डाक्टर- सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू - मिथिला दैनिक

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बुधवार, 5 नवंबर 2008

डाक्टर- सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

एक्कहिटा गाममे सभ दिन कोनो नहि कोनो बिमारीक प्रभावसँ ग्रामबासी मरिरहल खबरि नियमित रुपमे निकालिरहल पत्रिकाक माध्यमसँ सरकार तक पहूँचैछैक । माय स्वास्थ बिभागद्वारा एकटा नव डाक्टर जे एक महिना पहिने स्वर्ण पदक प्राप्तकऽ कऽ आएल छथि, हुनके निरिक्षण आ जाँचके लेल ओहि गाममे पठाओल गेलनि ।
ठाँम–ठाँमके पुल टुटल । सड़क काटल । आ, गाछसभ काटिकऽ सड़केपर राखल होयवाक कारणसँ कोनो सवारी साधनक सुबिधा नहि रहैक । माय, करिब पन्द्र घन्टा पैदले चलिकऽ ओ ओहि गाम तक पहुँचलैथ । सभसँ पहिने त ओ रहऽके ब्यवस्था मिलौलैथ । एकटा कोठरीक ब्यवस्था भेलैक, सायद घरबला पुरे परिवार किछुए दिन पहिने मरिगेल छलैक । घरो एहन जाहिके भितरसँ दिनमे आकास आ रातिमे तारा निकसँ देखाजाइक ।
ओना त डाक्टर साहेब अपना हाथे कहियो भानस बनौने नहि रहथि माय हुनका एकटा भानस बनौनिहारक आवश्यक्ता रहैन । अशोरा पर बैसिकऽ किछु सोंचिते रहैथ कि एकटा भलादमी ओतऽदने जाइत नजड़ि परलैन । ओ, हुनका बजाकऽ पुछलखिन–“भाइ साहेब एतऽ एकटा आदमीके ब्यवस्था नहि भऽसकैय ? जे भानस बनादे आ बरतनि साफ कऽलेअ ।” अनचिन्हार आदमीके देखिकऽ ओ पुछलखिन “पहिने अहाँ ई कहुँ जे कहाँसँ अएलहुँ आ अहाँ के छी ?” हुनको पुछब उचित छलनि किया त ओ घटना अखन पुरान नहि भेल अछि । डाक्टर साहेब अपन पुरा परिचय कहलखिन तखन जाकऽ ओ सेहो अपन परिचय दैत कहलखिन–“हमर नाम रतन अछि, आ अहाँ एतऽ जे हमरा सभकलेल अएलहुँ ताहिकेलेल धन्यवाद । रहि गेल बात अहाँक लेल आदमी त हम देखैछी । ” एते कहिकऽ ओ ओतऽसँ बिदा भऽगेलथि ।
करिब एक घण्टाक बाद ओ एकटा बाह्–तेह् बर्षक बचियाके लेनेअएलखिन । आ डाक्टर साहेबके बचियाके देखाकऽ कहलखिन–“हे ई टुगर छै, ईहे करिब एक महिना पहिने एकर माय आ बाप दूनु एकहि दिनक आगा–पाछा मरिगेलै ।” बचियाके देखिकऽ ओ सेहो चिन्तित भऽगेलखिन आ, ओकरा अपना लग राखिलेलखिन । काज सेहो बेशी करऽके नहि रहै जे कनिको दिक्कत होइतै ।
दोसर दिन डाक्टर साहेब अपन औजार लऽकऽ गाममे रोगक परिक्षण करऽलेल बिदा भेलैथ । हुनक नजड़ि जेमहर पड़ैन, एकहिटा चिज सगरो देखऽमे अबैन – गामक सभक कपड़ा मैल, अधिक्तर बच्चा सभक मुहँसँ एकहिटा बात–“गे माय भुख लागल अछि । ” कतौ सुनऽमे अबै–“दादा हो दादा मरिगेली । ” आदि ।
