीत्यादि लिखि भनिताक अध्ययनक मार्गे अवरुद्ध कए देल। हमरा ई
वि•ाास नहि होइत अछि जे विद्यापतिक कोनो गीत भनिता-विहीन छल, ई केवल लेखकक
अनभिज्ञता ओ अपाटव सूचित करैत अछि जे गीतमे भनिताक पदकें निष्प्रयोजन बूजि ओकरा
छोड़ि देल गेल। तथापि एहि गोट हजारेक गीतमे दू सएसँ किछुए अधिक गीत अछि जाहिमे
भनितामे शिवसिंहक नाम अछि। एहिमे एक सए सत्ताइस गोट गीतमे शिवसिहंक सज़्-सज़्
लखिमाक नाम सेहो अछि तथा सात गोट गीतमे शिवसिंहक सज़्-सज़् हुनक पाँचो अन्यान्य स्त्री,
मधुमति (18) सुषमा सोरम (95) रूपिनि (166) ओ मोदवती (169)क नाम अछि जाहिमे
सुषमाक नामक गीत तीनि गोट (51, 102, 205) अछि ओ चारिम (148) मे सुषमाक सज़्
लखिमाक नाम सेहो अछि। एकर प्रामाणिकता एहीसँ सिद्ध अछि जे पञ्चीमे सेहो शिवसिंहक
छओ गोट विवाह उल्लिखित अछि ओ एहि छबो महादेवीक परिचय उपलब्ध अछि।



ई हमर कहबाक तात्पर्य ने पहिने छल ने एखनहु अछि जे विद्यापतिक सब गीतक
भनिता साभिप्राये अछि अथवा शिवसिंह नामबला सब गीतमे हुनकामे कृष्णत्वक आरोप अछि।
तकर तँ प्रयोजनो नहि अछि। एकहु दु ठाम विद्यापति यदि स्पष्ट शब्दें शिवसिंहकें कृष्ण कहल
अछि अथवा मानल अछि तँ ई कथा सिद्ध भए गेल। ओ से विद्यापति एक दू ठाम नहि अनेक
ठाम, अनेक प्रकारें, अनेक भङ्गिमासँ कहल अछि। केवल कान्ह वा माधव, कन्हाइ वा मधाइ
प्रभृति शब्दक प्रयोगहिसँ हम एकर आरोप नहि मानि लेब, कारण, जे कथा हम पूर्वहुँ कहल
अछि केओ नायिका अपन ह्यदयज़्म स्वामीकें अपन "कान्ह" कहैत अछि, सब रमणीकें अपन

रसिक प्राणे•ार कृष्णाहिक अवतार होइत छथिन्ह। हमरा तँ स्पष्ट शब्दें शिवसिंहमे कृष्णाक
आरोप चाही ओ तकर दृष्टान्त हम एहिठाम श्रीमजुमदार साहेबक संस्करणसँ उपस्थित करैत
छी।



सबसँ पूर्व शिवसिंहक रूप-सौन्दर्यक वर्णन देखल जाए। शिवसिंह

पुहबी नव पचवाने (39)

तीनि भुवन महि अइसन दोसर नहि (50)

रूपे अभिमत कुसुमसायक (92)

पुहविहि अवतरु नव पँचवाने (127)

परतख पँचवाने (139)

जनि ऊगल नवचन्द (113)

मेदिनि मदन समाने (151) इत्यादि शब्दें वर्णित छथि। हुनक रसिकताक वर्णन अछि :-

रतन सनि लखिमा कन्त। सकल कलारस जे गुनमन्त (48)

सकल कला अवलम्ब (104)

रायनि मह रसमन्ता (109)

राय रसिक (122)

केलि कलपतरु सुपुरुष अवतरु नागर कुरुवर रतने (185)

रस आधार (93)

रसवन्ता गुणानिवास (127) इत्यादि।

"सिंह सम शिवसिंह भूपति" (9) सँ हुनक शौर्यक वर्णन कए हुनक वदान्यताक कीर्तन
कएल गेल अछि यथा

महोदार (20)

सकल जन सुजन गति (111)

सकल अभिमत सिद्धिदायक (93) इत्यादि।

ताहि सज़् हिनक पिताक नामक कीत्र्तन--

देवसिंहनरेन्द्रनन्दन (8)

