चारि टा पद्य - मिथिला दैनिक

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गुरुवार, 29 जनवरी 2009

चारि टा पद्य


१.
मुँह चोकटल नाम हँसमुख भाइ

मुँह चोकटल नाम छन्हि हँसमुख भाइ,
बहुत दिनसँ छी आयल करू कोनो उपाय,
मारि तरहक डॉक्युमेंट देलन्हि देखाय,
पुनः-प्रात भऽ जायत देल नीक जेकाँ बुझाय,
शॉर्ट-कट रस्ता सुझाय देलन्हि मुस्काय,
मुँह चोकटल नाम हँसमुख भाय।

२.
काल्हि भोरे उठि ऑफिस जाइत छी,
आऽ साँझ घुरि खाय सुतैत छी।
कतेक रास काज अछि छुटैत,
अनठाबैत असकताइत मोन मसोसैत।
जखन जाइत छी छुट्टीमे गाम,
आत्ममंथनक भेटैत अछि विराम।
पबैत छी ढ़ेर रास उपराग,
तखन बनबैत छी एकटा प्रोग्राम।
कागजक पन्ना पर नव राग,
विलम्बक बादक हृदयक संग्राम।
चलैत छल बिना तारतम्यक,
बिना उद्देश्यक-विधेयक।
कनेक सोचि लेल,
छुट्टीमे जाय गाम।
विलम्बक अछि नहि कोनो स्थान,
फुर्तिगर, साकांक्ष भेलहुँ आइ,
जे सोचल कएल, नित चलल,
जीवनक सुर भेटल आब जाय।
३.
चित्रपतङ्ग
उड़ैत ई गुड्डी,
हमर मत्त्वाकांक्षा जेकाँ,
लागल मंझा बूकल शीसाक,
जेना प्रतियोगीक कागज-कलम।
कटल चित्रपतङ्ग,
देखबैत अछि वास्तविकताक धरा।
जतयसँ शुरू ओतहि खत्म,
मुदा बीच उड़ानक छोड़ैत अछि स्मृति,
उठैत काल स्वर्गक आऽ,
खसैत काल नरकक अनुभूति।


४.स्मृति-भय
शहरक नागरिक कोलाहलमे,
बिसरि गेलहुँ कतेक रास स्मृति,
आऽ एकरा संग लागल भय,
भयाक्रांत शिष्यत्व-समाजीकरणक।
समयाभाव,आऽ कि फूसियाहिंक व्यस्तता,
स्मृति भय आऽ कि हारि मानब,
समस्यासँ, आऽ भय जायब,
स्मृतिसँ दूर, भयसँ दूर,
सामाजिकरणसँ दूर - खाँटी पारिवारिक।

मुदा फेर भेटल अछि समय,युगक बाद,
बच्चा नहि, भऽ गेलहुँ पैघ;
फेरसँ उठेलहुँ करचीक कलम,
लिखबाक हेतु लिखना,मुदा
दवातमे सुखायल अछि रोशनाइ,
युग बीतल, स्मृति बिसरल, भेलहुँ एकाकी।


सहस्त्रबाढ़नि जेकाँ दानवाकार,
घटनाक्रमक जंजाल, फूलि गेल साँस,
हड़बड़ाकऽ उठलहुँ हम,
आबि गेल हँसी, स्वप्नानुशासन,
लटपटाकेँ खसलहुँ नहि, धपाक;
भ’ गेलहुँ अछि पैघ।
बच्चामे कहाँ छल स्वप्नानुशासन,
खसैत छलहुँ आऽ उठैत छलहुँ,
शोनितसँ शोनितामे भेल,
उठिकय होइत घामे-पसीने नहायल,
स्मृति-भयक छोड़ नहि भेटल,
ब्रह्मांडक कोलाहल, गुरुत्वसँ बान्हल,
चक्कर कटैत, करोड़क-करोड़मील दूर सूर्य,
आऽ तकर पार कैकटा सूर्य।
के छी सभक कर्ता-धर्ता,
आऽ जौं अछि क्यो, तऽ ओकर
निर्माता अछि के? ओह! नहि भेटल छोड़।
लेलहुँ निर्णय पढ़िकेँ दर्शन,
नहि करब चिन्तन, तोड़ल कलम,
करची आऽ दवात।

