कथा- पता नहि डोमा पढ़लक आकि नहि-गजेन्द्र ठाकुर - मिथिला दैनिक

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बुधवार, 17 दिसंबर 2008

कथा- पता नहि डोमा पढ़लक आकि नहि-गजेन्द्र ठाकुर

“हे हम डोमाकेँ पढ़ा लिखा कए किछु बनबए चाहैत छी” । बुधन पासवान बाजल । चण्डीगढ़मे ओ रिक्शा चलबैत छथि । आब गाममे खेती बारीमे किछु नहि बचलैक ।

छोटका भाएय सभ जनमिते मरि जाइत रहए। से बुधनक एकटा छोटका भाएकेँ माए-बाप जनमलाक बाद डोमक हाथसँ बेचलन्हि आ  फेर पाइ दऽ कए किनलन्हि । ई सभटा काज ओना तँ सांकेतिक रूपेँ भेल मुदा एहिसँ ग्रह कटित भऽ गेलैक। आ छोटका भाय जे बुधन पासवानसँ १२ बरिख छोट रहन्हि बचि गेलाह ।

आ ताहि द्वारे ओकरा सभ डोमा कहि सोर करए लागल ।

बुधन अपन बाप-माएक संग हरवाही करथि मुदा भाएकेँ पढ़ेबाक बड्ड लालसा रहन्हि ।

“सुनैत छिअए जे हमरा सभमे कनिओ पढ़ि-लिखि लेलासँ नोकरी भेटि जाइत छैक। एकरा जरूर पढ़ाएब, चाहे ताहि लेल पेट काटए पड़य आकि भीख माँगय पड़य”।

भीख तँ नहि माँगलन्हि मुदा चण्डीगढ़क रस्ता धेलन्हि बुधन। भरि दिन रिक्सा चलाबथि आ साँझमे जखन दोसर संगी-साथी सभ देसी ठेकामे अपन ठेही दूर करबाक लेल जाथि तखन दस तरहक गप सुना कए बहन्ना बना कए बुधन अपन घर दिस घुमि जाथि।

“की रे मीता। बामा-दहिना करै छेँ, निन्द नहि होइ छौ”।

“नञि रौ भाइ। भरि दिन तँ बाइ मे रिक्सा घिचैत रहैत छी मुदा साँझ होइते अंगक पोर-पोर दुखाए लगै-ए”।

“रौ भाइ। कहैत छियौक जे ठेकापर चल तँ दस बहन्ना बना कए घुरि जाइ छिहीँ। देख हमरा आउर केँ, पीबि कए फोँफ कटैत रहैत छी। एक्के निन्नमे भोर आ सभ ठेही खतम”।

कोरइलाक सभ गप सुनि कऽ गुमकी लाधि दैत छथि बुधन। मोनमे ईहो होइत छन्हि जे किंसाइत डोमा पढ़ए आकि नहि पढ़ए।

तखन जे आइ सभ गप पेटसँ निकालि देतथि तँ यैह सभ संगी-साथी सभ काल्हि भेने अही गपकेँ लऽ कऽ हँसी करतन्हि। दू चारि-टा पाइ जे बचत तकरा गामपर पठाएब। आ ताहिसँ डोमा पढ़त।

 

 

मुदा गाममे जे स्कूल रहए ओतय किओ टा दलित आकि गरीबक बच्चा नहि पढ़ैत रहथि।

सरकार एकटा योजना चलेलक , दलितक बच्चा सभकेँ बिना पाइ लेने किताब बाँटबाक । किताब लेबाक लेल घर-घर जा कए यादव जी मास्टर साहेब स्कूल बजेलन्हि बच्चा सभकेँ। नाम लिखलन्हि, बिना फीसक , मासूलक । सभ हफता-दस दिन अएबो कएल स्कूल। दुसधटोलीसँ , चमरटोलीसँ , धोबिया टोलीसँ सभ। डोमा सेहो। सभकेँ किताब भेटलैक आ सभ सप्ताह-दस दिनक बाद निपत्ता भऽ जाइ गेल । देखा –देखी कमरटोली आ हजामटोलीक बच्चा सभ सेहो अएलाह पढ़ए, किताब मँगनीमे भेटबाक लोभे । मुदा ओतए ई कहल गेल जे अहाँ सभ पैघ जातिक छी, मुफ्त किताब योजना अहाँ सन धनिकक लेल नहि छैक ।

“बाबू ई काटए बला गप छैक की, छोट-छोटे होइत छैक आ पैघ-पैघे । स्टेटक आइ धरिक सभसँ नीक चीफ-मिनिस्टर कर्पूरी ठाकुर भेल छैक, की नञि छै हौ असीन झा” । जयराम ठाकुर अपन खोपड़ीक टूटल चारसँ हुलकैत सूर्यक प्रकाशक आसनीपर असीन जीक केश कटैत बजलाह।

“से तँ बाबू ठीके”। असीन बजलाह ।

 

से गाममे फेर ब्राहाण आ भूमिहारके छोड़ि आर क्यो स्कूलमे पढ़एवला नहि बचल । अदहरमे सभटा किताब ई लोकनि किनैत गेलाह ।

“हे अदहरसँ बेसीमे नहि देब , मानलहुँ किताब नव अछि, मुदा अहाँ सभकेँ तँ मँगनीयेमे ने भेटल अछि”। आ दुसध टोली, चमरटोली आ धोबिया टोलीसँ सभटा किताब सहटि कऽ निकलि गेल ।

आ पता नहि डोमा पढ़लक आकि नहि।