डाक्टर साहेब बिमारीके जाँचऽगेल रहथि भुख सन पैघ बिमारीक ईलाज हुनकालग नहि रहैन –जे गामक प्रमुख समस्या रहै । जतऽ डाक्टरसाहेब ठाह् भऽजाथिन त लगै जेना कौआ सभक बिचमे बकुला । गाम भरिमे एकहिटा हुनके कपड़ा साफ छलनि, मुदा कते दिन ? एकटा बात त निश्चित छलै जे ई गामक एहन दशा गरिबीक कारणे भेल छल । ताँहूमे किछुलोक ओकर गरिबीक नाजाएज फाएदा लेबऽचाहै ।
गाममे घर–घर जाकऽ ईलाज करऽके क्रममे एकबेर जखन ओ बाटपर चलैत रहैथ त अबाज अएलै–“माय गे मरिगेली .....। ” बड जोरसँ ओ अबाज जे अएले सें सोचियोकऽ डर लागिसकैय । डाक्टर अबाज आएल दिश दौड़ला । घरमे पैसिकऽ देखलखिन त एकटा बाह्–तेह् कर्षक बच्चा पेट पकरिकऽ कनैत रहै । ओ एमहर–ओमहर सगरो तकलखिन मुदा शियान ओतऽ केओ नहि रहै । ताबते मधिम–मधिम खोकीके अबाज सुनाय पड़लै । ई सुनिकऽ ओ अबाज लगौलखिन “घरमे के छी ?” केश बगराके खोता सन रखने एकटा बुढ़िया अएलै त डाक्टर साहेब एकटा गिलासमे पानि लाबिदेबऽलेल कहलखिन । बुढ़िया पानि लाबिकऽ देलकै । एकटा गोटी ओहि बच्चाके ओहि पानि संगे खुवेलखिन । पाँच–सात मिनटके बाद ओ ठिक भऽगेलै । फेर ओतऽसँ ओ बिदा भेला । साँझमे ओ जखन अपन घर पहुँचलखिन त ओ टुगरी बड़ सुनरि भानस बनाकऽ धएने रहै । ओ हाथ–पएर धोकऽ भोजन करऽ लेल बैसिगेलखिन । ओ चिन्तिते अवस्थामे भोजन कऽकऽ आराम करऽ गेलखिन । हुनका निने नहि परैन । दिनमे जाँच कएल बिमारीसभ हुनक नजरिके सामने घुमैत रहैन । आ, एकहि दिनमे एकहि परिवारक चारि–चारिगोटेके मृत्यु । ओ एहि बिमारीसभक बारेके सोंचऽलगलखिन ।
बिमारी किछु नव किशिमक भेटल रहैक । किछु जल्दिसँ करऽके अवस्था नहि रहैक किया त ओहि गामसँ शहर धरि पहुँचऽलेल कमसँ कम पन्द्र घण्टा चलऽपरै । ओतऽ नहि त प्याथोलोजिक समानरहै जे किछु जाँच कएल जएतै । बिमारीसभक बारेमे सोचैत–सोचैत, ओतै बोरा पर सुतल ओहि बचियासँ पुछलखिन–“बौआ, नाम कि छो तोहर ? ” ओकरो निन त नहिए पड़ैत रहै, ते ओ उठिकऽ बैसिगेली आ जबाब देली –“जी हमर नाम सेहन्ता अछि । ” ओ फेर पुछलखिन–“ तोहर माय–बाबुके कि होइत छलौ ? ” सेहन्ता हुनका पएरलग जाकऽ बैसिगेली आ गम्भिर भऽ कहऽलगली–“ किछो नहि ......, करिब डेढ़ दू महिना पहिने बहुते लोक सभ बन्दुक लऽकऽ अएलै आ सभके घरे–घर लोकसभके कहै काज करऽ जाएला ।.....जे नइ जाइ ओकरा धमकी दै जे नहि जएतै ओ घिसरी काटिकऽ मरतै । .......