के छी ई सहस्त्रबाढ़नि,
घूमि रहल अछि एकटा परिधिमे,
शापित दानव आकि कोनो ऋषि,
ताकैत छोड़ समस्याक,
आऽ समस्यातँ वैह,
के ककर निर्माता आऽ तकर कतय अंतिम छोड़,
के ककड़ स्वामी आऽ सभक स्वामी के?
आऽ तकरो के अछि स्वामी!
भेटल स्वप्नानुशासन,
टूटल शब्दानुशासन,
तकबाक अछि समाधान,
फेर गेलहुँ स्वप्नमे लटपटाय,
खसब नहि धपाक,
तकबाक अछि छोड़।
शंका-समाधान लग,
डगमग होमय लागल अपना पर विश्वास।
जेना कोनो भय, कोनो अनिष्ट,
बढ़ा देलक छातीक धरधरी,
आकि नेनत्वक पुनरावृत्ति!
जन्म-जन्मांतरक रहस्य,
आत्माक डोरी? आकि किण्वन आऽ विज्ञान केलक सृष्टिक निर्माण!
पीयूष आऽ विषक संकल्पना,
स्वाद तीत, कषाय,
क्षार, अम्ल कटु की मधुर!
खाली बोनमे उठैत स्वर,
षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद!
खोजमे निकलि गेलथि अत्रि, अंगिरा, मरीचि, संग लेने पुलऋतु, पुलस्त्य आऽ वशिष्ठ।
प्राप्त करबा लेल अष्टसिद्धि अण्मिक, महिमाक, गरिमाक, लघिमाक, प्राप्तिक,
प्राकाम्यक, ईशित्व आकि वशित्व, सप्तऋषिक अष्टसिद्धि।
नौ निधिक खोज- पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील आऽ खर्व, बनल आधार दशावतारक। मत्स्यावतार बचेलन्हि वेद, सप्तर्षिकेँ, आऽ संगे मनुक परिवार।
कूर्मावतार संग मंदार-मेरु आऽ वासुक व्याल,
आनल सुधा-भंडार।
वाराहावतार आनल पृथ्वीकेँ बाहर,
चारि अंबुनिधिक कठोर छल जे पाश, मारल हिरण्याक्ष।
नरसिंह भगवान बचाओल प्रह्लाद, मारिकय हिरण्यकश्यप,
वामन मारल बालि नापल, दू पगमे पृथ्वी आऽ तेसरमे दैत्यराज।
परशुराम, राम आऽ कृष्ण;
केलन्हि असुरक संहार,
आऽ बुद्ध बदललन्हि तकर विचार।
तैं की जे हुनक प्रतिमा, खसौलक देवदत्तक संतान।
छिः। क्यो रोकि नहि सकल बामियान।
नहि कल्कि नहि मैत्रेय, जल्दीसँ आऊ श्वेत-सैंधव सवारि,
चौदह भुवन आऽ तेरह विश्वक, अनबा युग- कलधौत।
अर्णवक कोलाहलमे जाय छल, नेनत्व डराय।
मुदा अखन विज्ञान टोकलक मोन, ई तँ अछि किण्वनक सिद्धांत।
दशावतारे तँ छथि, उत्पत्तिक आधुनिक सिद्धांत।
मत्स्य, कूर्म, तखन वाराह, फेर नरसिंह, तखन वामन।
एकसँ दोसर कड़ी मनुष्यक रंग-रूपक,
ताकय लेल छल निकलल।
दऽ देलन्हि अवतारक नाम,
भरत-तनय रोकलन्हि वैज्ञानिक सोच,
कड़ी गेल टूटि, ताकयमे कल्कि,
ओऽ ताहि द्वारे तँ नहि एलाह मैत्रेय।
लागि रहल अछि भेटल सूत्रक ओर आर,
फूसिये छलहुँ डरायल करब षोडषोपचार।
वेद, पुराण, महाभारत,रामायण,अर्थशास्त्र ओ,
आर्यभट्टीय,लीलावती, भामती,राजनीति,गणित,भौतिकी केर समग्र चरित्र।
कर्मक शिक्षा गेल ऊधियाय, विहारिमे अंधविश्वासक।
दर्शन भेल जतय अनुत्तरित, आऽ विज्ञान देलक किछु समाधान,
तँ पकरब छोर एकर गुरुवर, जे केलक समस्या दूर।
एकर परिधि भने अछि छोट,यदि परिधि करब पैघ,
तँ फेर बदलताह दर्शनक कांट्रेक्टर, दर्शनकेँ धर्ममे आऽ धर्मकेँ
नरक-स्वर्गक प्रकार-प्रकारंतरमे।