गरुड़नराएननन्दन (52),



हिनक छबो पत्नीक उल्लेख, तिथिक उल्लेखक सज़् हिनक पिताक मृत्यु ओ हिनक
सिंहासनाधिरोहणक वर्णन (8), हिनक विजयक वर्णन (9) इत्यादि सब कथाकें मिलाए
शिवसिंहक व्यक्तित्वक एक गोट सुन्दर चित्र अङ्कित भए जाइत अछि। ताहि सज़् हिनक
शरीरक श्याम वर्ण अनेक ठाम अनेक रूपें कहल अछि, यथा,

राजा शिवसिंह रूपनराएन साम सुन्दर काय (34)

सपन देखल हम शिवसिंह भूप

बतिस वरस पर सामर रूप (920)

जकरा पुरुषपरीक्षमे "चारुपाथोदनील", सजलजलदवर्णसुन्दर, कहल गेल अछि।



एहिसँ स्पष्ट अछि जे शिवसिंह श्यामवर्णक सुन्दर कान्तिक नवयुवक छलाह जनिक रूप
मनोमोहक छल अतएव जखन हुनका रसिकशिरोमणि कहबाक भेलैन्हि तखन विद्यापति एहि
वर्णसाम्यसँ बलित कहबाक भए हुनका श्रृज़्र-रसक अधिष्ठातृ देवता वृन्दावन-विहारी कृष्णहिक
अवतार कहि देल। शिवसिंहकें ओ कहल अछि

परतख देव (180)

कान्हरूप सिरि शिवसिंह (77)

अभिनव कान्ह (101)

अभिनव नागर रूपे मुरारि (90);



जनिका केवल ओएह टा नहि समस्त संसार हरिक सदृश बुझए "हरि सरीसे जगत
जानिअ" (41) ओ तें विद्यापति वारंवार हुनका "एकादस अवतारा" (89, 175, 197) कहि कहि
अपन भक्ति प्रदर्शित करैत छथि तथा हुनक रसिकता, श्रृङ्गार प्रवणता, कामकला-कुशलता
व्यञ्जित करैत छथि। ई सब ततेक स्पष्ट अछि, व्यक्त अछि जे एहि प्रसज़् आओर किछु कहब
व्यर्थ।



तथापि एक गोट गीत आओर विचारणीय थिक। गीत संख्या 35 मे केओ रमणी अपन
स्वप्नक समाचार अपना सखीसँ कहैत अछि।



हरि हरि अनतए जनु परचार।

सपन मोए देखल नन्दकुमार।।



परञ्च भनितामे विद्यपति ओहि नागरीकें बुझबैत कहैत छथिन्ह जे

.................अरे वर जउवति जानल सकल भरमे।

शिवसिंह राय तोरा मन जागल कान्ह-कान्ह करसि भरमे।।

आओर ई वरयुवती स्वप्नमे जे स्वरूप देखल (जकरा ओ नन्दकुमार बुझलक) तकर
वर्णन अछि--

नील कलेवर पीत वसन धर चन्दनतिलक धवला।

सामर मेघ सौदामिनि मण्डित तथिहि उदित शशिकला।।

ओहि स्वरूपकें वरयुवती नन्दकुमार मानल से ओकर भ्रम छल। श्यामवर्ण, पीताम्बर,
•ोतचन्दनतिलक-त्रिपुण्डलसित भाल ओ स्वरूप राजा शिवसिंहक छल। केहन मार्मिक रूपसँ
भ्रान्ति प्रदर्शित अछि, केहन चमत्कारक व्यङ्ग्य स्फुट होइत अछि से सह्यदयसंवेद्य अछि,
कहबाक प्रयोजन नहि।



एकर पुष्टि पुरुष-परीक्षासँ सेहो होइत अछि। ओहिमे शिवसिंह वीर लोकनिमे मान्य,
सुधी लोकनिमे वरेण्य, विद्वान् लोकनिमे अग्रविलेखनीय कहि वर्णित छथि जाहिसँ "वीरः सुधीः
सविद्यश्च" ई जे पुरुषक लक्षण एहि ग्रन्थमे प्रतिपादित अछि ताहि तीनूक प्राशस्त्य हिनकामे
कहल अछि तथा हिनक शौर्यक प्रसज़् कहल अछि जे गौड़े•ारक सज़् युद्धमे ओ से यश अर्जित
कएल जे चारू दिशि कुन्दकुसुम सदृश शुभ्र आलोकित छल। परन्तु सबसँ महत्त्वपूर्ण अछि
ओहि ग्रन्थक तृतीय परिच्छेदक अन्तमे उपलब्ध ओ श्लोक जकरा ग्रन्थसँ कोनो सम्बन्ध नहि,
छैक, केवल शिवसिंहक गुणकीर्तन थिक :-