बहुतो लोक त ओकरा सभसंगे चलिगेलै मुदा किछु लोक जाएके लेल तैयार नहि भेलै । सभगोटेके चलिगेलाक बाद एकटा आदमी एकटा बम फेकलकै जाहिके आबाजसँ बहुते घर टुटिगेलै आ छ–सात दिन धरि अन्हारे रहै । एतऽके लोक सभके श्वासलेबऽमे सेहो दिक्कत होइ । एतऽ एकहिटा ईनार छै जतऽके पानि सभ पिबैछै ओहूमे किछु खसादेलकै । .........एतऽ पानिके लेल आओर ब्यवस्था नहि छैक । ” एते बात कहिकऽ ओ बच्चा लगलै डाक्टर बाबुके पएर जाँतऽ ।
पएर जाँतब देखकऽ ओ सेहो उठिकऽ बैसिगेलाह आ कहलखिन “ जो तहूँ सुतऽ । ” ओ बच्चा फेर ओहि बोरापर सुतऽ चलिगेली । भोरमे सबेरे उठिकऽ एकटा आदमीके चिठ्ठी दऽकऽ स्वास्थ मन्त्रालय पठौलखिन । आ संगहि किछु दबाई आ गैससभ सेहो पठादेबऽलेल ओहि चिठ्ठीमे लिखलनि । ओकरा बिदा कएला बाद हुनका जे किछु टोल छुटिगेल छलनि ओमहर बिदा भेला ।
साँझमे जखन ओ सूचि उल्टाकऽ देखलनि त किछु बच्चा मात्र एहन छलै जेकरा कोनो प्रकारक रोग नहि लागल छलैक । आ, एकटा बात निश्चित रहै
जे रोगीसभ मरबेटा करतै आओर कोनो उपाय नहि रहै । रोगीक श्वाससँ फैलऽवाला रोगक नियंत्रन बड़ कठिन माय ओकरा सभके मरनाइए उचित बुझि ओ अपन झोरासँ बिषक सूइ निकाललैथ । आ, पहिने तैयार कएल सूचिके देखिकऽ फेर एकटा नव सूचि तैयार कएलनि जे केकरा –केकरा बिषक सुई देबाक अछि ।
प्रातः फेर ओ आओर दिन जकाँ बिमारीक देखभाल करऽ बिदाभेलखिन । मुदा ओइ दिन हुनका छटपटाति मुर्दाके मुक्ति देबऽके छलनि । आ, साँझ धरि ओ करिब अस्सिगोटेके मुक्ति दऽदेलखिन ।
साँझखन जखन ओ निबासस्थान फिर्ता अएलथि त सेहन्ता भोजन बनाकऽ हुनके बाट तकैत छली । ओ झटसँ झोरा धऽकऽ हाथ पएर धोकऽ भोजन करऽलेल बैसिगेलखिन । सेहन्ता भोजन लाबिकऽ देलकै मुदा भोजन करऽसँ पहिने हुनका उल्टी होबऽलगलनि । पेट–माथ सभमे दर्द सेहो होबऽलगलनि । ओना हुनको ओहे बिमारीक लक्षण छलनि मुदा ओ अपनेसँ बिषक सूइ त नहि न लऽसकैछलथि ।
राति भरि दर्दसँ छटपटाति, बोकरैत । मात्र तिन पहरके राति कतेको बर्ष जका अनुभव होइ । भोरमे करिब नौ बजे बहुते डाक्टर, नर्स आ पुलिससभ सेहो अएलै । डाक्टर आ नर्ससभ पहिने डाक्टर मुरली प्रसाद शर्माके देखभाल कएलखिन । हुनका निशाक सूइ दऽकऽ मात्र आराम भेटलनि ।
दोसर दिश पुलिससभके गाममे ई समाचार भेटलनि जे डाक्टरसाहेब काल्हिखन जिनका–जिनका सूइ देलखिन ओ सभ मरिगेलै । माय पुलिससभ हुनकासँ पुछऽअएलै कि एते लोक एकहिबेरमे केना मरिगेलै । ओ निसंकोच अपन समस्या कहिकऽ कहलखिन–“............माय हम काल्हिखन अस्सिगोटेके बिषक सूइ दऽदेलीऐ । ”