भौतिकी आऽ एस्ट्रोनोमीकेँ बनेलथि एस्ट्रॉलोजी

विज्ञान बनल अंधविश्वास।

जखन नेति-नेति बनत उत्तर।
तखन भने रहय दियौक प्रश्ने अनुत्तरित।
सभ गेलथि आगू, मुदा भरत-तनय छथि पाछू।
लीलावतीयोमे, भानुमतीयोमे कोना तकताह जातिगत भेद,
एकलव्यक प्रशंसामे व्यासजीक लेख मुदा कार्य नहि क्यो बढ़ेलक आगू।
सहस्त्राब्दीक अंतराल देलक जातिगत करताल।
विज्ञान आऽ कला,भूख आऽ अन्न;
भेलाह जातिगत छोड़ताह की स्वाछन्न।
यादि पड़ल गामक भोज,
ब्राह्मण आऽ शोलहकन्हक फराक पाँति,
पहिल पाँतिमे खाजा-लड्डू परसन पर परसन,
दोसर पाँतिमे एक्के बेर देल।
रोकल कला-विज्ञानक भागीरथीक धार,
भेटल राहूक ग्रास। मोन पड़ैछ पिताक श्राद्धकर्म,
भरि दिन कंटाहा ब्राह्मणक अत्याचार,
आऽ साँझमे गरुड़ पुराणक मारि।
सौर-विज्ञानक रूपांतर आऽ ग्रहणक कलन,
दक्षिणाक हेतु भेल कलुषित।
रक्षा-विज्ञानक रामायणक पाठ,
कखन सिखेलक भीरुताक अध्यात्म।
ब्यासजीक कर्ण-एकलव्य-कृष्णक पाठ सामाजिक समरसताक;
अखनहु धरि अछि जीवंत, नहि भेल खतम;
दू-सहस्त्राब्दी पहिनेक उदारवादी सोच;
सुखायल किएक विद्या,
सरस्वती-धार जेकाँ भेल अदिन;
तखनहि जखन विद्या-देवी छोड़लन्हि,
सुखा गेलीह बिन पानिक बिन बुद्धिक।
फेर अओतीह कि घुरि कए बदलि भेष,
एतय, हम्मर भारत देश?
हजार बर्षक घोँघाउज, कि होयत बंद?
आकि एकलव्य-कर्ण-कृष्णक पाठ छोड़ि,
युधिष्ठिर-शकुनिक एक्का-दुक्का-पंजा-छक्काक पढ़ब पाठ।
कच्चा बारहकेँ शकुनि बदलताह पक्का बारहमे,
आऽ करताह अपन पौ-बारह।
तीनटा पासा आऽ चारि रंगक सोरे-भरि गोटी,
करत भाग्यक निर्माण?
चौपड़क चारि फड़ आऽ एक फड़मे चौबीस घर,
की ई फोड़त भारतक घर?
युधिष्ठिर जौं भेटताह तँ कहितियन्हि,
जे चारि लोकक सोझ खेला पासाक,
खेलयतहुँ जकर नियम होइछ हल्लुक।
दू व्यक्तिक रंगबाजी खेलकेँ अहाँ ओझरेलहुँ,
खेला खेलक संग नहि वरन खेलेलहुँ देश आऽ पत्नीक संग।
तैं दैत छी हम ई उपराग,
शकुनियोसँ पैघ कैल अहँ अपराध।