लक्ष्मीपती सर्वलोकाभिरामौ चन्द्रननौ चारुपाथोदनीलौ।

द्वौ पुरुषौ लक्षणौस्तैरुपेतौ नारायणो रूपनारायणो वा।।



एकर प्रथम दुहु चारणमे चारि गोट पद अछि जे चारि गोट लक्षण थिक ओ श्लोकक

उत्तरार्धमे कहल अछि जे एहि चारू लक्षणसँ युक्त दुइए गोट पुरुष छथि, एक तँ पुरुषोत्तम
नारायण ओ दोसर शिवसिंह रूपनारायण। चारू गोट लक्षण श्लेषसँ युक्त अछि जे दुहूमे
चरितार्थ होइत अछि। यथा नारायण छथि लक्ष्मीक पति ओ शिवसिंह 'लखिमादेइरमाने" वारंवार
वर्णित छथि। दुहू सब लोकमे अथवा सब लोकक हेतु सुन्दर छथि

जे कथा गीतमे "परतख देव" वा "परतख नव पँचवाने" वा "तीनि भुवन महि अइसन दोसर
नहि" शब्दें कहल अछि। चन्द्रमाक सदृश लोकलोचनाह्लादकर दुहूक मुख अछि जे कथा गीतमे
"जनि ऊगल नव चन्द" शब्दें कहल अछि अथवा जे कथा दोसर गीतमे ऊपर प्रदर्शित अछि,
शुभ्रत्रिपुण्डक उपमा चन्द्रमासँ, नवचन्द्रसँ देल गेल अछि। तथा घनश्याम तँ नारायणक नामे
अन्वर्थ थिकैन्हि ओ शिवसिंहक "सामर रूप" "साम सुन्दर काय" एहिसँ अभिव्यक्त अछि।
अतएव पुरुष-परीक्षाक एहि श्लोकसँ ओही कथाक पुष्टि होइत अछि जे भनितामे "हरि सरीसे
जगत जानिअ" "अभिनव नागर रूपें मुरारि" "अभिनव कान्ह" अथवा "एकादश अवतारा" इत्यादि
शब्दें कहल अछि। शिवसिंहक रसिकताक प्रसज़्, तहिना, पुरुष-परीक्षाक विदग्धकथामे
विक्रमादित्यक वैदग्ध्यक कथा कहि अन्तमे विद्यापति कहैत छथि जे "साम्प्रतमपि"--एखनहु,
कलावती कविता अथवा कलावती कामिनीक वेत्ता राजा शिवसिंह छथि--"तां वेत्ति राजा
शिवसिंहदेवः"।



एहि कथाक पुष्टि कीर्त्तिपताकासँ सेहो होइत तथा ओहिसँ सम्भवतः ई कथा निर्विवाद
सिद्ध भए जाइत, परन्तु कीर्त्तिपताका जाहि रूपमे उपलब्ध अछि ताहिसँ कोनो प्रयोजन सिद्ध
नहि भए सकैत अछि। हमरा जे कीर्त्तिपताका उपलब्ध अछि तकर श्रृंज़्र भागमे एक गोट श्लोक
जे हमरा सम्पूर्ण पढ़ल भेल अछि तकर आशय अछि जे रामावतारमे भगवानकें सीता-विश्लोषक
कष्ट भोगए पड़लैन्हि तें कृष्णावतारमे भगवान श्रृङ्गारक मूर्त्ति भए अवतीर्ण भेलाह। से जेहने
द्वापरमे भगवान् कृष्ण, तेहने सम्प्रति अहाँ छी। सत्ये



