दाग लागल स्नेहमे - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू - मिथिला दैनिक

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सोमवार, 10 नवंबर 2008

दाग लागल स्नेहमे - सन्तोष मिश्र, काठमाण्डू

दाग लागल स्नेहमे

आई.ए. प्रथम वर्षमे अध्यनरत सुनिताकेँ एकटा बड निक विद्यार्थी दिपक सँ भेट होइछैक । बात–बिचार मिलऽ केँ क्रममे सुनिताकेँ । दिपकसँ प्रेम भऽ जाइछैक । सुनिताक घरसँ नजदिकेँ के घरमे भाडा लक रहबाला दिपक से हो सुनिता सँ प्रेम कर लगैछैक । आ, सुनिताक साथी रुबी सेहो जखन भेटभेल तखने दिपककेँ बारेमेँ पुछ लगैछैक । दिपक, रुबि आ सुनिताकेँ पढमे से हो बड मदत करैछैथि । समय–समय पर दिपकसंग सुनिता सिनेमा देखऽ सेहो जाय लगैय । दुनु एक आपसमे कहियो मन्दिर लग आ कहियो पार्कलग भेटघाट करके बात सुनिताक बाबुजीकेँ कान तक पहुँचजाइछैक । सुनिताक बाबुजी बड दुखी भऽ सुनिता लेल वर ताक लगैछथि । ई वात सोचिकऽ जे बेटी अपन प्रतिष्ठा सेहो बुरादेत । संचयकोष सँऽ पाई छोराक बेटीलेल गहना–गुरिया से हो वनाब लगैछथि । सुनिता ई सब बात अपन सहेली रुबिकेँ सुनबैय । ई सुनिकऽ रुबि दिपककें संग भागिक विवाह कर ला आ मिथिलाक दुर्दशा दहेज आ महिला अधिकारके बारेमे निक जका पाठ पढादैछैक । दोसर दिन सुनिता अपन साथी दिपककेँ भेट कऽकऽ भागिकऽ विवाह करऽला कहैछैक । सब किछ सुनलाक बाद दिपक भागऽके लेल समय सेहो निश्चितक सुनिताके कहैय । प्रातः काल सुनिता आपन माँके मंगलशुत्र, तिलहरी आ अनवारीमे राखल रुपैया लऽ दिपक संग भागिजाइय । आ दुनू सब मुम्बइ पहुँचैय । दिपक रहऽकेँ लेल अपन मितकेँ डेरामे व्यवस्था मिलबैय । आ, सुनिताकेँ डेरामे छोरिकऽ दिपक ओमहरे रैहजाइय, जाँहि कारण सँऽ सुनिता बड चिन्तित भजाइय । मुदा साँझमे दिपक केँ देखिते सुनिताके चन्द्रमा सनक मुहसँ इजोत निकलैछैक । आ, ओइ राति सुनिता दिपकपर पूर्ण रुपे समर््िर्पत भऽ जाइय । भोर मे जखन सुनिताक आँखि खुलैछै त दिपक ओतऽ नहि रहैछैक । दिपक नितक्रिया मे गेलहोयत सोचिक सुनिता जल्दि सँ उठिक अपन कपडालता पहिरक तैयार होइय । मुदा एमहर–ओमहर तकैत सुनिताक नजर चिठ्ठी पर परैछैक । ओ चिठ्ठी खोलिक देखैय, लिखल रहैछैक "हमरा माफ क दिअ सुनिता ।"