जकरे नाम लालछड़ी सैह चलि आबय ठोकर मारि पड़ाय,
सतघरिया; ती-ती –तीतार तार मेना बच्चा अंडा पार;
बच्चामे खेलाय छलहुँ आमक मासमे ई खेला;
पासाक खेल सेहो खेलेलहुँ द्विरागमनक बाद भड़फोड़ी तक कनियाक संग।
वासर-रैन हे युधिष्ठिर-रूपी भरत-तनय नहि खेलाऊ ई खेल,
सभकेँ दियऽ ई शिक्षा, दिअऊ संगीतक मेल;
स्मृति भय तोड़ल सुर,
दियह सुमति वर हे अय गोसाञुनि,
गाबि सकी हम गीत।
कज्जल रूप तुअ काली कहिअए,
मात्र ईएह नहि सत्य हे मीत,
उज्जल रूप तुअ वाणी कहिअए;
सएह होयत हमर परिणीत।
झम्पि बादर दूर भेल भय,
गगन गरजि उठेलक हुतासन कए,
हृदय मध्य बाउग कए,
मौलि-मउल छाउर दए।
शंख-फूकब वीर रससँ,
करब शुरु भय-भंजन;
स्मृति-स्वप्नक दंडसँ,
खनहि तोड़ब खन-खन,
करब मंथन।
सागर-द्वारि पर आनब भुजदंडसँ,
गामक दूटा पाँतिक भोजनक आस्वादन।
खोलब बंद बुद्धि-विवेक,
रुण्डमालमसानीसँ,
तोड़ब पाँति नहितँ करब नगरकेँ पलायन।
गाम गाम रहत नहितँ,
डुबायब भागीरथीक धारसँ;
जे रोकलथि एकर धार प्रलय-सन,
डूबताह-डूबेताह दू पाँतिबला गामकेँ अपन कुकर्मसँ।
भेल भूमि विलास कानन,
निविल बोन विहसि आनल;
कण्टक मध्य कुसुम विकल छल,
दर्शन-घोषनि-ब्राह्मण ओझरल।
धरणि विखिन छल,
गंगा-तनु झामर,
नहि कल-कल।
विज्ञान गणितक कोमल-गल,
अभाग्य तापिनि केलक छल।
बुद्धक नगर बसायब हम भल,
अहाँ देव रहब स्वर्ग करि-केलि,
गामक लोकहि बजायब ठाम,
सोंपलि गाम, पाँति तोहाऊ,
चलब दर्शन- अद्वैत मोहाऊ,
गामेमे रहब हम मीत,
गायब नव-दर्शनक गीत।
अपन दर्शनक लेल जे देलक,
अहाँकेँ गामक वनवास,
लेब तकर बदला हम जा कय,
कष्ट सहब देब अहाँकेँ निसास।
अपन दर्शनक लेल,
दुइ सहस्त्राब्दिक खेल खेलेलन्हि जे,
तनिकर गामक स्वरूप हम करब कानन,
बुद्धक नगर बनेलन्हि जे कण्टक,
कुसुम ततय आनब, हम आनब।
सयमे दूटा दर्शनलेल फाजिल,
पासा फेकब सहस्त्राब्दीक चौपड़ चारि युग पर,
जे अज्ञात तकरो ताकब हम तात,
परञ्च जे ज्ञात,
तकर तऽ करए दिअ हिसाब-किताब।