एमहर सेहन्ता डाक्टरबाबुके रातिभरि सेवामे लागलछली । आ, भोरमे जखन ओ पुरा ओछायनपरके बोकरल साफ कऽकऽ बैसली तखने एकटा पुलिस डाक्टरबाबुके कहलकनि–“हम अहाँके हपन हुकुमतमे लैछी । ” ई बात सुनिकऽ ओ जबाब देलखिन–“जँ अहाँके उचित लगैय त हम तैयारछी । ओ फेर कहलखिन – “अपन आवलोकन सभगोटेके समझादैछी आ एकटा बात आओर किछु बच्चा छै जेकरा कोनो रोग नहिछैक ते ओकरा सभके सेहो लऽचलऽके ब्यवस्था सेहो करु । ” सूचिअनुसार रोग नहि लागल बच्चासभके लेबऽ किछु पुलिससभ गेल । आ एमहर डाक्टर बाबु लगलखिन सभके अपन आबलोकन सम्झाबऽ । ओमहरसँ जखन ओसभ निरोग बच्चासभके लऽकऽ आबिगेलखिन तखन धरि हिनको काज समाप्त भऽगेल छलनि । तखन ओ कहलखिन –“आब चलि सकैछी । ”
दशगोटे पुलिस, बच्चासभ आ डाक्टरसाहेब ओतऽसँ बिदा भेलथि । थाकल बच्चासभके पुलिससभसेहो कोरामे उठाकऽ शहर तक पहुचौलैथ । रातिके दश बाजिगेल छलै माय बच्चासभ संगे डाक्टरबाबुके सेहो थानामे राखऽके ब्यब्स्था कएलगेलै । डाक्टरबाबु त गल्ति बड नमहर कएनेछलाह किया त जियाबऽ लेल पठाओलगेल छलनि मुदा ओ ..........., माय हुनका भोरमे अदालत मे उपस्थित कराओल गेलनि ।
अदालतमे हुनकासँ पुछलगेलनि –“डा. मुरली प्रसाद शर्मा, अहाँ एना किए कैलीऐ ? ” ओे किछु देर चुप भेलखिन तखन फेर जबाब दैत कहलखिन–“आइ तक हमर एस.एल.सी.के रेकर्ड केओ नहि तोरऽसकल अछि । तइयो बाबुजीके बड मेहनति करऽ परलनि हमर रुशमे एम.बि.बि.एसके लेल । आइ.एससी सँ एम.डी धरि टौप कऽकऽ पि.एचडी.मे स्वर्णपदकसँ विश्वबिद्यालय सम्मान कएने रहे । बहुतो अस्पतालसँ प्रस्ताव सेहो आएल मुदा हमर सोंच ई छल जे हमरा सनके डाक्टरके हमरा देशमे आवश्यक्ता अछि । सायद माय हमरा अबिते ओतऽ पठादेलगेल जतऽ पन्द्र घण्टा चलिकऽ पहुचऽपरैछैक । ......हम ओतऽ गेलहुँ ईलाज करऽ, ठिक छै , ईलाज कऽदेबै, मुदा जतऽ खाएके लेल रोटीयो नहि छैक ओतऽ दबाइ कतऽसँ अएतै । ......सरकारके सुरक्षामे खर्च करऽसँ फुरसते नहिछै आ, दबाइ त दूर जाउक ......... ओकरासभके एहन रोग छै जे एकटासँ दोसरके आ दोसरसँ तेसरके होइतजएतै । आ, धिरे–धिरे ओइ श्म्सानमे के बाँकि रहत......? ”
एते सुनिलेलाक बाद, न्यायधिस डाक्टरके प्रमाण–पत्र रद्द कऽदेबऽके फैसला सुनौलखिन । न्यायधिसक फैसला सुनिते हुनका मुँहसँ गाउज निकलऽलगलनि । ओ बेहोस भऽ खसिपरला । जाबे लोक दौड़े– दौड़े ताबे ओ ई देश नहि दुनियासँ बिदा भऽगेलाह ।