संसारे भोगसारे स्फुटमवनिभुजां श्रीफलं वा किमन्यत्।



एहि श्लोकक "साम्प्रतं तादृशस्त्वम्" मे "त्वं" सँ ककर अभिप्राय से तँ बुझल नहि होइत
अछि--जे पाठ उपलब्ध अछि ताहिसँ शिवसिंहक धरि नहि--परन्तु एतबा तँ स्पष्टे अछि जे
रसिक राजाकें कृष्णाक अवतार कहब विद्यापतिक हेतु कोनो अभिनव कथा नहि भेल। तें
अन्यथा उपलब्ध-प्रमाणक बल पर कहि सकैत छी जे स्वरूपतः, स्वभावतः, चरित्रतः, शिवसिंहकें
कृष्णक अवतार मानि लेब कनेको अत्युक्ति नहि भेल।



एहि प्रसज़् ई शङ्का नहि कत्र्तव्य थिक जे नररूप शिवसिंहकें नारायणक सदृश कहब,
हुनका भगवानक एगारहम अवतार मानि स्तुति करब अनुचित थिक, मिथ्या-स्तुति थिक, धार्मिक
किंवा नैतिक दृष्टिसँ धृष्टता थिक। शिवसिंह साधारण मनुष्य तँ छलाह नहि, ओ राजा छलाह
ओ मनु कहैत छथि जे "महती देवता होषा नररूपेण तिष्ठति"। स्वयं भगवान् गीतामे कहने छथि
जे :



यद्यत् विभूतिमत् सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।

तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंशसम्भवम्।।



राजा शिवसिंह निश्चय विभूतिमान् छलाह, श्रीमान् छलाह, ऊर्जिततम छलाह। हुनका
"प्रत्यक्ष देव" कहब आर्यजातिक राजत्व-भावनाक अनुकूल बुझबाक चाही, प्रतिकूल तँ कहिओ
नहि, विरुद्ध तँ ओ नहिए भेल। ओ तखन एहि "केलि-कल्पतरु" "रायनि मह रसमन्ता" "सकल
कला अवलम्ब" "पुहुबी नव पँचवाने" शिवसिंहकें यदि कोनहु देवताक अवतार कहबाक भेल,
हुनक चरितक समता कोनहु देवताक लीलासँ देखएबाक भेल तँ कृष्णासँ विशेष सज़्त दोसर
कोन देवता भए सकैत छलाह।



अतएव श्रीमजुमदार साहेब हमर एहि कथासँ सहमत नहि होथु परन्तु हम तँ जतेक एहि
विषयक विचार करैत छी ततेक हमर वि•ाास दृढ़ भेल जाइत अछि जे विद्यापति केवल अपन
गीतहिटामे नहि, अन्यत्रहु शिवसिंहकें कृष्णाक अवतार मानैत छलाह। शौर्यमे, वीर्यमे, चातुर्यमे,
सौन्दर्यमे, वर्णमे, रसिकतामे,

कामिनीमनोमोहकतामे, कामकेलिप्रवणतामे, श्रृङ्गारिकतामे, अनेकधा, विद्यापति दुहूक समता
प्रदर्शित कएने छथि। ई सत्य जे सब गीतमे, सब गीतक भनितामे, ई नहि भेटत; शिवसिंह-
नामबला गीतहुमे सब ठाम एकर

उल्लेख नहि अछि। परन्तु तकर प्रयोजनो नहि छैक। एकहु ठाम यदि एहि कथाक स्पष्ट
उल्लेख अछि तँ कविक भाव व्यक्त भए गेल ओ तखन अन्यत्र तँ व्यङ्ग्यरूपें ओकर उपलब्धि
सुगम भए जाएत। तें हम कहने छी ओ पुनः कहैत छी जे विद्यापतिक श्रृङ्गारक गीतमे जतए
शिवसिंहक नाम छैन्हि ततए यदि माधवक उल्लेख अछिओ तँ माधवसँ हमरा शिवसिंहक प्रतीति
होइत अछि। तथा ई सर्वथा काल्पनिक नहि अछि किन्तु स्वयं विद्यापतिक अनेको गीतक
भनितामे, कए गोट गीतहुमे, ई कथा स्फुट अछि। विद्यापतिक शिवसिंह वस्तुतः रूपनारायण
छलाह तथा विद्यापति हुनका नर-रूपमे नहि, नारायणक रूपमे प्रत्यक्ष-देव मानैत छलाह,
प्रत्यक्ष-देव आनन्दकन्द कृष्णक एकादश अवतार कहि हुनका अमर कए गेल छथि।

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