ई पढिक सुनिता अपन माथ कपार पिट लगैय आ सोच लगैय जे कि भगेल । सुनिताक छाती धर धर धर धर काप लगैछैक । तावते केवार खुलैछैक । आ, एकटा महिला पान खैने दुटा मर्दके लक पहुँचै छै । पहिने ओ महिला सुनिता सँ पुछैछैक "तम्हारा नाम.... सुनिता है ।""हाँ, हाँ, मगर क्यो ?" सुनिता डेराक जवाफ देछै । ओ महिला फेर कहैछै "चलो हमारे साथ ।""क्यो ?""हमने तुमको ....खरिदा है ।""नही ए झुठ है ।" ओ महिला अपन साथमे आयल मर्दकेँ कहैछै "ए ! उठालो सालीको,...... बहोत बोलरलिए ।"दुनु मर्द सुनिताके उठाक लजाइय । सुनिताके देह व्यापार कर ला कहलजाइछ । मुदा अस्विकार कएला पर सुनितकेँ लगैछै पिटाइ आ दऽ देओल जाइछ निशा के सुई । निशाकेँ सुई दकऽ देह व्यापार कराबके कारण स ओ विमार भऽ जाइछ । ताहि सँऽ ओकरा जचाँबऽ लेल डाक्टरलग लगाइछ । ओ सौचालय जायकेँ बहाना सँऽ ओतऽ सँऽ भगैय । आ भागऽमे सफल सेहो भऽजाईछ । सामने अवैत रिक्सापर बैसकऽ ओ रेलवे–स्टेशनपर पहुँचैय । रिशसाबाला जखन पाई मगैछैक त सुनिताकेँ सबकिछ सुनाब परैछैन । किया त सुनिताक सबपाई ल क दिपक चैलगेल रहैय । सुनिताक दुःख भरल खिस्सा सुनिक रिक्सावाला सुनिताकेँ अपन डेरा लजाइय । आ दु–तिन दिनमेँ अपन गाम पहुँचादेवकेँ बचन से हो दैय । रिक्शावालाक वात सँऽ सुनिताकेँ विश्वास होइछ । सुनिताकेँ संग परिचयपात होबऽ के क्रममे रिक्शावालाकेँ घर सेहो परोशकें गाउँमे छैक से ओ वतवैय । दु–तीन दिन बाद सुनिताक संगे रिक्शावाला अपन गामकेँ लेल निकलैय । रेलबे स्टेशनपर सुनिता पुरा एमहर–ओहमर देखैत सावधानी सँऽ चलैय मुदा जहिना टे«न आगा बढैछै, सुनिताक घरकैत करेज स्थिर होब लगैछैक । सुनिता ताक लगैय रिक्शावालापर आ सोच लगैय ओ दुनुकेँ फरककेँ बारेमे ।रिक्शावाला सुनिताकें लकऽ जखन सुनिताकऽ घर पहुँचैय तऽ सुनिताक बाबुजी सुनिताके देखक कहैछथि "आब कि लेब अएले.................., ओतै सँ चैलजो नइ त हमहि सब बिख खा लेब ।"सुनिता विना किछ बाजिकऽ मुरी गोतने बाहर निकलैय । सुनिताकऽ हाथ रिक्शावाला पकरिलैछ आ ओ अपन घर चलऽ ला कहैछ । जखन ओ दुनु बाटमे परऽवाला दिपककेँ डेरा लग पहुचैय । कोठरी भितरसँ बन्द रहैछैक । सब दिन खिरकी दने वजाबकेँ आदत सुनिता खिरकी दने पुनः बजाबलेल तकैछ । मुदा सुनिता जखन खिरकि दने तकैछै त सुनिताक साथी रुबि दिपक के कोरामे बैशल प्रेमरसकेँ वात करैत रहैछ । ई देखक, सुनीताक पैर तर सँऽ जमीन जेना निकलिजाई तहिना भऽजाइछ । आ ओ अपना पर भेल अत्याचार दोशर पर नहि होउक से सोचिकऽ नजदिक कें थानामे जाक दिपक के बारेमे लिखवैय । सुनिताकेँ स्थीती परिस्थिति देखक आब ओ कत जएती सोचिक रिक्शावाला सुनिताकेँ कहैछ "एक बात कहु, .........पिताएब न नहि ?"उत्सुक्ता जनबैत सुनिता, कहैछ " ह ! कहु ..........!"तब रिक्शावाला कहैछ "आहा हमरा सँ ............विवाह करब ।"
ई सुनिक सुनिता हसऽ लगैछ ।